साठ के दशक की बात है पटना में बसों के परमिट दिए जाने थे, सैकड़ों लोगों ने आवेदन किया हुआ था, लाइन में एक पैंतालीस-पचास साला व्यक्ति भी था. जब वो पटना के कमिश्नर से मिला और उसने अपना नाम बताया और कहा कि वो एक स्वतंत्रता सेनानी है तो पटना के कमिश्नर ने पूछा कि सर, आप स्वतंत्रता सेनानी हैं, मैं ये कैसे मान लूं आपके पास तो स्वतंत्रता सेनानी वाला सर्टिफिकेट भी नहीं है, पहले लाइए तब मानूंगा.
 
ऐसे में उस व्यक्ति को भगत सिंह का लिखा वो लैटर याद आ गया, जब वो अंडमान में काला पानी की सजा काट रहे थे. भगत सिंह ने लिखा था, “वे दुनिया को यह दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं” और आज इसका ये सिला मिला था उन्हें उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का सर्टिफिकेट मांगा जा रहा था.
 
कौन था ये व्यक्ति? ये व्यक्ति वो था जिसके सर पर जिम्मेदारी थी 1929 में सेंट्रल असेम्बली में बम फोड़ने की. आखिरी वक्त में उसके साथ सुखदेव को हटाकर भगत सिंह को कर दिया गया और आज के दिन यानी 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह के साथ मिलकर सेंट्रल असेम्बली जो आज की संसद है, में दो बम फोड़े और गिरफ्तारी दी. सोचिए, आज भगत सिंह को ही नहीं उनके खानदानियों को भी पूरा देश जानता है, तमाम नेता उनके बच्चों के भी पैर छूते हैं और एक तरफ उसी बम कांड में भगत सिंह का सहयोगी क्रांतिकारी को देश की आजादी के बाद स्वतंत्रता सेनानी होने का सर्टिफिकेट मांगा जाता है.
 
उन्हें अफसोस हुआ कि उन्हें फांसी क्यों नहीं हुई, कम से कम देश याद तो करता. वो उस वक्त भी बहुत निराश हुए थे, तब भगत सिंह ने उन्हें जेल से लैटर लिखकर साहस बांधा था कि जीवित रहकर भी क्रांतिकारी जेल की कोठरियों में हर तरह का अत्याचार सहन कर सकते हैं. हालांकि बस परमिट वाली बात पता चलते ही देश के राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद ने बाद में उनसे माफी मांगी थी.
 
बटुकेश्वर यूं तो बंगाली थे, बर्दवान से 22 किलोमीटर दूर 18 नवंबर 1910 को एक गांव औरी में पैदा हुए बटुकेश्वर, बीके दत्त, बट्टू और मोहन के नाम से उन्हें जाना जाता था, लेकिन हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए वो कानपुर आ गए. कानपुर शहर में ही उनकी मुलाकात चंद्रशेखर आजाद से हुई, उन दिनों चंद्रशेखर आजाद झांसी, कानपुर और इलाहाबाद के इलाकों में अपनी क्रांतिकारी गतिविधियां चला रहे थे. 1924 में भगत सिंह भी वहां आए, देशप्रेम के प्रति उनके जज्बे को देखकर भगत सिंह उनको पहली मुलाकात से ही दोस्त मानने लगे थे. 1928 में जब हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का गठन चंद्रशेखर आजाद की अगुआई में हुआ, तो बटुकेश्वर दत्त भी उसके अहम सदस्य थे. बम बनाने के लिए बटुकेश्वर दत्त ने खास ट्रेनिंग ली और महारत हासिल कर ली. एचएसआरए की कई क्रांतिकारी गतिविधियों में वो सीधे शामिल थे.
 
जब क्रांतिकारी गतिविधियों के खिलाफ अंग्रेजी सरकार ने डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट लाने की योजना बनाई तो भगत सिंह ने उसी तरह से सेंट्रल असेम्बली में बन फोड़ने का इरादा व्यक्ति किया जैसे कभी फ्रांस के चैम्बर ऑफ डेपुटीज में एक क्रांतिकारी ने फेंका था. एचएसआरए की मीटिंग हुई, तय हुआ कि बटुकेश्वर दत्त असेम्बली में बम फेंकेंगे और सुखदेव उनके साथ होंगे जब भगत सिंह उस दौरान सोवियत संघ की यात्रा पर होंगे. लेकिन बाद में भगत सिंह के सोवियत संघ के दौरे का प्लान रद्द हो गया और दूसरी मीटिंग में ये तय हुआ कि बटुकेश्वर दत्त बम प्लांट करेंगे लेकिन उनके साथ सुखदेव के बजाय भगत सिंह होंगे.
 
