ये 1910-11 की बात होगी, मशहूर आर्यसमाजी और स्वतंत्रता सेनानी किसी को तलाश कर रहे थे, कई देशों में उस व्यक्ति की खबर मिली कि वो पेरिस में है, फिर पता चला कि अल्जीरिया चला गया है, वहां से क्यूबा या जापान जाने की बात कर रहा था, आखिरकार सुराग मिल ही गया. वो ढूंढते ढूंढते फ्रांस के दूरदराज के टापू पर जा पहुंचे, मार्टिनिक नाम था उस टापू का, उसी के समुद्रतट की किसी गुफा में डेरा जमाए हुए था वो सन्यासी, जो कभी सिविल सर्विस की नौकरी ठुकराकर आया था और जिसे दुनियां भर में मशहूर ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में पढ़ने के लिए दो दो स्कॉलरशिप मिली थीं और वो जिंदगी के सारे ऐशो आराम छोड़कर यहां दुनियां के दूसरे कौने में एक गुफा में साधना करने मे मग्न था और लक्ष्य था बस एक अपना राज.. स्वराज.
 
इस शख्सियत का नाम था लाला हरदयाल. ये भी बड़ी विडम्बना रही है कि हमारे देश के क्रांतिकारियों का इतिहास भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद जैसे गिनती के चेहरों के इर्द गिर्द सिमट गया और वहीं विदेशी धरती पर सालों तक अलख जगाए रखने वाले, अंग्रेजी सरकार के कुकृत्यों को दुनियां भर के देशों के सामने एक्सपोज करने वाले और विदेशों से धन, हथियार, राजनीतिक समर्थन ही नहीं सशस्त्र क्रांतिकारियों तक को भेजने वाले लोगों को तो देश में गिनती के लोग ही जानते हैं. मदन लाल धींगरा, ऊधम सिंह, करतार सिंह सराभा, रास बिहारी बोस, श्यामजी कृष्ण वर्मा, भीखाजी कामा, वीर सावरकर और लाला हरदयाल जैसे कई नाम इनमें शामिल हैं. लाला हरदयाल के पिता दिल्ली की एक डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में रीडर थे, दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से उन्होंने संस्कृत में डिग्री ली. प्रतिभाशाली इतने थे कि ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में पढ़ने के लिए उन्हें स्कॉलरशिप ऑफर की गई, वो भी दो दो.
 
लेकिन देश की आजादी को लेकर उनके तेवर शुरूआत से ही साफ थे, सख्त थे. ऑक्सफोड में पढ़ाई के दौरान ही 1907 में उन्होंने ‘इंडियन सोशलिस्ट’ मैगजीन में लिखे एक लेख में अंग्रेजी सरकार पर सवाल उठाते हुए एक कड़ा लेख लिख दिया, उसी वक्त उन्हें आईसीएस का पद ऑफर हुआ था, उन्होंने ‘टू हैल विद द आईसीएस’ (भाड़ में जाए आईसीएस) कहते हुए ऑक्सफोर्ड की स्कॉलरशिप तक छोड़ दी और अगले साल भारत वापस आ गए, यहां वो पूना जाकर तिलक से और लाहौर में लाला लाजपत राय से मिले. लेकिन वो अंग्रेजी सरकार की नजरों में आ चुके थे, उन पर नजर रखा जाना शुरू हो गय़ा. लेकिन भारत में उनका ये कड़े तेवरों वाला लेखन जब जारी रहा तो अंग्रेजी सरकार उन पर बैन लगाने और गिरफ्तार करने की सोचने लगी, लाला लाजपत राय को ये भनक लग गई. लाजपत राय को ये अनुमान था कि काला पानी जैसी सजा लाला हरदयाल के इरादे तोड़ सकती है, जैसे कि बाद में वीर सावरकर के साथ हुआ था. उन्होंने हरयाल को सलाह दी कि फौरन देश छोड़ दो, ये क्रांतिकारी लेखन विदेश की धरती से करोगे तो अंग्रेज सरकार कुछ नहीं कर पाएगी. हरदयाल तब तक ब्रिटिश अराजतावादी कम्युनिस्ट गाय एल्ड्रेड के संपर्क में आ चुके थे, जो इंडियन सोशलिस्ट छापता था.
 
