नई दिल्ली: 11 अप्रैल की तारीख चीन और भारत के सम्बंध में एक ऐसी घटना के लिए जानी जाती है, जो अगर कामयाब हो जाती तो शायद भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हो ही नहीं पाता और युद्ध या तो सात साल पहले ही हो जाता या फिर कभी नहीं होता. 1955 में 11 अप्रैल के दिन एयर इंडिया की एक फ्लाइट में टाइम बम लगा दिया गया और उस बम के निशाने पर थे चीन के पहले प्रीमियर (प्रधानमंत्री) चाऊ एन लाई. ये बम फटा भी, पायलट ने फौरन प्लेन पानी में लैंड करने की कोशिश भी की, लेकिन विमान तीन टुकड़ों में बंट गया. कुल 16 लोग मारे गए और बचने वालों में एयर इंडिया के एक स्टाफ समेत तीन लोग शामिल थे. मरने वालों में कई देशों के लोग थे चीन, जापान, अमेरिका, वियतनाम और भारत.

चाऊ एन लाई इसलिए बच गए क्योंकि ऐन वक्त पर उन्होंने इस फ्लाइट से जाना कैंसल कर दिया. दरअसल एयर इंडिया की इस चार्टर्ड फ्लाइट को चीन की सरकार ने बुक किया था, प्लेन का नाम था ‘कश्मीर प्रिंसेज’. दरअसल एशिया और अफ्रीका के देशों का एक सम्मेलन बांडुंग में होने जा रहा था और इसी सम्मेलन के जरिए निर्गुट सम्मेलन (नाम) की नींव पड़ी थी. ऐसे में चीन के प्रीमियर के साथ साथ एक बड़े प्रतिनिधिमंडल को इस एयरक्राफ्ट से इंडोनेशिया के बांडुंग पहुंचना था. फ्लाइट हांगकांग से उड़ी, जहां से चाऊ एन लाई को भी फ्लाइट लेनी थी. लेकिन बताया जाता है कि ऐन वक्त पर चीन के पीएम को इस खतरे की भनक लग गई और वो रुक गए. लेकिन उनकी पार्टी के कई नेता और इंटरनेशनल जर्नलिस्ट उसमें बैठ गए. चौंकाने वाला ये, क्योंकि अगर बम के बारे में पीएम को पता था तो बाकी लोगों को क्यों नहीं रोका.

बाद में जांच में सामने आया कि ये बम हांगकांग में ही एयरक्राफ्ट में फिट किया गया था और उसको अंजाम देने के लिए अमेरिका मे बने एमके7 नाम के डेटोनेटर का इस्तेमाल किया गया था. चीन ने इस घटना का आरोप अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए और ताइवान की एजेंसी केएमटी पर लगाया. चीन की खुफिया एजेंसी ने हांगकांग एयरपोर्ट की सिक्योरिटी स्टाफ के चाउत्से मिंग पर आरोप लगाया और उसकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी किया लेकिन मिंग सीआई के एक विमान में बचकर निकल गया और ताइवान जाकर अपनी जान बचाई.

दशकों बाद जब चीन, अमेरिका जब क्लासीफाइड डॉक्यूमेंट्स एक अरसे बाद रिलीज हुए तो कड़ियां जोड़कर एक जर्नलिस्ट ने रिपोर्ट छापी कि एक अमेरिकी सीआईए एजेंट जो दिल्ली में अमेरिकी दूतावास में तैनात था, उसने दिल्ली के एक होटल में केएमटी के एजेंट वांग फेंग को एक बैग सोंपा था, जिसमें वो बम था. कहा जाता है कि अमेरिका कम्युनिस्ट देश चीन के उभार से चिंतित था और वो नहीं चाहता था कि चीन का पीएम बांडुंग सम्मेलन में तीसरी दुनियां के इतने देशों से मिले. इधर तीन लोग जो इस घटना में बच गए थे, साउथ चाइना सागर में वो पूरे 9 घंटे तैरते रहे और किसी तरह एक अनजान से द्वीप पर जा पहुंचे. जहां उन्हें इंडोनेशिया के कोस्ट गार्ड्स ने बचाया. 

उन्हीं में से एक अनंत कार्णिक ने इस घटना पर बाद में दो किताबें लिखीं. बम प्लेन के ह्वील बे में फिट था, फटने के बाद फ्यूल टैंक में छेद हो गया, पायलट ने पानी में लैंड करने की कोशिश भी की, लेकिन प्लेन तीन टुकड़ों में बंट गया. हालांकि प्लेन का पायलट जाफर भी बच नहीं पाया. प्लेन के पायलट जाफर की इस बहादुरी के लिए भारत सरकार ने मरणोपरांत उन्हें अशोक चक्र पुरस्कार से नवाजा और अशोक चक्र पाने वाले वो देश के पहले सिविलियन थे. उनके साथ को-पायलट एमसी दीक्षित और ग्राउंड मेंटीनेंस इंजीनियर अनंत कार्णिक को भी ये पुरस्कार दिया गया.

इस घटना के फौरन बाद पहला शक भारतीयों पर ही गया था, जब एयरक्राफ्ट भारत का था, पूरा स्टाफ भारत का था तो बम लगने की खबर उन्हें क्यों नहीं हुई? एयर इंडिया के कुल 71 कर्मचारियों से पूछताछ हुई.  इसी नजरिए से जांच शुरू हुई लेकिन जिस सोर्स से चाऊ एन लाई को प्लेन में बम लगाने की खबर मिली थी, उसी ने ये भी जानकारी दी कि भारत या किसी भी भारतीय का इस घटना से कोई लेना देना नहीं है, तब जाकर चीनी पीएम ने अपनी खुफिया एजेंसियों को केएमटी और सीआईए पर फोकस करने को कहा.

हांगकांग के अधिकारियों ने इस साजिश का सुराग देने के लिए एक लाख हांगकांग डॉलर के इनाम का ऐलान कर दिया. लेकिन बाद में चाऊत्से मिंग का राज खुल गया, हालांकि तब तक वो भाग चुका था.

दिलचस्प बात ये है कि सीआईए की भूमिका पर हमेशा अमेरिका मना करता रहा, लेकिन इस घटना के 16 साल बाद जब 1971 में बीजिंग में चाऊ एन लाई की मुलाकात अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर हेनरी किसिंजर से हुई तो चाई एन लाई ने उनसे यही सवाल पूछ लिया तो किसिंजर का जवाब था, कि ‘’आपने सीआईए को जरूरत से ज्यादा सक्षम समझ लिया है, जबकि ऐसा है नहीं.‘’ ये वही किसिंजर थे, जो 1971 के भारत-पाक युद्ध से पहले भारत को दबाने की कोशिशों में जुटे थे.