Monday, October 3, 2022

भारत की आजादी में इन योद्धाओं का रहा है अहम रोल, कई लोगों ने छोड़ दी थी प्रशासनिक सेवा की नौकरी

नई दिल्ली: इस साल 15 अगस्त को भारत को आजाद हुए 75 साल पूरे हो जाएंगे। इतिहास में भारत के लिए एक नई शुरुआत के तौर पर देखा जाता रहा है। अंग्रेजों से देश को आजाद कराने का संघर्ष केवल इस 15 अगस्त की तारीख या वर्ष 1947 तक ही सीमित नहीं है।

जवाहर लाल नेहरू

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की पूरी दुनिया में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उसकी पहचान बनी। जवाहर का जन्म कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में 14 नवंबर 1889 में हुआ था। वे पंडित मोतीलाल नेहरू के इकलौते बेटे थे। इलाहबाद में जन्मे नेहरू 1912 में कांग्रेस पार्टी से जुड़े। वे आजादी के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़े। चाहे असहयोग आंदोलन की बात हो या नमक सत्याग्रह या फिर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की बात हो। उन्होंने हर मौके पर गांधी जी के साथ प्रदर्शनों में भाग लिया। 1928 में साइमन कमीशन के खिलाफ लखनऊ में हुए प्रदर्शन में नेहरू ने भाग लिया था। वे प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प में घायल भी हो गए थे। नमक आंदोलन के दौरान उन्होंने जेल भी की सजा भी काटी।

सरदार वल्लभ भाई पटेल

सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्तूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में हुआ, उन नेताओं में से एक थे जिन्हें राष्ट्र उनकी निस्वार्थ सेवा के लिए याद करता है। एक साधारण परिवार का लड़का अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर देश की आजादी के बाद पहले उप प्रधानमंत्री, पहले गृह मंत्री, सूचना के अलावा रियासत विभाग के मंत्री भी बनें।

बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर

भारत रत्न से सम्मानित डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। आजाद भारत को गणतंत्र के मार्ग पर ले जाने बनाने में बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की महत्वपूर्ण भूमिका है। भीमराव अंबेडकर को संविधान निर्माता के तौर पर भी जाना जाता है। अपना पूरा जीवन संघर्ष में बिता दिया। अंबेडकर भारत की आजादी के बाद देश के संविधान के निर्माण में अहम योगदान दिया। कमजोर और पिछड़े वर्ग के अधिकारों के लिए बाबा साहेब ने अपना पूरा जीवन संघर्ष में बिता दिया।

सुभाष चंद्र बोस

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ था। नेता राजनीतिक और आंदोलनकारी नीतियों के जरिए देश को ब्रिटिश शासन से जल्द आजाद कराना चाहते थे। बोस ने देश की आजादी के लिए कई कूटनीति को अपनाया। 1920 में बोस ने आईसीएस की परीक्षा में चौथा स्थान हासिल किया। लेकिन अंग्रेजों की गुलामी न करने की उनकी सोच ने सिविल सर्विस से इस्तीफा देने और भारत में चल रहे आंदोलनों में शामिल होने के लिए काफी प्रेरित किया। वे पद से इस्तीफा दिया और आजादी के आंदोलन में शामिल हो गए। वे महात्मा गांधी के काफी नजदीक रहे जिस वजह से अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया। जेल से बाहर आने के बाद वे कई अलग-अलग आंदोलनों में अहम भूमिका निभाई।

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