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महल में पर्सनल स्टेशन, लग्जरी ट्रेन, करोड़ों का रेलवे ट्रैक: वो नवाब, जिनका शाही रुतबा सरहदों पार तक फैला था!

आज लग्जरी लाइफस्टाइल का ट्रेंड तेजी से चल पड़ा है, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि आजादी से पहले भी भारतीय नवाबी ठाठ से जीते थे. शाही लाइफस्टाइल इस लेवल तक पॉपुलर थी कि अमीर लोग अपने घर के अंदर रेलवे स्टेशन और रेलवे ट्रैक बनवा रहे थे, जिससे होते हुए ट्रेन पाकिस्तान तक गई थी, जानें आज के भारत में कहां है ये ट्रेन और कौन है वो शख्स, जिसने इसे बनवाया था-

By: Kajal Jain | Published: May 5, 2026 3:24:34 PM IST



आज के समय में अमीरी प्राइवेट जेट से डिफाइन हो रही है. रईस लोग सोशल मीडिया पर ब्रांडेड कपड़े, कार, घड़ी, गहने और घरों की पब्लिसिटी कर रहे हैं, जबकि आजादी से पहले भारत के इस शख्स ने अपने लिए पर्सनल लग्जरी ट्रेन के साथ स्टेशन खड़ा करवा लिया था. करोड़ों की लागत वाला ये प्रोजेक्ट आ भी मौजूद है, जहां घर से अंदर से रेलवे ट्रेक निकलता है. इसी ट्रेक से होते हुए कभी पाकिस्तान तक का सफर तय किया जाता था. ये दास्तां आपको भी वाहवाही करने पर मजबूर कर देगी

कौन हैं वो नवाब?

ये कहानी है उत्तर प्रदेश की रामपुर रियासत के 9वें नवाब हामिद अली खान की, जो ब्रिटिश हुकूमत के दौरान शान से जीते थे. नवाब साहब का रुतबा इतना था कि स्टेशन तक जाने की जहमत ना उठानी पड़े, इसलिए मिलक से रामपुर तक करीब 40 किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछवा दी, जो महल के अंदर से होकर निकलती थी. इसके लिए एक पर्सनल रेलवे स्टेशन और लग्जरी ट्रेन तक डिजाइन कराई गई थी. 

लग्जरी ट्रेन की दास्तां

साल 1925 में नवाब हामिद अली खान ने स्पेशल ऑर्डर पर द सैलून बनवाई, जिसमें खास फारसी कालीन बिछाए जाते थे. तब ट्रेन में सागवान की नक्काशीदार फर्नीचर इंस्टॉल कराया गया. नवाबी टच देने के लिए नायाब परदे और शानदार झूमर तक लगवाए गए थे. ब्रिटिश काल में लोग इस ट्रेन को चलता-फिरता महल भी कहते थे. इस ट्रेन में नवाब साहब की सुविधा के लिए शानदार बेडरूम, डाइनिंग हॉल और किचन तक बनाए गए थे, जबि नौकर और रसोईए के लिए ट्रेन में अलग से इंतजामात थे.

आंगन में बनाया स्टेशन

4 बोगी वाली लग्जरी ट्रेन से जब भी नवाब साहब उतरते थे, तो सीधा अपने आंगन में पैर रखते थे. इमेजिन करने पर किसी फिल्मी सीन जैसा लगेगा, लेकिन उस समय में नवाब साहब के शाही ठाठ-बाट की मिसाल अंग्रेज भी दिया करते थे. यही वजह है कि आज भी द सैलून की यादों को नवाब साहब के महल में संजोया गया है.

पाकिस्तान तक गई ट्रेन

हालांकि रामपुर के नवाब सिर्फ अपने शाही ठाठ-बाट के लिए फेमस नहीं थे, आजादी से पहले बंटवारे के समय ट्रेन का इस्तेमाल दोनों देशों की सेवा के लिए किया गया. ये बात है साल 1947 की, जब लोग सरहदों को सुरक्षित पार करने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे, तब नवाब साहब ने कई परिवारों को सीमा पार करवाने में मदद की थी. साल 1960 तक नवाब साहब के चर्चे देश-विदेश में फैले थे, लेकिन 1960 में निधन के बाद शाही ट्रेन और नवाब हामिद अली खान की कहानी रामपुर के महल में दफ्त हो गई.

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Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. inkhabar इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

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