हैदराबाद: 18 मई 2007, दोपहर के 1:15 बजे चार मिनार के पास स्थित मक्का मस्जिद में वजुखाने के पास एक जोरदार धमाका होता है. जिसमें आठ लोगों की मौत हो जाती है और 58 लोग घायल हो जाते हैं. इसके बाद आक्रोशित भीड़ घटनास्थल पर पहुंचने की कोशिश करती है जिसे रोकने के लिए पुलिस को फायरिंग करनी पड़ती है. इस घटना में पांच लोगों की पुलिस की गोली लगने से मौत होती है.

सोमवार को एनआईए कोर्ट ने इस मामले में सभी 5 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया जिसमें बलास्ट का मुख्य आरोपी असीमानंद भी शामिल है. इस मामले की पहली रिपोर्ट हुसैनी आलम पुलिस थाने में दर्ज की गई थी जिसके बाद 38 मुस्लिम युवकों को हिरासत में लिया गया था. जिनपर ब्लॉस्ट में शामिल होने का शक था. 9 जून 2007 को इस मामले को सीबीआई को सौंपा गया और फिर 7 अप्रैल 2011 को ये मामला एनआईए के सुपुर्द किया गया. हालांकि लोकल पुलिस ने शुरूआती जांच में इस ब्लॉस्ट के पीछे लश्कर-ए-तैयबा या हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी का हाथ होने का शक जताया था लेकिन बाद में सीबीआई जांच में शक इस बात पर गया कि राइट विंग ग्रुप अभिनव भारत ने इस ब्लॉस्ट को अंजाम दिया.

मई 2010 की शुरूआत में सीबीआई ने कहा कि मक्का ब्लॉस्ट और 2008 के अजमेर दरगाह ब्लॉस्ट में आपसी संबंध हैं. इसके पीछे ब्लॉस्ट के तरीके और पैटर्न को वजह बताया गया जैसे फोन डिवाइस टाइमर, जिस तरह का बम धमाके में इस्तेमाल किया गया, सिम कार्ड खरीदने के लिए इस्तेमाल किया गया आईडी प्रूफ और ब्लॉस्ट करने के पीछे का तरीका. तत्कालीन सीबीआई निदेशक अश्विनी कुमार ने कहा था कि हम इस जांच को आगे लेकर जा रहे हैं.

19 नवंबर 2010 को नबा कुमार सरकार उर्फ स्वामी असीमानंद जो साल 2008 से ही फरार चल रहा था उसे मक्का ब्लॉस्ट केस मामले में हरिद्वार से गिरफ्तार किया गया. एनआईए की जांच में असीमानंद ने लिखित तौर पर माना कि उसने और अभिनव भारत से जुड़े लोगों ने मक्का ब्लॉस्ट की साजिश रची और धमाका किया. अभिनव भारत के दस सदस्य जिनमें नबाकुमार सरकार उर्फ स्वामी असीमानंद, देवेंद्र गुप्ता, लोकेश शर्मा, लोकेश शर्मा उर्फ अजय तिवारी, लक्षमणदास महाराज, मोहनलाल रातेश्वर और राजेंद्र चौधरी को आरोपी बनाया गया.

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