अगर भारतीय जनता पार्टी ने गत सप्ताह एक उच्च स्तरीय पत्रकार सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री के मुद्दे पर चल रही बहस को विशिष्ट रूप से दर्शाया न होता तो इस संपूर्ण प्रकरण को सरलता के साथ शांत तरीके से दरकिनार किया जा सकता था. इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने वास्तव में दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए में डिग्री प्राप्त की है और विपक्ष द्वारा उनकी डिग्री को लेकर सार्वजनिक रूप से तमाशा खड़ा करना खेदजनक है. दिल्ली विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार द्वारा इस मामले को निश्चयात्मक तरीके से संबोधित किया जा सकता था जिन्हें वैसे भी कुछ दिनों बाद डिग्री के प्रमाणीकरण के साथ-साथ नरेंद्र मोदी की नामांकन संख्या व रोल नंबर बताने के लिए सार्वजनिक रूप से सामने आना पड़ा था. लेकिन इस घटनाक्रम से कुछ दिन पहले भाजपा के दो शीर्ष नेताओं ने एक संवाददाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री की बीए व एमए डिग्रियों को दिखाते हुए प्रधानमंत्री का जोरदार तरीके से बचाव किया. उन्होंने उन लोगों व स्थानों की सचित्र व्याख्या भी की जहां व जिनके साथ नरेंद्र मोदी दिल्ली विश्वविद्यालय में पूर्वस्तनाक शिक्षा ग्रहण करने के दौरान रहा करते थे. 
 
भाजपा नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस आम आदमी पार्टी के इस प्रचार व अभिकथन पर पलटवार करने के उद्देश्य से की गई थी कि उनके द्वारा दिखाई गई डिग्रियां नकली हैं और मोदी को इस बात का जवाब देना चाहिए कि उन्होंने देश से झूठ क्यों बोला. लेकिन, मीडिया के साथ परस्पर वार्ता से डिग्रियों की प्रामाणिकता से संबंधित और अधिक सवाल उठने के अलावा और कुछ हासिल नहीं हुआ. इसने लोगों के मन में अनावश्यक सवाल उत्पन्न करने के अलावा उनका ध्यान कांग्रेस को कठघरे में खड़े करने वाले अगस्ता,वेस्टलैंड घोटाले से हटाकर प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यताओं पर केंद्रित किया. 
 
प्रधानमंत्री का बचाव करने के लिए आगे आए अमित शाह और अरुण जेटली के श्रमसाध्य प्रयासों पर मीडिया से जुड़े संघ परिवार के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने भी अपनी व्याकुलता अभिव्यक्त की है क्योंकि इस मामले को समाप्त करने के लिए विश्वविद्यालय अथवा भाजपा की ओर से जारी किया एक सरल बयान ही पर्याप्त था. इसी बीच आम आदमी पार्टी ने मामले की गहराई तक पहुंचने का संकल्प लिया है और भाजपा के शीर्ष पदाधिकारियों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की असलियत पर अपने संदेह को पुन: दोहराया है. 
 
जाहिर है कि मोदी को ऐसे संकट से बाहर निकालने के प्रयास में जो कभी था ही नहीं, भाजपा ने सुनिश्चित किया है कि इस विषय पर अभी भी किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुंचा जाना बाकी है. यह कल्पना करना भी हास्यापद है कि अगर मोदी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकता नहीं की होती तब भी वह गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीतिक विज्ञान में मास्टर्स के कोर्स में दाखिला लेने के लिए योग्यता प्राप्त कर गए होते. एमए में दाखिला मोदी द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय की मार्क शीट, माइग्रेशन सर्टिफिकेट, डिग्री व अन्य आवश्यक दस्तावेजों की प्रस्तुति के बाद ही संभव था. किसी भी शैक्षणिक संस्थान में दाखिला लेने के लिए इस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है. माइग्रेशन सर्टिफिकेट पर दिल्ली विश्वविद्यालय के नामांकन संख्या व रोल नंबर दिखा रहे इन दस्तावेजों का रिकॉर्ड गुजरात विश्वविद्यालय के पास भी होना चाहिए. 
 
भाजपा के दो शीर्ष नेताओं द्वारा प्रस्तुत डिग्रियों पर तत्कालीन कुलपति प्रो. आरसी मेहरोत्रा व रजिस्ट्रार केएन थुसु के उभरे हुए हस्ताक्षर होने चाहिए. इसी तरह, मार्क शीट पर भी तत्कालीन परीक्षा-नियंत्रक मदन मोहन या उनके डिप्टी एसएन गुप्ता के संक्षिप्त हस्ताक्षर होने होने चाहिए. अगर डिग्री के प्रमाणीकरण के दौरान यह कवायद की गई होती तो किसी भी तरह की कोई बहसबाजी नहीं होती.
 
वैसे भी नरेंद्र मोदी को उनकी शैक्षणिक योग्यताओं के कारण भारत का प्रधानमंत्री नहीं चुना गया है. उन्हें उनके शासन कौशल और विकास की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए चुना गया है. डॉ. मनमोहन सिंह को छोड़कर किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का प्रतिष्ठित शैक्षणिक करियर नहीं रहा. जवाहरलाल नेहरू ने लंदन से वकालत की पढ़ाई की थी लेकिन वह कभी भी शीर्ष क्रम के छात्र नहीं रहे. हालांकि, इंदिरा गांधी ने स्विस फिनिशिंग स्कूल में पढ़ाई की थी, लेकिन वह ग्रेजुएट नहीं थीं. राजीव गांधी कैंब्रिज में परीक्षा में पास न हो सके और बाद में पायलट बनने का कोर्स किया. लालबहादुर शास्त्री, पीवी नरसिम्हा राव, इंद्र कुमार गुजराल, चंद्रशेखर और विश्वनाथ प्रताप सिंह में से किसी के भी पास विशिष्ट शैक्षणिक योग्यताएं नहीं थीं. 
 
सार्वजनिक जीवन में नेताओं की क्षमता का आकलन जनता की समस्याओं को पहचानने व उनके समाधान करने के साथ-साथ राष्ट्र व इसके नागरिकों की बेहतरी के लिए दीर्घकालिक नीतियों के निर्धारण से किया जाता है. अगर सुशासन के लिए शैक्षणिक योग्यता ही एकमात्र मानदंड होता तो शायद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आज इस देश के दैनिक कार्यों का संचालन कर रहे होते. नौकरशाही नागरिकों के लिए निरंतर बाधाएं उत्पन्न करती है और इस प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाली जटिलताओं को सुलझाने के लिए एक राजनीतिज्ञ की जरूरत पड़ती है. 
 
यह और बात है कि भारतीय राजनीतिज्ञों को अनावश्यक विवादों में घिरने की   आदत सी पड़ गई है. ऐसे राजनीतिज्ञों की कोई कमी नहीं है जिन्होंने अपनी शैक्षणिक योग्यताओं के बारे में संदिग्ध जानकारी प्रदान की है. अन्य राजनीतिज्ञों के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यताओं पर भी सवाल उठाए गए हैं. यह याद रखा जाना चाहिए कि एक कुशल नेता होने के लिए आवश्यक पात्रता उनकी मार्कशीट अथवा डिग्री में नहीं बल्कि देश को प्रगति पथ पर अग्रसर करने के साथ-साथ जनता के साथ सहानुभूति रखने व उनकी समस्याओं को सुलझाने की उनकी क्षमता में निहित है.