लाला हरदयाल ने लाजपत राय की बात समझकर भारत छोड़ दिया और 1909 में वो पेरिस जा पहुंचे. जहां जाकर उन्होंने जिनेवा से निकलने वाली पत्रिका ‘वंदेमातरम’ का सम्पादन शुरू कर दिया. ये मैगजीन दुनियां भर में बिखरे भारतीय क्रांतिकारियों के बीच क्रांति की अलख जगाने का काम करते थे, हरदयाल के लेखों ने उनके अंदर आजादी की आग जला दी. हालांकि पेरिस में उन्हें लगा था कि भारतीय समुदाय मदद देगा, लेकिन जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने दुखी होकर पेरिस छोड़ दिया और वो अल्जीरिया चले गए, वहां भी उनका मन नहीं लगा, जहां से वो क्यूबा या जापान जाना चाहते थे लेकिन फिर मार्टिनिक चले आए. यहां आकर वो एक सन्यासी की तरह जीवन जीने लगे, कि भाई परमानंद उन्हें ढूंढते हुए ले आए और उनसे भारतभूमि को आजाद करवाने, भारतीय संस्कृति के प्रसार के लिए मदद मांगी.
 
किशोरवय से ही लाला हरदयाल को मेरा देश, मेरी भूमि, मेरी संस्कृति, मेरी भाषा पर कुछ ज्यादा ही भरोसा था. इसके लिए वो कुछ भी कर जाते थे, जबकि वो मंदिर तक नहीं जाते थे, पूजा नहीं करते थे, उनको मित्र उन्हें नास्तिक बोलते थे लेकिन उनको भारतीय भूमि से निकले हर धर्म, सम्प्रदाय, महापुरूष में काफी आस्था थी, भारतीय परम्पराओं से खासा लगाव था. जब एक बार लाहौर में उनकी वाईएमसीए (यंग मैन क्रिश्चियन एसोसिएशन) क्लब के सचिव से किसी बात को लेकर कहासुनी हो गई तो उन्होंने लाहौर मे यंग मैन इंडियन एसोसिएशन की स्थापना कर डाली. इसी एसोसिएशन के उदघाटन समारोह में हरदयाल के मित्र अल्लामा इकबाल ने अपनी मशहूर रचना सारे जहां से अच्छा.. पहली बार गाकर सुनाई थी.
 
भाई परमानंद ने उन्हें राजी किया कि वो अमेरिका में आर्यसमाज के प्रचार प्रसार में मदद करेंगे. लाला बोस्टन गए, वहां से कैलीफोर्निया गए, लेकिन फिर मेडीटेशन करने हवाई द्वीप के होनोलूलू में चले गए. जहां उनकी मुलाकात जापानी बौद्ध भिक्षुओं से हुई, काफी दिन उनके साथ गुजारे, साथ में वहीं उन्होंने कार्ल मार्क्स को पढ़ा. भाई परमानंद वापस उन्हें कैलीफोर्निया लेकर आए, वो लाला हरदयाल की प्रतिभा को जाया नहीं जाने देना चाहते थे. कार्ल मार्क्स का असर ये हुआ कि उन्हें मजदूरों की समस्याओं से रूबरू होने का मौका मिला. कैलीफोर्निया आते ही वो मजदूरों की यूनियन से जुड़ गए, वहीं दूसरी तरफ वो भारतीय दर्शन और संस्कृत का प्रचार प्रसार कर रहे थे. बहुत जल्द उनको मौका मिला और स्टेनफोर्ड यूनीवर्सिटी में इंडियन फिलॉसोफी और संस्कृत का लैक्चरर बनने का मौका मिल गया. लेकिन जिस मजदूर यूनियन से वो जुड़ गए थे, दरअसल वो अराजकता वादियों का बडा समूह था. उससे रिश्तों के चलते लाला हरदयाल को स्टेनफोर्ड यूनीवर्सिटी से अपना पद छोड़ना पड़ गया, बाद में हरदयाल ने उस समूह से भी दूरी बना ली.
 
लेकिन कैलीफोर्निया में उनकी मुलाकातें उस सिख समूह से होने लगीं, जो अपने देश को आजाद करवाने के लिए अमेरिका में संघर्ष कर रहा था. वो उन श्यामजी कृष्ण वर्मा के संपर्क मे भी आए, जो लंदन में इंडिया हाउस बनाकर कई क्रांतिकारियों को शरण दे रहे थे, उनको लंदन में स्कॉलरशिप देकर भारत से बुला रहे थे, वीर सावरकर और मदन लाल धींगरा ऐसी ही स्कॉलरशिप पर लंदन आए थे. लाला हरदयाल ने वैसी ही स्कॉलरशिप अमेरिका में शुरू कर दी, और एक घर इंडिया हाउस की ही तरह कैलीफोर्निया में उन स्टूडेंट्स के लिए खड़ा किया, जिनको स्कॉलरशिप पर अमेरिका पढ़ने के लिए बुलाया जा सकता था. करतार सिंह सराभा और विष्णु पिंगले जैसे 6 भारतीय लड़कों की अमेरिकी में पढ़ाई का इंतजाम किया गया. अमेरिका में उनकी मदद तेजा सिंह और तारक नाथ दास ने की. जबकि स्कॉलरशिप के लिए गुरु गोविंद सिंह एजुकेशनल स्कॉलरशिप फंड बनाने में उनकी मदद अमेरिका के अमीर किसान ज्वाला सिंह ने की.
 