भगत सिंह को पता था कि बम फेंकने के बाद असेम्बली से बच कर निकल पाना मुमकिन नहीं होगा, ऐसे में क्यों ना इस घटना को बड़ा बनाया जाए, इस घटना के जरिए बड़ा मैसेज दिया जाए. इधर भगत सिंह सांडर्स को गोली मारने के बाद अपने बाल कटवा चुके थे. कई दिन तक वो और बटुकेश्वर रोज असेम्बली में जाकर चर्चा देखते थे और मुआयना करते थे कि किस तरह से और कब इस घटना को अंजाम दिया जाएगा. चार अप्रैल को भगत सिंह ने अपना हैट में वो प्रसिद्ध फोटो खिंचवाया जिसमें वो हैट में दिख रहे हैं, योजना थी कि गिरफ्तारी के फौरन बाद वो फोटो मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचना चाहिए, भगत सिंह शहादत के लिए मानो मन ही मन पूरी तरह तैयार थे. एक फोटो बटुकेश्वर दत्त का भी खिंचवाया गया था. ये फोटो कनॉट प्लेस के एक स्टूडियो में खिंचवाया गया. फिर वो परचे लिखे गए, जो गिरफ्तारी के वक्त असेम्बली में फेंके जाने थे.
 
8 अप्रैल 1929 का दिन था, पब्लिक सेफ्टी बिल पेश किया जाना था. बटुकेश्वर बचते बचाते किसी तरह भगत सिंह के साथ दो बम सेंट्रल असेम्बली में अंदर ले जाने में कामयाब हो गए. जैसे ही बिल पेश हुआ, विजिटर गैलरी में मौजूद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त उठे और दो बम उस तरफ उछाल दिए जहां बेंच खाली थी. जॉर्ज सस्टर और बी दलाल समेत थोड़े से लोग घायल हुए, लेकिन बम ज्यादा शक्तिशाली नहीं थे, सो धुआं तो भरा लेकिन किसी की जान को कोई खतरा नहीं था. बम के साथ साथ-साथ दोनों ने वो परचे भी फेंके, गिरफ्तारी से पहले दोनों ने इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद जैसे नारे भी लगाए. दस मिनट के अंदर असेम्बली फिर शुरू हुई और फिर स्थगित कर दी गई.
 
उसके बाद देश भर में बहस शुरू हो गई, भगत सिंह के चाहने वाले जहां ये साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि बम किसी को मारने के लिए नहीं बल्कि बहरे अंग्रेजों के कान खोलने के लिए फेंके गए थे, तो वहीं अंग्रेज और अंग्रेज परस्त इसे अंग्रेजी हुकूमत पर हमला बता रहे थे. हालांकि बाद में फोरेंसिक रिपोर्ट ने ये साबित कर दिया कि बम इतने शक्तिशाली नहीं थे. बाद में भगत सिंह ने भी कोर्ट में कहा कि उन्होंने केवल अपनी आवाज रखने के लिए, बहरों के कान खोलने के लिए इस तरीके का इस्तेमाल किया था ना कि किसी की जान लेने के लिए. लेकिन भगत सिंह के जेल जाते ही एचआरएसए के सदस्यों ने लॉर्ड इरविन की ट्रेन पर बम फेंक दिया.
 
गांधीजी ने इसके विरोध में आर्टिकल लिखा, कल्ट ऑफ बम तो जवाब में भगवती चरण बोहरा ने फिलॉसफी ऑफ बम लिखकर उनके साबरमती आश्रम में चुपका दिया. भगवती भगत सिंह को जेल से छुड़ाने के लिए बम तैयार करते वक्त फटे बम का शिकार होकर स्वर्गवासी हो गए तो चंद्रशेखर आजाद अलफ्रेड पार्क, इलाहाबाद में शहीद हो गए. सुखदेव, राजगुरू को गिरफ्तार कर लिया गया. इस तरह से पूरा एचएसआरए भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद से ही बिखरने लगा था.
 
