ब्लैक ओरलोव, फिलहाल दुनियां भारत के इस हीरे को इसी नाम से जानती है. कभी पांडिचेरी के एक मंदिर में ब्रहमाजी की मूर्ति की आंख में लगा हुआ था. वैसे भी ब्रह्माजी के गिने चुने मंदिर हैं देश में, ऐसे में आंख में हीरा लगा होने से इस मूर्ति पर दुनियां भर की नजर थी. किसी ने एक साधु को झासे में लिया और वो उस हीरे को मूर्ति की आंख में से निकालकर भाग गया. भारत विदेशी कब्जे में था और देश से उस वक्त ऐसी ना जाते कितनी कीमतें धरोहरें लूट कर, चुरा कर बाहर जा रही थीं, मीडिया के साधन नहीं थे, गिनती के लोगों को ही इसका पता चल पाया. सब भूल भी गए कि अचानक 1932 में इस हीरे की कहानी फिर से दुनियां के सामने आई.
 
कहानी सामने आती भी नहीं अगर एक हीरा व्यापारी न्यूयॉर्क में एक बहुत ऊंची बिल्डिंग से कूद कर आत्महत्या नहीं करता, उस व्यापारी का नाम था जे डब्ल्यू पेरिस. अमेरिका में इस हीरे को वही लेकर आया था, लेकिन दुनियां को ये पता चलता कि करीब सौ साल तक हीरा कहां रहा और उसके पास कैसे पहुंचा, उससे पहले ही उसने आत्महत्या कर ली. ये तय था कि चोरी में किसी ना किसी फ्रांसीसी का हाथ रहा होगा. 18वीं-19वीं शताब्दी का दौर था, पांडिचेरी फ्रांसीसियों के कब्जे में अरसे तक रहा था, तमाम फ्रांसीसी अफसरों और फ्रांसीसी यात्रियों को इस हीरे की कीमत के बारे में अंदाजा था.
 
शाहजहां के वक्त आया फ्रांसीसी यात्री ट्रेवर्नियर पहले ही भारत से कई अमूल्य हीरे ले जा चुका था, और जो नहीं ले जा पाया था, अपनी भारत यात्रा के बारे में लिखी किताब में उसने उनके बारे में विस्तार से लिखा था, यहां तक कि उनकी अंदाजन कीमत के बारे में भी. उसकी किताब के बाद ही भारत के मंदिरों में लगे कई हीरों की असली कीमत के बारे में लोगों को अंदाजा हुआ था, दरअसल ट्रेवर्नियर एक जौहरी भी था.
 
जब उसकी आत्महत्या की परतें खुली तो पता चला कि वो एक बेशकीमती हीरा लेकर अमेरिका आया था, जो 195 कैरेट का था, उसके करीबियों ने बताया कि ये हीरा 150 साल पहले तक भारत में किसी ब्रहमा की मूर्ति में आंख के तौर पर लगा हुआ था. अगले 18 साल तक उस हीरे का कुछ भी पता नहीं चला. 1950 में फिर उस हीरे की खबर आई. दरअसल आप इतने बड़े और नायाब हीरे को छुपाकर भी नहीं रख सकते, जैसे ही बाजार में जाओगे सबको पता चल जाता है. ऐसे में चार्ल्स एफ विल्सन ने उस हीरे को कटवा दिया, ये हीरा आज जिस रूप में है विल्सन की ही वजह से है. अभी ये कुल 67.5 कैरेट का ही है और एक 108 हीरों के साथ एक ब्रूच में लगा हुआ है, उससे पहले एक 124 डायमंड्स के साथ एक नैकलेस में जड़ा हुआ था. हालांकि पेरिस की मौत के बाद उसके पास दो लैटर मिले, एक उसने अपनी बीवी के नाम लिखा था और दूसरा अपने एक साथी ज्वैलर के नाम, लेकिन दोनों ने ही कभी इन लैटर्स में क्या लिखा था, किसी को नहीं बताया.
 
हीरे को शापित कहने की कहानियां तब तक शुरू हो चुकी थीं, माना जाता है कि जिस साधु ने इसे चुराया था, उसकी बाद मे किसी ने हत्या कर दी. जे डब्ल्यू पेरिस का भी बिजनेस तबाह हो गया, उसने हीरा बेचने के बाद सुसाइड की या हीरा कब्जाने के लिए उसको सुसाइड पर मजबूर किया गया, आज तक किसी को नहीं पता. 1947 में रूस की दो राजकुमारियों ने आत्महत्या कर ली और हीरों से जुड़ी तमाम वेबसाइट्स और बीबीसी जैसी साइट ने भी अपनी रिपोर्ट में इसी ब्लैक ऑरलोव को इन दोनों सुसाइड्स के लिए जिम्मेदार बताया. ये दोनों घटनाएं 1945 के बाद हुईं, एक राजकुमारी का नाम था लिओनिला गैलेत्सिन और दूसरी का नाम था नाडिया व्यजिन ओरलोव, कहा जाता है कि इसी राजकुमारी के नाम पर किसी ने इसका नाम आई ऑफ ब्रह्मा के साथ साथ ब्लैक ओरलोव कर दिया. ये दोनों ही इस हीरे की मालकिन थीं.
 
