नई दिल्ली. 1940 की गर्मियों में लंदन की एक कोर्ट का माहौल और भी ज्यादा गरम हो गया था. जज एटकिंसन चाहता था कि आरोपी केवल वो वजहें कोर्ट को बताए, जिसके लिए उसे फांसी ना दी जाए. लेकिन आरोपी जो एक भारतीय युवा था, वो तो कोई सफाई देने को तैयार ही नहीं था, ना वो ये कह रहा था कि उसे फांसी मत दो या उसने कोई गुनाह नहीं किया. वो तो कोर्ट में अपनी बात रखना चाहता था, इसलिए जेल में तैयार ऐसे कई नोट्स लेकर आया था, जिन्हें वो भरी कोर्ट में मीडिया के सामने बोलना चाहता था. इसी बातचीत में उसने अपनी आखिरी ख्वाहिश भी कोर्ट में बताई कि वो 23 तारीख को ही अपनी फांसी चाहता है. फिर भी कोर्ट ने उसकी ये आखिरी ख्वाहिश पूरी नहीं की.

ये क्रांतिकारी युवा था ऊधम सिंह, जिसने लंदन जाकर जलियां बाले बाग हत्याकांड के लिए जिम्मेदार जनरल डायर के बॉस और उस वक्त पंजाब के गर्वनर रहे माइकिल ओ डायर के सीने में उसके अपने लोगों के बीच कई गोलियां दाग दी थीं. जज चाहता था कि वो अपनी सफाई दे, जबकि ऊधम सिंह ये बताना चाहता था कि उसने ये हत्या क्यों की. आखिरकार जज मान गया, ऊधम सिंह ने जो एक बार बोलना शुरू किया, वहां खड़े सभी पुलिस अधिकारियों, कोर्ट अधिकारियों, वकीलों और जज के अंदर तक आग लग गई.

‘’तुम लोग भारत जाते हो, तो काम करके लौटकर आने के बाद तुम्हें हाउस ऑफ कॉमंस में सजाया जाता है, मोटे मोटे इनाम दिए जाते हैं और एक हम लोग हैं, जो भारत से यहां आते हैं और अपना काम करने के बाद हमें फांसी पर लटका दिया जाता है. मैंने उसे मारा केवल विरोध जताने के लिए, भारतीयों को और तुम अंग्रेजों को ये दिखाने के लिए कि मैं मरूंगा केवल इसलिए ताकि हजारों भारतीय युवा आएं और अपने देश को आजाद करवाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दें. क्या करूंगा बूढ़ा होकर, जब देश पर मरने के लिए, कुर्बान होने के लिए मुझे मौका जवानी में ही मिल रहा है? मैंने उसे मारा ताकि पूरी दुनियां के सामने ब्रिटिश कुत्तों की गुलामी में रह रहे देशवासियों की गंदी हकीकत को सामने ला सकूं, बता सकूं कि आप लोग जिस देश को सभ्य करने का श्रेय ले रहे हैं, असलियत में उसको लूट खसोटकर आप लोग अपनी तिजोरियां भर रहे हैं, और भारतीयों पर क्रूर अत्याचार कर रहे हैं.‘’

ऊधम सिंह के इस बयान से जज भड़क उठा, उसने फौरन मीडिया को आदेश किया- ‘I give a direction to the Press not to report any of the statement made by the accused in the dock. You understand, members of the press?’. इस तरह सालों तक ऊधम सिंह का ये प्रेरणादाई भाषण कोर्ट की चाहरदीवारी में ही कैद रहा, सालों बाद पुलिस रिकॉर्ड से ये बाहर आया. लेकिन तब तक देश के बच्चों को पढ़ाने के लिए जो इतिहास लिखा जा चुका था, और उसमें ऊधम सिंह का ढंग से जिक्र भी नहीं था. आज भी बहुत कम लोग ऊधम सिंह की हिम्मत और कुर्बानी के बारे में जानते हैं.

ऊधम सिंह पंजाब के संगरूर के एक गरीब किसान के परिवार में 26 दिसंबर 1899 को पैदा हुए थे. उनके पिता एक रेलवे क्रॉसिंग पर चौकीदार थे. युवावस्था से ही वो देश की आजादी की जंग में शामिल हो गए थे. जलियां वाला बाग हत्याकांड के वक्त भी ऊधम सिंह वहीं थे और भीड़ को बाकी युवाओं के साथ पानी पिला रहे थे. आंखों के सामने इतने निरीह लोगों की हत्या ने ऊधम सिंह को अंदर तक हिला दिया. उसकी वक्त ऊधम सिंह ने उसका बदला लेने की ठान ली.

ऊधम सिंह की दोस्ती भगत सिंह से थी. उस वक्त भगत सिंह के पास एक बोतल रहती थी, जिसमें जलियांवाला बाग की खून से सनी मिट्टी भरी थी, वो ऊधम सिंह को उन्होंने दिखाई थी. ऊधम सिंह गदर पार्टी से जुड़ गए और कई देशों में भारतीयों को आजादी की लड़ाई में जोड़ने के मिशन में लग गए. कई देशों में ऊधम सिंह ने भारतीय युवाओं का अच्छा ग्रुप तैयार कर लिया था. 1927 में भगत सिंह के कहने पर वो 25 युवाओं को हथियारों के साथ लेकर भारत आए. लेकिन पुलिस को खबर मिल गई, गदर पार्टी का साहित्य और हथियार मिलने पर पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और पांच साल के लिए जेल भेज दिया. वरना भगत सिंह की क्रांतिकारी गतिविधियों में ऊधम सिंह की अहम भूमिका होती. उनके जेल में रहते रहते पहले भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया, फिर आजाद की भी मौत हो गई. भारत में क्रांतिकारी गतिविधियां कमजोर पड़ गई. लेकिन भगत सिंह, आजाद के बाद लंदन में मदन लाल धींगरा की फांसी ने उनको भी कुछ करने के लिए प्रेरित किया.

