नई दिल्ली. गुजरात कैडर के बर्खास्त IPS अधिकारी संजीव भटट् को आज जामनगर सेशन कोर्ट ने तीन दशक पुराने हिरासत में मौत मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. संजीव भट्ट को नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा विरोधी माना जाता है. संजीव भट्ट ने 2002 गोधरा दंगे मामले में सुप्रीम कोर्ट में उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी के खिलाफ शपथ पत्र दाखिल कर उन पर दंगा भड़काने का आरोप लगाया था. संजीव भट्ट ने कहा था कि गोधरा में कारसेवकों को जिंदा जलाने की घटना के बाद मुख्यमंत्री मोदी ने अपने आवास पर मीटिंग बुलाई थी. भटट् ने कहा था कि इस मीटिंग में नरेंद्र मोदी ने पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया था कि हिंदूओं का गुस्सा निकल जाने दें, उन पर कोई कार्रवाई न की जाए. हालांकि बाद में एसआईटी जांच में यह बात सामने आई कि संजीव भट्ट उस मीटिंग में शामिल ही नहीं हुए थे. आइए जानते हैं आखिर एक आईपीएस अफसर से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे बड़े विरोधी बनने वाले संजीव भट्ट आखिर हैं कौन

21 दिसंबर 1963 को मुंबई में जन्मे संजीव भट्ट भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह गुजराती हैं. उन्होंने आईआईटी से एम टेक की डिग्री हासिल की है. 1988 में संजीव भट्ट ने आईपीएस ज्वाइन की और उन्हें गुजरात कैडर मिला. 1990 में जब वो एएसपी थे उसी दौरान गुजरात के जामनगर में दंगा भड़क उठा. भट्ट ने इस मामले में 150 लोगों को हिरासत में लिया. इसी दौरान प्रभुदास वैश्णानी नाम के शख्स की किडनी फेल होने की वजह से मौत हो गई. मृतक प्रभुदास के परिजनों ने भट्ट सहित छह पुलिसवालों पर मुकदमा दर्ज करा दिया. 1996 में जब संजीव भट्ट बनासकांठा जिले के एसपी थे तब भी उन पर राजस्थान के एक वकील को गलत तरीके से नार्कोटिक्स के मामले में फंसाने का आरोप लगा. 1998 में एक बार फिर से संजीव भट्ट पर कस्टडी में आरोपी को टॉर्चर करने का आरोप लगा.

2002 गुजरात दंगे से बदली संजीव भट्ट की कहानी
1999 से सिंतबर 2002 तक संजीव भट्ट गुजरात के स्टेट इंटेलीजेंस ब्यूरो के डिप्टी कमिश्नर थे. इस दौरान वो राज्य की आंतरिक सुरक्षा, सीमा और तटीय सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी. उनके पास मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा की भी जिम्मेदारी थी. इसी दौरान गुजरात में गोधरा एक्सप्रेस में कारसेवकों को चलती ट्रेन में जिंदा जला दिया गया जिसके बाद राज्य में हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे. इसी के बाद 9 सिंतबर 2002 को नरेंद्र मोदी ने बढ़ती मुस्लिम जन्म दर पर एक बयान दिया जिसपर अल्पसंख्यक आयोग ने संज्ञान लिया. हालांकि राज्य सरकार ने ऐसे किसी भी भाषण से इनकार कर दिया लेकिन संजीव भट्ट की अगुवाई वाले राज्य इंटेलीजेंस ब्यूरो ने इस भाषण की एक कॉपी आयोग को सौंप दी. जाहिर है राज्य सरकार के गुस्से का स्टेट इंटेलीजेंस ब्यूरो के अधिकारियों को सामना करना पड़ा. संजीव भट्ट सहित कई अधिकारियों का तबादला कर दिया गया.

साबरमती जेल में गाजर के हलवे से मशहूर हुए थे संजीव भट्ट
2003 में संजीव भट्ट को साबरमती जेल का सुपरिटेंडेंट बनाया गया. इस दौरान वह कैदियों के बीच काफी लोकप्रिय हो गए.उन्होंने कैदियों के भोजन मेन्यू में गाजर का हलवा जैसी चीजें डलवाईं. लेकिन अपनी नियुक्ति के दो महीने बाद ही उनका ट्रांसफर कर दिया गया. वजह बताई गई संजीव भट्ट का कैदियों के साथ अत्याधिक मित्रतापूर्ण बर्ताव. 18 नवंबर 2003 को साबरमती जेल के लगभग दो हजार कैदियों ने भट्ट के ट्रांसफर के विरोध में भूख हड़ताल कर दी. छह कैदियों ने तो अपनी नसें काटकर विरोध जताया. संजीव भट्ट के साथ ज्वाइन करने वाले लोग आईजीपी पद तक पहुंच गए थे लेकिन भट्ट एक दशक तक एसपी के पद पर ही रहें. उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की वजह से भी उनका प्रमोशन नहीं हो पाया.

गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या की मर्डर मिस्ट्री
2002 में गुजरात दंगों के बाद गुजरात के उस वक्त के गृह मंत्री हरेन पांड्या ने कहा था कि 50 कारसेवकों की मौत के बाद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलिस अधिकारियों की बैठक में कथित तौर पर कहा था कि हिंदुओं का गुस्सा निकल जाने दीजिए. हरेन पांड्या ने कई पुलिसवालों का नाम बताया था जो इस बैठक में शामिल थे. हालांकि संजीव भट्ट का नाम उन्होंने नहीं लिया था. कुछ दिनों बाद हरेन पांड्या की अज्ञात शख्स द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई. गुजरात दंगो के 9 साल बाद 14 अप्रैल 2011 को संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में एक शपथ पत्र दायर किया. इस शपथ पत्र में संजीव भट्ट ने वहीं बातें दोहराई थीं जो गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पांड्या ने कही थीं. संजीव भट्ट ने कारसेवकों के शव अहमदाबाद लाने के मोदी के फैसले के विरोध की बात भी कही. हालांकि बाद में एसआईटी जांच में संजीव भट्ट का यह दावा गलत साबित हुआ कि वो उस मीटिंग में मौजूद थे. नरेंद्र मोदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दायर करते ही संजीव भट्ट को गुजरात में मोदी विरोध के बड़े चेहरे के तौर पर देखा जाने लगा. देश भर में संजीव भट्ट नरेंद्र मोदी के खिलाफ बयानबाजी करते रहे. 8 अगस्त 2011 को गुरजरात सरकार ने संजीव भट्ट को सस्पेंड कर दिया. बर्खास्तगी का कारण बताया गया कि संजीव भट्ट अनाधिकारिक तौर पर ड्युटी से अनुपस्थित रहे, जांच कमेटी के सामने पेश नहीं हुए और ऑफिस की कार को पर्सनल कामों के लिए इस्तेमाल करना.

मोदी विरोध की सजा पा रहे हैं संजीव भट्ट?
दिलचस्प बात यह है कि 1990 के जिस मामले को लेकर आज संजीव भट्ट को उम्र कैद की सजा हुई है, वह मामला ही गुजरात सरकार नहीं चलवाना चाहती थी. गुजरात सरकार ने कोर्ट से इस मामले को रद्द करने की मांग भी की थी. लेकिन जैसे ही संजीव भट्ट ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दाखिल किया गुजरात सरकार ने हिरासत में मौत मामले को रद्द करने की अपील वापस ले ली. 27 सिंतबर को संजीव भट्ट जब अदालत में पेश हुए तो उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व गुजरात गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे हरेन पांड्या मर्डर केस के सबूतों को मिटाने का दबाव बनाया था. भट्ट ने कोर्ट को बताया था कि जब वो साबरमती जेल के सुपरीटेंडेंट थे तब हरेन पांड्या के मर्डर के आरोपी असगर अली ने उन्हें बताया था कि पांड्या की हत्या तुलसीराम प्रजापति नाम के शख्स ने की थी. संजीव भट्ट ने कहा कि जब उन्होंने यह बात अमित शाह को बताई तो उन्होंने इस मामले से जुड़े सारे सबूत नष्ट करने को कहा. गौरतलब है कि तुलसीराम प्रजापति की बाद में फेक एनकाउंटर में हत्या हो गई थी. संजीव भट्ट को उम्र कैद की सजा सेशन कोर्ट ने दी है. उनके पास ऊपरी अदालत में सजा के खिलाफ अपील करने का मौका है.

Former Gujarat IPS Sanjiv Bhatt Sentenced Life Term: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुखर विरोधी रहे गुजरात कैडर के बर्खास्त IPS अधिकारी संजीव भट्ट को आजीवन कारावास की सजा, तीन दशक पुराने हिरासत में मौत मामले पर आया फैसला

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