नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश में पिछले चार सालों में करीब तीन हजार मान्यता प्राप्त मदरसे ‘गायब’ हो गये। बताया जा रहा है कि ऐसा मदरसा पोर्टल पर पंजीकरण की सख्त निगरानी और नयी नियमावली की वजह से हुआ। दरअसल 18 अगस्त 2017 को उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद का मदरसा पोर्टल लांच हुआ उससे पहले परिषद के रिकॉर्ड में कुल 19, 123 मान्यता प्राप्त मदरसे पंजीकृत थे। अब इनमें से कुल 16, 222 पंजीकृत मदरसे अस्तित्व में हैं। इनमें से सिर्फ 558 मदरसे ही ऐसे हैं जिन्हें प्रदेश सरकार अनुदान देती है। बाकी पंजीकृत मदरसे ज़कात और चंदे से चलते हैं।

मदरसा पोर्टल आने से पहले प्रदेश में संचालित मदरसों की सारी जानकारी सिर्फ कागजों पर ही हुआ करती थी। मदरसे की जगह, संचालक, भवन, छात्रों, शिक्षकों व कर्मचारियों के ब्योरे की छानबीन में भी लापरवाही हुआ करती थी। इसी लापरवाही का फायदा उठाते हुए प्रदेश के विभिन्न अचंलों में खासतौर पर गोण्डा, बस्ती, बहराइच, बलरामपुर आदि नेपाल के सीमावर्ती जिलों में तमाम मदरसे वजूद में आ गये थे। हकीकत तो यह थी कि इनमें से तमाम मदरसे सिर्फ कागजों पर ही थे। जकात और चन्दे की रकम हड़पी जा रही थी।

नई नियमावली के अनुपालन के क्रम में मदरसा शिक्षा परिषद और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अफसरों ने भी मदरसा पोर्टल पर पंजीकृत प्रत्येक मदरसे की छानबीन शुरू की और इसी सख्त जांच पड़ताल में करीब तीन हजार मदरसे वजूद में ही नहीं मिले।

मोहसिन रजा ने कही ये बातें

अल्पसंख्यक कल्याण राज्य मंत्री मोहसिन रजा ने कहा कि यह जो तीन हजार मदरसे पिछले चार वर्षों में कम हुए या गायब हुए दरअसल यह एक फर्जीवाड़ा था। ऐसी कई शिकायतें मिली थी कि एक ही शिक्षक कई-कई मदरसों में अध्यापन कर रहा है और वेतन ले रहा है, प्रबंधक अपने रिश्तेदारों को ही शिक्षक बनाए हुए हैं, शिक्षकों की योग्यता पर भी सवाल उठे। इसीलिए मानव सम्पदा पोर्टल बना और इन शिकायतों की पड़ताल के लिए एसआईटी भी गठित हुई जिसकी रिपोर्ट पर कार्रवाई भी हो रही है। 

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