जब दिल्ली में रास बिहारी बोस, बसंत विश्वास और अमीचंद ने लॉर्ड हॉर्डिंग पर दिल्ली में घुसते वक्त बम फेंक दिया तो अमेरिका में लाला हरदयाल खुशी से उछल पड़े. उन्होंने वहां एक जोरदार भाषण दिया, जिसमें मीर तकी मीर की दो लाइनें पढ़ डालीं—
पगड़ी अपनी सम्भालिएगा मीर,
ये और बस्ती नहीं.. दिल्ली है!!
 
नालंदा हॉस्टल में उनके भाषण के बाद माहौल देखने लायक था, वंदेमातरम गीत पर युवा नाचने गाने लगे. काफी खुश थे सभी कि वायसराय पर बम फेंककर भारतीय युवाओं ने दिखा दिया है कि उनके इरादे कितने खतरनाक हैं. ऐसे में वो 1914 में शुरू हुए विश्वयुद्ध को एक मौके के तौर पर देख रहे थे कि ब्रिटेन जब युद्ध मे फंस जाएगा तो 1857 की तरह हर भारतीय छावनी में क्रांति का बिगुल बजा दिया जाएगा और देश आजाद करवा लिया जाएगा. सोहन सिंह भखना ने अमेरिका में ही गदर पार्टी की नींव रखी, दुनियां भर के क्रांतिकारियों ने हाथ मिलाया. लंदन में श्याम जी कृष्ण वर्मा, भारत में बाघा जतिन और रास बिहारी बोस और अमेरिका में करतार सिंह सराभा और विष्णु पिंगले जैसे युवाओं ने कमान संभाल ली. लाला हरदयाल पत्र पत्रिकाओं में क्रांति के पक्ष में लेख लिख लिखकर माहौल बनाने में जुट गए थे कि अमेरिकी सरकार उनके लेखों से परेशान हो गई. वो निशाने पर आ चुके थे.
 
हरदयाल प्रवासी सिखों के बीच अलख जगाने का काम करने लगे थे. वो अपने ओजस्वी भाषणों के जरिए प्रवासी सिखों से भारत माता की सेवा करने के लिए भारत पहुंचने का आह्वान करते थे, माना जाता है कि दस हजार सिख उनसे प्रेरित होकर भारत निकल गए थे. उसी दौरान कामागाटामारू कांड भी हो गया.  अप्रैल 1914 में लाला हरदयाल को अमेरिका में गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन वो किसी तरह निकल भागे और उनकी अगली मंजिल बर्लिन थी, यहां उन्होंने जर्मनी. वहां से वो स्वीडन निकल गए, इस तरह कुल 13 भाषाएं हरदयाल सीख गए थे. इसी बीच वो अपनी पीएचडी लंदन की एक यूनीवर्सिटी से कर चुके थे. फिर वो लंदन में ही रहने लगे, अंग्रेजी सरकार उनकी हर हरकत पर नजर रखे हुई थी, लेकिन वो ब्रिटिश कानूनों के लूपहोल्स का फायदा उठाकर उनकी नाक के नीचे ही लंदन में जमे रहे.
 
1927 में देशभक्तो ने उन्हें भारत लाने की काफी कोशिशें की थीं, जो कामयाब नहीं हो पाईं. 1938 में फिर ऐसी कोशिशें कीं, ब्रिटिश सरकार ने उन्हें भारत जाने की इजाजत दे दी, सब लोग भारत में इंतजार भी करने लगे, देश का माहौल भी काफी बदल चुका था, माना जाने लगा था कि देश को आजादी मिलने में ज्यादा देर नहीं. लाला लंदन से निकल भी चुके थे कि अमेरिका के फिलाडेल्फिया से खबर आई कि 4 मार्च 1938 को लाला हरदयाल की मृत्यु हो गई है. उनकी किस्मत नहीं थी कि भारत भूमि को आजाद होते देखें, या वहां आकर अपनी अंतिम सांसें ले सकें. उनके मित्र हनुमंत सहाय मरने तक आरोप लगाते रहे कि हरदयाल को जहर देकर मारा गया था, उनकी मौत स्वभाविक नहीं थी. उस वक्त के विद्वानों का मानना था कि लाला हरदयाल जैसे प्रखर बुद्धि वाले महापुरूषों की आजाद भारत को वाकई में जरूरत थी. विदेशी की धरती पर ना जाने कितने लोगों को उन्होंने भारत मां को आजाद करवाने की पावन काम के प्रति जागरूक किया था और पीढ़ियों तक हिंदू और बौद्ध संस्कृति पर लिखी उनकी किताबें लोगों का मार्गदर्शन करती रहेंगी.
 
(ये लेखक के निजी विचार है)