इधर जिस फोटोग्राफर ने भगत सिंह के फोटो खींचने थे, उसके पास पुलिस का भी काम था, उसने वो फोटो पुलिस को भी उपलब्ध करवा दिए. भगत सिंह के बाकी साथी उन तस्वीरों को अखबारों के कई दफ्तरों में चुपके से देकर भी आए ताकि भगत सिंह की ये इच्छा पूरी हो सके कि उनकी गिरफ्तारी के बाद उनका हैट वाला फोटो छपे. लेकिन पुलिस को चूंकि पता चल चुका था इसलिए सारे अखबारों को दबे ढके चेतावनी दी जा रही थी. इधर कई दिनों के बाद वंदेमातरम नाम के अखबार ने पहली बार वो फोटो छापा लेकिन एक पम्फलेट के रूप में अखबार के अंदर रखकर वितरित किया ना कि अखबार के हिस्से के रूप में. तब जाकर उन लोगों को पता लगा उनके हीरो देखन में ऐसे लगते हैं.
 
भगत सिंह के साथियों ने ये ध्यान रखा था भगत सिंह का फोटो बटुकेश्वर के मुकाबल बड़ा हो और ऊपर हो, वैसा ही हुई. जनता के बीच उन तस्वीरों को देखकर ये मैसेज गया कि जब इतना बांका, हैटधारी युवा देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर सकता है तो हम क्यों नहीं, हमारे बच्चे क्यों नहीं. भगत सिंह की उस तस्वीर ने वाकई में कमाल कर दिया, उनकी वो तस्वीर लोगों के दिलो में ऐसी छपी कि धीरे धीरे उस केस का नाम जो पहले भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव, राजगुरु और अन्य बनाम सरकार कहा जाता था, वो अब भगत सिंह औ अन्य बनाम सरकार हो गया.
 
हालांकि मोटे तौर पर कोर्ट ने ये मान लिया कि बम किसी की जान लेने के इरादे से नहीं फेंका गया था, ऐसे में बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सजा हुई लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के सर पर सांडर्स की हत्या का इल्जाम भी था, सो उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई. बटुकेश्वर दत्त फैसले से निराश हो गए. उन्होंने ये बात भगत सिंह तक पहुंचाई भी कि वतन पर शहीद होना ज्यादा फक्र की बात है, तब भगत सिंह ने उनको एक पत्र लिखकर लिखा भी था, “वे दुनिया को यह दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं”.
 
भगत सिंह ने एक पत्र उनकी बहन को भी लिखकर ढांढस बंधाया था. बटुकेश्वर ने काला पानी की सजा में काफी अत्याचार सहन किए, पल पल फांसी के समान था. जेल में ही बटुकेश्वर को टीबी की बीमारी ने घेर लिया, उस वक्त इतने अच्छे इलाज भी नहीं थे. 1933 और 1937 में उन्होंने जेल के अंदर ही अमानवीय अत्याचारों के चलते दो बार भूख हड़ताल भी की, अखबारों में खबर छपी तो 1937 में उन्हें बिहार के बांकीपुर केन्द्रीय कारागार में शिफ्ट कर दिया गया और अगले साल रिहा भी कर दिया गया. एक तो टीबी की बीमारी और दूसरे उनके सारे साथी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, भगवती चरण बोहरा, राजगुरू, सुखदेव सभी एक एक करके दुनियां से विदा हो चुके थे. ऐसे में पहले उन्होंने इलाज करवाया, और फिर से कूद पड़े देश की आजादी के आंदोलन में. लेकिन इस बार कोई क्रांतिकारी साथ नहीं था, बटुकेश्वर ने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया और गिरफ्तार हो गए. 1945 में उन्हें जेल से रिहाई मिली.
 
आधी से ज्यादा जिंदगी देश की लड़ाई में गुजर चुकी थी, हौसला बढ़ाने वाले सारे साथी साथ छोड़ चुके थे. देश आजाद हुआ तो अब कोई मकसद भी सामने नहीं था. बटुकेश्वर ने शादी कर ली और एक नई लड़ाई शुरू हो गई, गृहस्थी जमाने की. आजादी की खातिर 15 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजारने वाले बटुकेश्वर दत्त को आजाद भारत में रोजगार मिला एक सिगरेट कंपनी में एजेंट का, जिससे वह पटना की सड़कों पर खाक छानने को विवश हो गए. बाद में उन्होंने बिस्कुट और डबलरोटी का एक छोटा सा कारखाना खोला, लेकिन उसमें काफी घाटा हो गया और जल्द ही बंद हो गया. कुछ समय तक टूरिस्ट एजेंट एवं बस परिवहन का काम भी किया, परंतु एक के बाद एक कामों में असफलता ही उनके हाथ लगी. पत्नी अंजली को एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना पड़ा.
 
