19 दिसम्बर 1927 भारतीय आजादी के लिए लड़ रहे तीन बड़े क्रांतिकारियों को फांसी हुई थी. ये तीन महानायक थे पं रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाकुल्लाह खान. बंगाल और पंजाब क्रांतिकारियों के गढ़ थे, लेकिन यूपी में शायद तब तक की ये सबसे बड़ी क्रांतिकारी घटना थी.
 
बनारस के सचिन्द्र नाथ सान्याल ने खड़ा किया था संगठन हिंदुस्तान रिपब्लिकल एसोसिएशन यानी एचआरए. राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्लाह खान की अगुवाई में काफी फुल प्रूफ प्लानिंग की गई थी, ऐसे में एक नाबालिग क्रांतिकारी से हो गई एक बड़ी चूक जिसके चलते काकोरी ट्रेन डकैती कायमाबी से होने के बावजूद एक-एक करके सब पकड़े गए और कई क्रांतिकारियों को फांसी हो गई.
 
इस घटना के 70 साल बाद यानी उसी तारीख 19 दिसम्बर 1997 को दूरदर्शन ने उस क्रांतिकारी का काकोरी केस की याद में “सरफरोशी की तमन्ना” डॉक्यूमेंट्री के लिए एक इंटरव्यू किया तो उस क्रांतिकारी ने इस पूरी घटना में गलती की जिम्मेदारी अपने सर पर ली.
उस क्रांतिकारी ने  माना कि अगर उनसे वो गोली नहीं चली होती तो ना रामप्रसाद बिस्मिल पकड़े जाते और ना अशफाकुल्लाह और वो देश शायद पहले ही आजाद हो गया होता.  ये क्रांतिकारी जो बाद में लेखक बन गए उनका नाम था मन्मथ नाथ गुप्त.
1922 में जब गांधीजी ने चौरी-चौरा की घटना के बाद अचानक से असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो देश भर के क्रांतिकारियों को धक्का लगा था और ऐसे में उन क्रांतिकारियों ने तय किया कि क्रांति हथियारों के बल पर होगी और जान देकर भी देश को आजाद कराएंगे.
एचआरए के बैनर तले बंगाल और यूपी के क्रांतिकारियों ने बैठकें करनी शुरू कर दीं. बाघा जतिन के शहीद हो जाने  और रास बिहारी बोस के जापान चले जाने के बाद बंगाल के क्रांतिकारी संगठनों के कई लोग यूपी और दिल्ली की तरफ काम कर रहे संगठनों से संपर्क साधने में लगे हुए थे.
ऐसे में सबसे बड़ी समस्या थी धन की, इसलिए सबसे पहले काकोरी ट्रेन डकैती का प्लानिंग की गई.  इसमें बिस्मिल और अशफाक के अलावा आजाद, राजेन्द्र लाहिड़ी, केशव चक्रवर्ती, मुरारी गुप्त, रोशन सिंह, बनवारी लाल, राजकुमार सिन्हा आदि कई क्रांतिकारी शामिल थे.
इन्ही क्रांतिकारियों में था एक नाबालिग मन्मथ नाथ गुप्त.  सभी का प्लान था कि केवल पैसे की डकैती हो ताकि ब्रिटिश सरकार उसको ज्यादा सीरियस न ले. बाघा जतिन बंगाल में ऐसी 37 डकैतियां डाल चुके थे, तय था कि किसी पर अटैक नहीं करना, कोई गोली जब तक जान पर ना आ पड़े, नहीं चलानी.
 
9 अगस्त 1925 को शाहजहांपुर से लखनऊ आ रही 8 डाउन ट्रेन को काकोरी कस्बे के पास रोककर गार्ड की बोगी में रखे पैसों के थैलों को अपने कब्जे में लेकर भागने लगे कि अचानक एक गोली चल गई और हंगामा मच गया. इस डकैती में कुछ 8,000 रुपए की रकम हाथ लगी थी.
 
ट्रेन में किसी को कुछ पता नहीं था, लेकिन गोली चलते ही सबको पता चल गया. कई लोगों को पहचान लिया गया. ये गोली युवा क्रांतिकारी मन्मथ नाथ गुप्त के पिस्टल से अचानक चल गई और अहमद अली नाम का एक पैसेंजर मारा गया.
सब लोग पहले से तय ठिकानों की तरफ कूच कर गए. लेकिन मामला अब बड़ा हो गया, पहचान भी हो गई. एक-एक करके सचिन सान्याल, रामप्रसाद बिस्मल, रोशन सिंह, अशफाकुल्लाह खान सबको पकड़ लिया गया.
राजेन्द्र लाहिड़ी को बंगाल के दक्षिणेश्वर बम कांड के आरोप में फांसी दे दी गई तो बिस्मिल, रोशन सिंह और अशफाकुल्लाह खान को काकोरी केस में 19 दिसंबर 1927 के दिन फांसी दे दी गई. लेकिन मन्मथ नाथ गुप्त जिसकी पिस्टल से गोली चली थी, उसको फांसी नहीं मिली. कम उम्र के चलते उसको 14 साल की कैद हुई.
1937 में उनको छोड़ा गया लेकिन ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लिखने के चलते फिर 9 साल के लिए जेल भेज दिया गया. आजाद भारत में मन्मथ नाथ गुप्त ने सूचना प्रसारण मंत्रालय ज्वॉइन कर लिया और योजना, बाल भारती जैसी पत्रिकाओं का संपादन शुरू कर दिया.
 
जब दिल्ली दूरदर्शन ने 19 दिसम्बर को बिस्मिल की फांसी के 70 साल बाद 1997 में एक डॉक्यूमेंट्री बनाई तो उसी में  मन्मथ नाथ गुप्त ने अपनी गलती स्वीकार की. हालांकि ये वहीं मन्मथ नाथ गुप्त थे, जो चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी को एचआरए में लेकर आए थे.
आजाद ही बाद में एचआरए के प्रेसीडेंट बने और भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव आदि के साथ मिलकर एचआरए की क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाया.  एक गलती कभी आजाद ने भी की थी, एक बार मन्मथ नाथ गुप्त पर अपना खाली माउजर तान कर उन्हें डराने के लिए ट्रैगर दबा दिया था.
लेकिन उस माउजर में वाकई में गोली थी और वो 2 इंच की दूरी से गुप्त के सर के बगल से निकल गई. तब फूट फूट कर रोए थे आजाद. मन्मथ नाथ गुप्त ने इस घटना का उल्लेख अपने बायोग्राफी में किया है.