1933 में आजाद होकर ऊधम सिंह मन में जलियां वाला बाग के गुनहगारों को सजा देने का मिशन लेकर कश्मीर निकल गए, पंजाब पुलिस के जासूस उनके पीछे थे. उन्होंने तीन महीने एक कपड़े की दुकान में श्रीनगर में काम भी किया और एक दिन वहां से मौका देखकर लाहौर और फिर कराची. वहां से शिप में बैठकर जर्मनी. 1934 में ऊधम सिंह लंदन पहुंचे. वहां एक मोटर गैराज में काम करना शुरू किया. 1934 के अंत में उन्होंने ये कहकर यूरोप के कई देशों की यात्रा की इजाजत मांगी कि उनकी भारत में स्पोर्ट्स का सामान बनाने की कंपनी है, जिसके लिए उन्हें कई देशों में जाना है. लेकिन रूस जाने के बाद वहां से उन्होंने इंगलैंड जाने की इजाजत मांगी, जब पता चला कि उसके लिए ब्रिटिश सरकार की अनुमति लेनी होगी तो उन्होंने अपनी एप्लीकेशन वापस ले ली. फिर कुछ दिनों बाद उन्होंने आयरलैंड की इजाजत मांगी, जो आसानी से मिल गई और आयरलैंड से इंगलैंड पहुंचना आसान था, इस तरह करीब दो साल उन्हें भारत से लंदन पहुंचने में लग गए.

लंदन में उन्होंने एक इंजीनियरिंग कॉलेज में ऊदै सिंह के नाम से एडमीशन भी ले लिया. कॉलेज के बाद वो माइकल ओ डायर के बारे में जानकारी जुटाया करते थे, फिर उन्होंने फेरी लगाना शुरू कर दिया. जिससे थोड़ा पैसा हाथ आया तो उन्होंने लंदन में एक छोटी कार ले ली, फिर वो कार से फेरी भी लगाने लगे. अपने सर्च मिशन में भी लग गए. फेरी के काम में एक भारतीय के स्टोर नैयर ब्रदर्स ने उनकी काफी मदद की थी. फिर उन्होंने 6 चैम्बर वाला एक रिवॉल्वर भी खरीद लिया. ऊधम सिंह ने दोनों डायर के खिलाफ तब तक काफी जानकारी जुटा ली थी, जनरल रिगिनॉल्ड डायर तो बीमारी से जलियां वाला बाग हत्याकांड के 8 साल बाद ही मर गया था, लेकिन उसको अमृतसर में नियुक्त करने वाला, उसे बचाने वाला और लंदन लौटकर उसका सम्मान करने वाला पंजाब का गवर्नर रहा माइकल ओ डायर अभी जिंदा था.

ऊधम सिंह उसको घर में नहीं बल्कि जनता के सामने मारकर अपनी गिरफ्तारी देना चाहता था, ताकि पूरी दुनियां में उसका मैसेज जाए. 13 मार्च 1940 को ये मौका मिला. उस दिन कैक्सटन हॉल लंदन में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और सेंट्रल एशियन सोसायटी की ज्वॉइंट मीटिंग थी, जिसमें डायर को बोलना था. ऊधम सिंह ने दो गोलियां उसके सीने में उतार दीं और वहां से भागे नहीं, उनका मिशन जो पूरा हो चुका था. वो कोर्ट से भगत सिंह की फांसी की तारीख यानी 23 तारीख को ही फांसी चाहते थे लेकिन कोर्ट ने 31 जुलाई 1940 को फांसी दी. उस वक्त नेहरू ने माइकल ओ डायर को इस तरह मारने की निंदा की और नेशनल हेराल्ड में लिखा, “[The] assassination is regretted but it is earnestly hoped that it will not have far-reaching repercussions on [the] political future of India.”. लेकिन अपनी मौत से एक डेढ़ साल पहले नेहरू जी ने 1962 में अपना बयान बदला और एक पब्लिक स्टेटमेंट में बोला, “I salute Shaheed-i-Azam Udham Singh with reverence who had kissed the noose so that we may be free.”.

भगत सिंह की जेल डायरी, उनके कोर्ट केस की सारी सुनवाई फिल्मों और मीडिया के जरिए आम लोगों तक पहुंचती रही और बच्चा बच्चा भगत सिंह को जानता है. लेकिन सालों तक ऊधम सिंह की कहानी देश के युवाओं तक पहुंची ही नहीं कि केवल एक मैसेज देने के लिए, एक बदला लेने के लिए, एक सबके सिखाने के लिए, अपना फांसी से लाखों लोगों को प्रेरित करने के लिए उसने कितनी साहसिक और लम्बी लड़ाई लड़ी और देश के दुश्मन को धैर्य के साथ उसके घर में जाकर ढेर किया, अपनी जान की, जवानी की कुर्बानी देकर.

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