Home > अजब गजब न्यूज > Erwadi Tragedy: जलकर खाक हो गए ‘लोहे की जंजीरों से बंधे’ 28 लोग, चीख-पुकार सुन लोगों ने किया नजरअंदाज; कारण जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान!

Erwadi Tragedy: जलकर खाक हो गए ‘लोहे की जंजीरों से बंधे’ 28 लोग, चीख-पुकार सुन लोगों ने किया नजरअंदाज; कारण जानकर आप भी रह जाएंगे हैरान!

एरवाड़ी अग्निकांड को 25 साल पूरे होने वाले हैं. आज भी मानसिक रोगियों के प्रति लोगों के व्यवहार और अंधविश्वासी इलाज के जख्म कराह उठते हैं. इस घटना में करीब 28 के लोहे की जंजीरों में बंधे रहने के कारण जान चली गई थी.

By: Kajal Jain | Published: July 28, 2026 9:34:03 AM IST



आज के आधुनिक दौर में देश विभिन्न क्षेत्रों में विकास कर रहा है. तकनीक सफलता की नई ऊंचाईयों को छू रही है. देश की तुलना कई विकसित और विकासशील देशों से की जाती है लेकिन हमारे ही देश का एक दौर वह भी था जब मानसिक रोगियों का इलाज लोहे की भारी भरकम चेनों से बांधकर किया जाता था. उन्हें मानसिक तौर पर स्वस्थ करने या तबियत में बेहतरी दिलाने के बजाए प्रताड़नाएं दी जाती थी. और इसी प्रताड़ना का नतीजा यह हुआ कि महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में चलाए जा रहे मेंटल असायलम में रात को आग लग गई और 28 लोग सिर्फ इसलिए जलकर मर गए क्योंकि उसका शरीर लोहे की चेनों से बंधा हुआ था. हालांकि कुछ मरीजों की जंजीरें ढ़ीली थीं जिससे वह अपनी जान बचाने में सफल रहे लेकिन इस घटना से सरकार, कानून और न्याय व्यवस्था का ध्यान अपनी ओर खींचा जिसके बाद मानसिक रोगियों की सुरक्षा और सुविधा के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण कानून लाया गया.

आग से नहीं, जंजीरों में बंधे रहने से खाक हो गए मरीज

यह वारदात आज से करीब 25 साल पहले, 6 अगस्त 2011 की है. सुबह तड़के, तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के एरवाड़ी में एक फूस की झोपड़ी में आग लग गई. जिसमें जंजीरों से बंधे 43 मनोरोगी जलकर राख हो गए. उन्होंने मदद के लिए गुहार भी लगाई. चीख-पुकार की लेकिन लोगों ने यह समझकर नजरअंदाज कर दिया कि ‘मानसिक रूप से बीमार’ लोगों की सामान्य परेशानी हो सकती है. किसी ने ध्यान नहीं दिया और जंजीरों से बंधे 25 मानसिक बीमार से जूझ रहे लोग जलकर मर गए और 3 अन्य ने बाद में अपने घावों के कारण दम तोड़ दिया.

अचानक चर्चा में क्यों है मामला?

एरवाडी कांड को अगस्त में 25 साल पूरे हो जाएंगे. मानसिक रोगियों की देखभाल और इलाज से जुड़ी चिंताओं पर जागरुकता फैलाने के मकसद से साइकायट्रिस्ट डॉ. चर्वी कालरा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो शेयर की है. यह वीडियो अलग-अलग इंटरनेट प्लेटफॉर्म पर तेजी से फैल रही है और एक बार फिर समाज के एक और बड़े मामले पर सोचने पर मजबूर कर दिया है. एक्सपर्ट कालरा ने बताया कि एरवाड़ी एक फेमस जगह थी. जहां आने वाले परिवारों का मानना था कि ‘मानसिक बीमारी से ग्रस्त’ लोगों की तबियत में सुधार होने लगता है. इसी की तर्ज पर एरवाड़ी के आसपास के इलाके में भी मेंटल होम खुलने लगे. लेकिन वहां मरीजों की दुर्दशा कुछ खास अच्छी नहीं थी. वहां मरीजों को चेन से बांध दिया जाता था. कभी पेड़ तो कभी बिस्तर से बंधे मानसिक रोगी चीख-पुकार करते थे. यही कारण है कि एरवाडी कांड में जब चेन से बंधे मानसिक रोगियों ने चीख-पुकार की तो लोगों ने इसे एक सामान्य व्यवहार समझकर नजरअंदाज कर दिया.

बताया जाता है कि एरवाड़ी के मेंटल होम के करीब 45 पेशेंट भर्ती थी जिसमें से ज्यादातर इसलिए जान बचाने में सफल रहे क्योंकि उसकी चेन ढ़िलाई के साथ बांधी गई थी. वो जले नहीं और वहां से भाग निकले लेकिन अन्य 28 लोग इतने सख्ती से बंधे थे कि आग के सुपुर्द हो गए.

एवराड़ी कांड के बाद बड़ा एक्शन

एक्सपर्ट चार्वी कालरा बताती हैं कि महाराष्ट्र के एरवाड़ी मेंटल होम के अग्निकांड के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सुओ मोटो कॉग्निजेंस लिया. करीह 1 सप्ताह के लिए एरवाड़ी जैसे तमाम मेंटल होम बंद कर दिए गए. एरवाड़ी जैसे 500 मानसिक रोगियों को सरकारी की निगरानी में रखा गया था. फिर 2017 में, इस मामले को संज्ञान में लिया गया और मेंटल हेल्थ केयर एक्ट बनाया जिसमें साफ तौर पर मेंशन था कि मानसिक रोगियों को चेन में कैद करना कानून अपराध है.


देश में बेहद कम है साइकायट्रिस्ट की संख्या

डॉक्टर चार्वी कालरा ने उदाहरण देते हुए समझाया कि परिजन मानसिक रोगियों को अपने सबसे नजदीकी अस्पताल में लेकर जाते हैं. जिन अस्पतालों ने मानसिक रोगियों को ठीक किया वो फेमस हो गए. इसलिए एरवाड़ी के मेंटल होम में परिजनों ने अपने मानसिक रोगी रिश्तेदारों को छोड़ा था.क्योंकि उस दौर में सिर्फ वही मेंटल होम मौजूद था. उन्होंने बताया कि साल 2001 से लेकर आज तक, भारत में करीब 1 लाख लोगों के ऊपर सिर्फ 0.75 साइकायट्रिस्ट हैं. जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि कम से कम 1 लाख की आबादी पर 3 साइकायट्रिस्ट होने चाहिए. भारत में 9000 साइकायट्रिस्ट हैं जिसमें से 80 फीसदी शहरों में बसते हैं जबकि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा शहरों नहीं, छोटे कस्बों और गांव में रहता है.

ये भी पढ़ें:-‘अंतिम संस्कार’ के 5 दिन बाद, घर के दरवाजे पर आ गया ‘मरा हुआ शख्स’…उड़े घरवालों के होश, पुलिस भी रह गई हैरान!

Advertisement