नई दिल्ली. भारत में ट्रॉमा के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा कैंसर और दिल की बीमारियों से होने वाली कुल मौतों से भी ज्यादा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2020 तक ट्रॉमा से होने वाली मौतों का आंकड़ा 50 फीसदी तक घटाने का लक्ष्य रखा है. 17 अक्टूबर को वर्ल्ड ट्रॉमा डे के दिन इस लक्ष्य को हासिल करने के प्रति संकल्प को दोहराया जा रहा है.

ट्रॉमा क्या है
नेशनल हेल्थ पोर्टल के अनुसार, ‘ट्रॉमा का अर्थ होता है शरीर को पहुंची कोई चोट. यह चोट कई कारणों से हो सकती है जैसे- सड़क दुर्घटना, आग लगना, जलना, गिरना, हिंसक घटनाओं का शिकार होना। इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं युवा, महिलाएं और बच्चे. उक्त सभी कारणों में सड़क दुर्घटना से दुनियाभर में सबसे ज्यादा लोग जान गंवाते हैं. कई चोटों से अस्थायी या स्थायी विकलांगता हो जाती है. हर साल, दुनिया भर में लगभग 50 लाख लोग सड़क दुर्घटना में जान गंवाते हैं. अकेले भारत में, मृतकों का यह आंकड़ा 10 है, जबकि हर साल 2 करोड़ लोग अस्पताल में भर्ती होते हैं.

17 अक्टूबर को दुनियाभर में वर्ल्ड ट्रॉमा डे मनाया जाता है. इसकी शुरुआत 2011 में भारत से ही हुई थी. उद्देश्य है ट्रॉमा के प्रति लोगों को जागरूक बनाना और इससे होने वाली मौतों की संख्या में कमी लाना.

घटनाएं जो बनती हैं ट्रॉमा का कारण
ट्रॉमा यानी ऐसी घटना-दुर्घटना जो इन्सान को शारीरिक ही नहीं भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक रूप से झकझोर कर रख देती है. सड़क दुर्घटना का शिकार होना ट्रॉमा का सबसे बड़ा कारण हैं. इसके अलावा अन्य कारणों में शामिल हैं-

परिवार के किसी सदस्य या प्रिय मित्र का असामयिक निधन
परिवार के सदस्य का छोड़कर चले जाना, तलाक, माता-पिता द्वारा छोड़ दिया जाना
गंभीर बीमारी से ग्रस्त होना, हर तरह के इलाज के बाद भी हताशा हाथ लगना
आतंकी हमले का शिकार होना
प्राकृति आपदा झेलना
अपनों से दूर जाना
शारीरिक शोषण
ट्रॉमा के संकेत

उपरोक्त किसी भी घटना का शिकार इन्सान या तो बहुत उग्र हो जाएगा या बहुत शांत. दोनों ही स्थितियां खतरनाक है.

मरीज चिड़चिड़ा हो जाता है। हर समय गुस्सा करता है.
डिप्रेशन में चला जाता है। उसे अकेले रहना पसंद होता है। किसी से बात नहीं करता है.
टीवी या फिल्म में वैसा ही कोई सीन देखने पर विचलित हो जाता है.
नींद नहीं आना या नींद में चमकना.
लगातार सिर दर्द बना रहना। या हर वक्त चक्कर आना.

ट्रॉमा का इलाज
ट्रॉमा का डॉक्टरी इलाज उपलब्ध है। www.myupchar.com के डॉ. आयुष पांडे के अनुसार, कई तरह की दवाएं उपलब्ध हैं, जिन्हें डॉक्टर की सलाह के बिना नहीं लेना चाहिए।

वहीं मरीज को मानसिक रूप से मजबूत बनाने पर जोर दिया जाता है. इसके लिए ध्यान और प्राणायाम की सलाह दी जाती है.

अमेरिकन रेड क्रॉस के अनुसार, ट्रॉमा का तत्काल कोई इलाज नहीं होता, लेकिन वैज्ञानिकों ने कई थेरेपी विकसित कर ली हैं, जिनसे उम्मीद जगी है। सम्मोहन, माइंडफुलनेस, क्रानियोसेरब्रल थेरेपी, ट्रॉमा-सेंसिटिव योग, आर्ट थेरेपी और एक्यूपंक्चर इनमें से कुछ हैं.

ट्रॉमा आधुनिक महामारी, ऐसे बचाई जा सकती है जानें
एम्स की एक रिपोर्ट में ट्रॉमा को आधुनिक महामारी करार दिया गया है और कहा गया है कि यदि सामान्य दुर्घटनाओं से निपटने के लिए आम नागरिकों को ट्रेंन किया जाए, तो इन मुश्किल हालातों से बचा जा सकता है. स्कूल से ही बच्चों को इसके लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है. अब तो कुछ प्रायवेट अस्पतालों ने भी इमरजेंसी मेडिसिन कोर्स शुरू किए हैं.

एम्स के तत्कालीन डायरेक्टर और जय प्रकाश नारायण अपेक्स ट्रॉमा सेंटर के पूर्व प्रमुख एमसी मिश्रा ने अपने एक बयान में कहा था कि भारत में ट्रॉमा के कारण होने वाली मौतों का आंकड़ा कैंसर और हार्ट डिजीज से होने वाली कुल मौतों से भी ज्यादा है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2020 तक ट्रॉमा से होने वाली मौतों का आंकड़ा 50 फीसदी तक घटाने का लक्ष्य रखा है. भारत इसमें अहम भूमिका निभा सकता है। जरूरत है तो बस सावधानी बरतने की और जागरूक होने की। इसके अलावा केंद्र तथा विभिन्न राज्य सरकारों ने इमरजेंसी नबंर जारी किए हैं. इनसे तत्काल मदद पाई जा सकती है.

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