नई दिल्ली. राष्ट्रीय राजधानी में घातक तिहरी महामारी फैलने से हमारी व्यवस्था में त्रुटियों की पोल खुल गई है और विभिन्न शीर्ष अधिकारियों की खामियों के लिए जवाबदेही तय करने के लिए अधिकारों की बहुतायत को कम करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है. राजधानी में चिकनगुनिया, डेंगू और मलेरिया सहित विभिन्न रोगों से अब तक 30 लोगों की मौत हो चुकी है और नागरिकों को राहत प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय राजनीतिक दल एक-दूसरे पर निर्दयी व उदासीन दृष्टिकोण अपनाने का आरोप लगा रहे हैं. ऐसे में आप सरकार की घोर लापरवाही के लिए भाजपा और कांग्रेस भी समान रूप से दोषी हैं.
 
आप यहां लगभग एक वर्ष से सत्ता में है और चूंकि दिल्ली के पास मौजूदा विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए बुनियादी ढांचे का अभाव है, भारतीय राजनीति के दो प्रमुख दल किसी भी तरह खुद को दोषमुक्त करार नहीं दे सकते. बहरहाल, इसका यह मतलब नहीं है कि आद आदमी पार्टी को अपनी बेबसी व लाचारी दिखाने के लिए हर मोड़ पर हाथ खड़े कर देने चाहिए. इसके विपरीत, उसके नेताओं को जिम्मेदारी समझते हुए पूरी मुस्तैदी के साथ चुनौती से निपटने के लिए तत्पर रहना चाहिए.
 
बीते तीन दशकों में केवल दो मौकों पर नेताओं ने ऐसी अव्यवस्था से निपटने के लिए जोरदार कार्रवाई की है. पहला उदाहरण जुलाई 1988 में देखने को मिला, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हैजे और आंत्रशोध के प्रकोप को नियंत्रित करने में सरकार की विफलता के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर एचकेएल कपूर को बर्खास्त करने का कठोर कदम उठाया था. राजीव गांधी उस दिन विशेष रूप से मॉस्को से लौटे थे और पार्टी दिग्गज एचकेएल भगत द्वारा अधिकारियों के ढुलमुल रवैये की शिकायत करने पर उन्होंने अपनी पत्नी सोनिया गांधी के साथ नंद नगरी, सुंदर नगरी और गोकुलपुरी की तीन बुरी तरह से प्रभावित पुनर्वासित कालोनियों का दौरा किया था.
 
प्रधानमंत्री ने तीनों कालोनियों में दयनीय स्वास्थ्य परिस्थितियों और जीटीबी अस्पताल की अपर्याप्त तैयारियों को अपनी आंखों से देखा. दौरे के बाद राजीव गांधी ने अपने निवास पर बैठक की और लेफ्टिनेंट गवर्नर एचकेएल कपूर, मुख्य सचिव केके माथुर, नगर पालिका आयुक्त पीपी चौहान और डीडीए उपाध्यक्ष ओम कुमार की बर्खास्तगी का आदेश जारी किया. इसके अतिरिक्त उन्होंने स्थानीय निकायों के तीन मुख्य अभियंताओं के निलंबन का आदेश भी दिया. प्रधानमंत्री की अभूतपूर्व कार्रवाई ने सीधा और स्पष्ट संदेश भेजा और उसके बाद अफसरशाही ने सुनिश्चित किया कि शहर को भविष्य में हैजा और आंत्रशोध के प्रकोप से बचाने के लिए हरसंभव कदम उठाए जाएं.
 
कई लोगों द्वारा दिल्ली के सबसे बेहतरीन मुख्यमंत्री के रूप में समझे जाने वाले मदन लाल खुराना ने भी अगस्त-सितंबर 1994 में आगे बढ़कर नेतृत्व किया, जब प्लेग की महामारी ने राजधानी को चपेट में ले लिया था. नवंबर 1993 में भारतीय जनता पार्टी की विजय का मार्ग प्रशस्त करने वाले खुराना ने खुद मोर्चा संभालते हुए व्यक्तिगत रूप से साफ-सफाई के काम का जायजा लिया. नगर निगम आयुक्त सुभाष शर्मा के साथ मिलकर खुराना ने कचरे के ढेरों का दौरा किया और अधिकारियों को वातावरण स्वच्छ करने का आदेश दिया. उन्होंने सरकारी अस्पतालों में दवाओं की सुगम उपलब्धता भी सुनिश्चित की और हर घंटे स्थिति पर कड़ी नजर रखते थे. खुराना के प्रतिबद्ध उत्साह ने राजधानी को वास्तव में  बचा लिया.
 
दिसंबर 1998 में दिल्ली का मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने वाली शीला दीक्षित को दिल्ली के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी. हालांकि, वह अब उनके 15 वर्ष के कार्यकाल की उपलब्धियों पर शेखी बघारती हैं, यह उनका सौभाग्य था कि उनके प्रारंभिक छह वर्ष में लेफ्टिनेंट गवर्नर विजय कपूर उनके साथ थे. वह शहर की विभिन्न कमियों से परिचित थे. विजय कपूर को राजधानी का सबसे कुशल लेफ्टिनेंट गवर्नर कहा जा सकता है. उनके कारण शीली दीक्षित की अनुभवहीनता कभी भी खुलकर सामने प्रकट नहीं हो पाई. दीक्षित इस मायने में भी खुशकिस्मत थीं कि उनके चिर-प्रतिद्वंदी, दिवंगत राम बाबू शर्मा, उनकी पार्टी में थे. राम बाबू ने 2002 से 2007 तक नगर निगम को नियंत्रित किया.
 
वह सबसे सक्षम थे और उन्होंने सुनिश्चित किया कि नगर निकाय उसके सभी आवश्यक कर्तव्यों को पूरा करे. यह निगम को तीन शाखाओं में विभाजित करने का शीला दीक्षित का निर्णय ही है जिसके कारण नागरिक प्राधिकरण वर्तमान संकट से निपटने में विफल रहे हैं. धन की तंगी से जूझ रहा पूर्वी दिल्ली नगर निगम सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं उत्तरी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली नगर निगम उनके दायित्वों का निर्वहन लगन के साथ कर रहे हैं. इस स्थिति के लिए ‘आप’ को जवाब देना पड़ेगा. दूसरों पर उंगली उठाकर आप खुद को दोषमुक्त नहीं कर सकते और समाधान ढूंढ़ने से पहले उसे स्वयं की कमजोरियों को पहचानना होगा.
 
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल राजधानी में उपस्थित रहने के लिए अपने गले की सर्जरी को स्थगित कर सकते थे. इसमें कोई शक नहीं कि राजधानी में चिकित्सीय सेवाओं का संचालन केंद्र, दिल्ली सरकार और नगर निगम द्वारा किया जाता है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि सरकार को  महामारी से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से संबंधित एजेंसियों के साथ कार्य नहीं करना चाहिए. इस दुर्दशा के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर, मुख्य सचिव, स्वास्थ्य सचिव और निगम आयुक्त समान रूप से जिम्मेदार हैं.