नई दिल्ली। आज राजद्रोह कानून मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कई कड़े सवाल पूछते हुए मामले की सुनवाई टाल दी है. शीर्ष अदालत ने सरकार से लंबित और भविष्य के मामलों को लेकर हलफनामा दाखिल करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार बताए कि जब तक कानून पर दोबारा विचार नहीं किया जाता तब तक नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी. सरकार ने शीर्ष अदालत से मांग की थी कि जब तक केंद्र सरकार इस कानून पर विचार नहीं कर लेती, तब तक सुनवाई टाल दी जानी चाहिए. हालांकि याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल ने इसका विरोध किया.

लगाई कोर्ट ने फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से लंबित मामले और भविष्य के मामले के संबंध में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा। जब तक केंद्र इस कानून पर पुनर्विचार नहीं करता, तब तक लंबित मामलों और भविष्य के मामलों के संबंध में केंद्र को जवाब दाखिल करना चाहिए. शीर्ष अदालत ने कहा कि केंद्र को यह बताना चाहिए कि जब तक वह कानून पर पुनर्विचार नहीं करता तब तक नागरिकों के हितों की रक्षा कैसे की जाएगी।

सरकार ने कहा, सुनवाई टालनी चाहिए

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हम राजद्रोह कानून पर पुनर्विचार कर रहे हैं। आप सुनवाई स्थगित कर सकते हैं। इस पर सिब्बल ने सरकार के तर्क का विरोध किया। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत कानून की संवैधानिक वैधता की जांच कर रही है। सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही को इसलिए नहीं रोका जा सकता क्योंकि सरकार इस पर विचार करने की बात कर रही है।

चीफ जस्टिस ने पूछा, कितना समय लगेगा?

सरकार की दलील पर चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि हमारा नोटिस महीनों पहले दिया गया था। पहले आपने कहा था कि दोबारा सोचने की जरूरत नहीं है। अब आपने हलफनामा दे दिया है। आखिर कितना समय लगेगा?

केदारनाथ फैसले का हवाला देते हुए केंद्र पर SC की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि जब तक आप कानून पर पुनर्विचार कर रहे हैं, तब तक आप राज्यों को निर्देश क्यों नहीं देते कि इस मामले में फिलहाल केस दर्ज न करें. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि आप राज्यों को क्यों नहीं बताते कि जब तक केंद्र इस कानून पर दोबारा विचार नहीं कर लेता तब तक इस कानून को स्थगित किया जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि केदारनाथ फैसले में कानून को कमजोर किया गया है लेकिन फिर भी स्थानीय स्तर पर पुलिस द्वारा कानून का इस्तेमाल किया जा रहा है और यह तब तक होगा जब तक आप की ओर से कोई निर्देश नहीं दिया जाता है।

याचिका में क्या दिया गया तर्क

सेवानिवृत्त मेजर जनरल की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी दाखिल कर कहा गया है कि आईपीसी की धारा-124ए राजद्रोह अधिनियम में दिए गए प्रावधान और परिभाषा स्पष्ट नहीं है। इसका प्रावधान संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार मिले हैं। इसके तहत अनुच्छेद 19(1)(ए) में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रावधान किया गया है। वहीं, अनुच्छेद 19(2) में उचित निषेध है। लेकिन राजद्रोह का प्रावधान संविधान के प्रावधानों के विपरीत है।

 

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