नाडिया 1917 की रूस क्रांति के बाद से ही रूस छोड़कर रोम चली गई थीं, और एक ज्वैलर से उसने शादी कर ली थी. जब एक दूसरी राजकुमारी लिओनिला जिसके पास ये हीरा था, ने अचानक सुसाइड कर ली तो हीरा लिओनिला के पति से नाडिया के ज्वैलर पति ने ले लिया था और एक महीने बाद नाडिया ओरलोव ने भी रोम की एक ऊंची बिल्डिंग से कूदकर आत्महत्या कर ली. विल्सन ने भी यही सोचकर कि वह रूसी नहीं है, उस पर इस हीरे का कोई असर नहीं होगा, ये हीरा खरीद लिया, हालांकि इस शाप से छुटकारे के लिए विल्सन ने इसे तीन हिस्सों में कटवा दिया.
 
हालांकि इसी शाप के चलते 2006 में हॉलीवुड की मूवी ‘डेस्परेट हाउसवाइव्स’ की एक्ट्रेस फेलेसिटी हफमैन जो ऑस्कर के लिए नॉमिनेटेड थीं, ऑस्कर सेरेमनी में इस हीरे को पहनने वाली थीं, ने बाद में अपना इरादा बदल दिया. 1951 में इस हीरे को कटने के बाद अमेरिका के मशहूर म्यूजियम अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री में पहली बार पूरी दुनियां के सामने एक्जीबीशन में रखा गया था, उसके बाद 1964 में टैक्सास फेयर डलास में और 1967 में जोहांसबर्ग के डायमंड पवेलियन में भी एक्जीबीशन के लिए रखा गया था.
 
1951 में विल्सन ने इसकी कीमत 1.5 लाख डॉलर आंखी थी, 1969 में इसे दोगुनी कीमत यानी 3 लाख डॉलर में बेचा गया. 2004 में क्रिस्टी ने इसकी नीलामी की, तब इसे 3 लाख 52 हजार डॉलर में फिर से बेचा गया. खरीदने वाले थे हीरा व्यापारी डेनिस पेटिमेजस, अभी वही इसके मालिक हैं. अमेरिका में नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के साथ साथ वो नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम लंदन में भी इस हीरे की एक्जीबीशन लगा चुके हैं. वो हीरे को शापित नहीं मानते, कई साल से वो उसके मालिक हैं, और कहते हैं कि उन्हें इस हीरे की वजह से कभी कोई नुकसान नहीं हुआ. उनके मुताबिक या तो हीरा शापित नहीं है या उसका शाप खत्म हो गया है.
 
ऐसे में जबकि हीरा एक के बाद एक हाथों में बिकता गया, कभी फ्रांस, कभी रूस, कभी इटली, कभी अमेरिका तो कभी लंदन के लोगों के पास गया, यहां तक कि ऑस्ट्रिया में इसे कटने के लिए भेजा गया, भारत की सरजमीं से निकलने के बावजूद ना तो किसी भी भारत सरकार ने इस पर अपना दावा पेश किया और ना ही भारत के किसी व्यक्ति या संस्था ने. जब हीरों से जुड़ी हर संस्था, हर म्यूजियम और हर मालिक ये मानता आया है कि इसे भारत में पांडिचेरी के ब्रहमा मंदिर से चुराया गया था तो इस भारतीय धरोहर को वापस लेने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते? और प्रयास भी तो तब हों, जब भारतीय मीडिया, राजनेताओं, ऐतिहासिक धरोहरों के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को ही इसके बारे में जानकारी हो. दुर्भाग्य से एक कोहिनूर की चर्चा के आगे बाकी सब धरोहरें भुला दी गई हैं. जब डेनिस ने इसे खरीदा था तो बीबीसी ने ये रिपोर्ट ब्लैक ओरलोव के बारे में छापी थी– http://news.bbc.co.uk/2/hi/uk_news/england/london/4262862.stm
 
(ये लेखक के निजी विचार हैं)