उन्होंने किसी से सरकारी मदद नहीं मांगी, लेकिन 1963 में उन्हें विधान परिषद सदस्य बना दिया गया. लेकिन उनके हालात में कोई फर्क नहीं आया. बटुकेश्वर को 1964 में अचानक बीमार होने के बाद गंभीर हालत में पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया. इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, “क्या दत्त जैसे कांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए, परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है.
 
खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एडियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है.“ इसके बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया और अब्दुल कलाम आजाद, केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाब के मंत्री भीमलाल सच्चर से मिले. पंजाब सरकार ने एक हजार रुपए का चेक बिहार सरकार को भेजकर वहां के मुख्यमंत्री केबी सहाय को लिखा कि यदि वे उनका इलाज कराने में सक्षम नहीं हैं तो वह उनका दिल्ली या चंडीगढ़ में इलाज का व्यय वहन करने को तैयार हैं.
 
भगत सिंह की मां विद्यावती का भी प्रभाव था, जो भगत सिंह के जाने के बाद उन्हें बेटा ही मानती थीं, बटुकेश्वर लगातार उनसे मिलते रहते थे. बिहार सरकार अब हरकत में आयी और पटना मेडिकल कॉलेज में सीनियर डॉक्टर मुखोपाध्याय ने दत्त का इलाज शुरू किया. मगर उनकी हालत बिगड़ती गयी, क्योंकि उन्हें सही इलाज नहीं मिल पाया था और 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया. दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था, मुझे स्वप्न में भी ख्याल न था कि मैं उस दिल्ली में जहां मैने बम डाला था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाउंगा. बाद में पता चला कि दत्त बाबू को कैंसर है.
 
उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया. पीठ में असहनीय दर्द के इलाज के लिए किए जाने वाले कोबाल्ट ट्रीटमेंट की व्यवस्था केवल एम्स में थी, लेकिन वहां भी कमरा मिलने में देरी हुई. 23 नवंबर को पहली दफा उन्हें कोबाल्ट ट्रीटमेंट दिया गया और 11 दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती किया गया. पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन जब दत्त से मिलने पहुंचे और उन्होंने पूछ लिया, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए. छलछलाई आंखों और फीकी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए. बस मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए.
 
लाहौर षडयंत्र केस के किशोरीलाल अंतिम व्यक्ति थे जिन्हें उन्होंने पहचाना था. उनकी बिगड़ती हालत देखकर भगत सिंह की मां विद्यावती को पंजाब से मिलने आईं. 17 जुलाई को वह कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात 1 बजकर 50 मिनट पर बटुकेश्वर इस दुनिया से विदा हो गये. उनका अंतिम संस्कार उनकी इच्छा के मुताबिक भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के निकट किया गया. ये अलग बात है कि आज भी कोई नेता वहां जाता है तो उन तीनों की समाधि पर श्रद्धांजलि देने के बाद ही वापस लौट आता है, बटुकेश्वर की समाधि उन्ही की तरह उपेक्षित रहती है.
 
उपेक्षा का भाव इस कदर है कि अगर आज बटुकेश्वर, सुखदेव और राजगुरू की तस्वीरें एक साथ रख दी जाएं तो कोई तीनों में से अलग अलग करके नहीं पहचान पाएगा, आज की पीढ़ी तो बिलकुल नहीं. जब बटुकेश्वर आजीवन कारावास से रिहा हुए तो सबसे पहले दिल्ली में उस जगह पहुंचे जहां उन्हें और भगत सिंह को असेम्बली बम कांड के फौरन बाद गिरफ्तार करके हिरासत में रखा गया. दिल्ली में खूनी दरवाजा वाली जेल में, बच्चे वहां बैडमिंटन खेल रहे थे.
 
बच्चों ने उन्हें वहां चुपचाप खड़े देखा तो पूछा कि क्या आप बैडमिंटन खेलना चाहते हैं, उन्होंने मना किया तो पूछा, कि फिर आप क्या देख रहे हैं तो बीके ने जवाब दिया कि मैं उस जगह को देख रहा हूं जहां कभी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जेल में बंद थे तो बच्चो ने पूछा कौन भगत सिंह और कौन बटुकेश्वर दत्त? सोचिए उन पर क्या गुजरी होगी. वैसे भी उस दौर में पढ़े लिखे लोग कम थे, कम्युनिकेशन के साधन कम थे, बच्चों की स्कूल की क्लासों में राष्ट्रीय साहित्य था ही नहीं. लेकिन आज तो है, आज की पीढ़ी भी उन्हें ना जाने तो उनको अपनी कुर्बानी व्यर्थ ही लगेगी.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)