नई दिल्ली. वैश्विक आर्थिक मंदी की आहट भारत में भी महसूस की जा रही है. पिछले कुछ सालों में चाहे वो मनमोहन सिंह की कांग्रेस नीत यूपीए सरकार हो या नरेंद्र मोदी की बीजेपी नीत एनडीए, आर्थिक अपराधों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है. यूपीए सरकार में जहां घोटालों की अंतहीन श्रंखला से ही अखबार पटे हुए थे वहीं मोदी सरकार में आर्थिक अपराधियों के देश छोड़ कर भागने की घटनाओं ने चर्चा बंटोरी है. विजय माल्या हो मेहुल चौकसी या नीरव मोदी, देश का हजारों करोड़ रुपये लेकर फरार हैं. दिलचस्प बात यह है कि ये तमाम वो बिजनेसमैन हैं जिन्हें सरकार और बैंकों ने नियमों को ताक पर रखकर कर्ज दिया. विजय माल्या तो जब देश छोड़कर भागा, वो राज्यसभा का सांसद भी था. लालची अरबपतियों के इस दौर में विनोबा भावे को याद करना दिलचस्प है. महात्मा गांधी का ऐसा चेला जिसकी एक आवाज पर लोगों ने अपनी जमीनें दान में दे दीं. भूदान आंदोलन के जनक विनोबा भावे को याद करते हुए देश की आर्थिक संस्कृति के पतन पर नजर डालते हैं.

भारत में आर्थिक शुचिता का महत्व हमेशा रहा है. गलत तरीके से कमाए गए धन को पाप की कमाई कहा जाता था. तमाम धर्मग्रंथ से लेकर मुहावरे इस बात की ताकीद करते हैं कि गलत तरीके से कमाया गया धन हमेशा गलत नतीजा ही देता है. बहुत समय तक देश के लोग इन बातों पर यकीन भी करते थे. महात्मा गांधी ने भी साध्य और साधन दोनों के पवित्रता की बात की थी. विनोबा भावे जब बहुत छोटे थे तब ही उनके पिता नरहरि राव ने उन्हें गांधी को सौंप दिया.

विनोबा आजीवन गांधी के शिष्य रहे. जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया तब भी उन्होंने विनोबा को अपना पहला सत्याग्रही घोषित किया. अहिंसा के पुजारी विनोबा ने क़ुरान पर किताब लिखी तो ईसाई धर्म पर भी. भगवद गीता के सिद्धांतों को तो उन्होंने जीवन दर्शन बना लिया था. धार्मिक कट्टरता के इस दौर में विनोबा भावे की यह उदार धार्मिकता ही भारत की आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है. विनोबा भावे ऐसे शिष्य थे जिस पर किसी भी गुरू को गर्व हो. यहीं कारण है कि अब उन्हें आचार्य विनोबा भावे के तौर पर याद किया जाता है.

जी हां, इसी देश में अमीरों ने गरीबों के लिए अपनी जमीनें दान में दे दी थीं
1951 में विनोबा भावे के पास न गांधी थे न आजादी का वो महान लक्ष्य जिसमें उन्होंने जिंदगी के इतने साल खपाए थे. पंडित नेहरू देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री थे. नेहरू ने राजनैतिक तौर पर गांधी की विरासत संभाली लेकिन गांधी सिर्फ राजनेता ही होते तो उनके नाम के आगे महात्मा न जुड़ता. गांधी की राजनितिक विरासत से कहीं बड़ी थी उनकी मानवीय और आध्यात्मिक विरासत. इसके वारिस निर्विवाद रूप से विनोबा भावे थे.

1951 में तेलंगाना में अपने गांव नालगोंडा की जमीन दान में देकर विनोबा ने भूदान आंदोलन की शुरूआत की. वो सभी अमीरों से अपील करते कि आप मुझे अपना बेटा मानकर अपनी जमीन का छठां हिस्सा गरीबों के नाम दान दे दें. इस तरह दुनिया का सबसे बड़ा स्वैच्छिक भूदान आंदोलन शुरू हुआ. देखते देखते लगभग हजार गांव विनोबा को दान में मिले. लाखों एकड़ जमीन उन्हें दान में मिली. यह दीगर बात है कि धीरे धीरे यह आंदोलन धीमा पड़ता गया. दान में मिली जमीन के पूर्ण इस्तेमाल पर भी सवाल उठे.

आज क्यों याद किया जाना चाहिए विनोबा भावे को
आपने भी खबरें देखी, पढ़ी होगी कि भूख से इस देश में लोगों की मौत हो रही है. यह भी खबर पढ़ी होगी कि महंगे अपार्टमेंट में महीनों लाश सड़ती रही और न रिश्तेदारों को पता चला न पड़ोसियों को. अब किसी भी तरह धन कमान नई नैतिकता है. आर्थिक अपराधियों को भी इज्जत की नजर से देखा जा रहा है. ऐसे में सोचना होगा कि क्या हम ऐसा ही भारत चाहते हैं. क्या आप अपने बच्चों को यहीं सिखाना चाहते हैं. विनोबा भावे जैसा बुजुर्ग उदाहरणों में और स्मृतियों में रहना जरूरी है ताकि हमारे हाथ से उस भारत का सपना न छूट जाए जिसे बनाने के लिए असंख्य लोगों ने कुर्बानी दी है. हम नैतिक तौर पर दिवालिए न हो जाएं, हमारे अंदर कट्टरता और लालच इतना न बढ़ जाए कि इंसानियत कहीं बहुत पीछे छूट जाए. विनोबा भावे की 125वीं जयंती पर हम उन्हें पूरी श्रद्धा से याद कर रहे हैं. अंत में जैसा विनोबा कहते थे, “जय जगत”

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