नई दिल्लीः नई पीढ़ी आचार्य कृपलानी को अगर जानती भी होती तो केवल इस नाते कि वो आजादी के वक्त यानी 1947 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे, कॉम्पटीशन की तैयारी कर रहे छात्रों को बस यही एक लाइन पढ़ाई जाती है. आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर उनके बारे में आप कुछ ज्यादा दिलचस्प बातें जान सकते हैं कि कैसे गांधीजी की एक आवाज पर नौकरी से त्यागपत्र देकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले जेबी कृपलानी के लिए कभी पंडित नेहरू सरदार पटेल से भिड़ गए थे. आज जबकि पीएम नरेन्द्र मोदी के खिलाफ पहली बार अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है, आपके लिए ये जानना वाकई में दिलचस्प होगा कि पंडित नेहरू के खिलाफ संसद में पहला अविश्वास प्रस्ताव कोई लेकर आया था तो वो थे आचार्य जेबी कृपलानी.

गांधी नेहरू परिवार के अलावा जो भी कांग्रेस के अध्यक्ष बने, खासतौर पर आजादी के बाद, उनमें से ज्यादातर का इतिहास बाद में विचित्र ही रहा है. वो कैसे भी करके अलग अलग परिस्थितियों में पहुंच तो गए कांग्रेस प्रेसीडेंट की कुर्सी पर, लेकिन उसके बाद ज्यादातर को पार्टी छोडनी ही पड़ी. किसने सोचा था कि गांधीजी के मजबूत सिपहासालार और आजादी के साल में कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान व्यक्ति ही देश की संसद में पीएम की कुर्सी पर पहली बार बैठने वाले कांग्रेस के नेहरू जैसे कद्दावर नेता के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आएगा, लेकिन ऐसा हुआ.

ये महाशय थे जेबी कृपलानी, कभी इंगलिश और इतिहास के टीचर रहे थे, आदर से लोग उन्हें आचार्य जेबी कृपलानी कहते हैं. खांटी गांधीवादी, सादगी के प्रतीक कृपलानी की एक बड़ी पहचान बाद में यूपी की पहली महिला चीफ मिनिस्टर बनने वाली सुचेता कृपलानी के पति के तौर पर भी थी. जब वो गांधीजी के साथ जुड़े तो नौकरी छोड़ दी और गुजरात और महाराष्ट्र में गांधीजी के कई आश्रमों की व्यवस्था जमाने में मदद की. वो 1928 में ही जनरल सेक्रेटरी बन गए थे, दिलचस्प बात है कि 1928 में कांग्रेस अध्यक्ष मोतीलाल नेहरू को चुना गया था.

उनको बड़ा सम्मान तब मिला, जब गाधीजी की सदिच्छा से उनको ऐसे वर्ष में कांग्रेस का नेशनल प्रेसीडेंट चुना गया, जिसे साल देश आजाद होने वाला था. वो 1947 जैसे सबसे महत्वपूर्ण वर्ष में कांग्रेस प्रेसीडेंट बनाए गए. इधर ज्यादातर प्रमुख कांग्रेस नेता सरकार में चले गए थे, ऐसे में संगठन को नए सिरे नए लोगों के साथ खड़े करना था, चूंकि देश आजाद था इसलिए कोई आंदोलन भी टारगेट पर नहीं था, लेकिन आम जनता की उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं. चूंकि सरकार से जुड़े लोग, मंत्री सांसद तो आसानी से जनता के संपर्क में नहीं थे, तो जनता सीधे पार्टी के नेताओं को पकड़ती थी.

ऐसे में कांग्रेस अध्यक्ष का काम रह गया था कि जनता से जुड़े बड़े मामलों को सरकार की जानकारी में लाकर उनको करने के लिए दवाब बनाना. लेकिन जब उन्हें लगा कि सरकार उन्हें इतनी तबज्जो नहीं दे रही है, जितनी कि एक कांग्रेस प्रेसीडेंट को मिलनी चाहिए और सरकार के किसी भी कामकाज में उनसे सलाह नहीं ली जा रही है तो उन्होंने एक प्रस्ताव रखा कि सरकार हर कदम पार्टी से पूछकर या सलाह के बाद ही उठाए. पार्टी को हर बड़े फैसले की जानकारी हो. जेबी कृपलानी के इस सुझाव या प्रस्ताव को पंडित नेहरू ने ये कहकर नकार दिया कि रोजमर्रा के काम में ये मुमकिन नहीं है.

नेहरूजी से इस बात को लेकर उनकी काफी तनानती रही. अगली साल भी उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए कोशिश की, लेकिन नेहरूजी का हाथ पट्टाभि सीतारमैया पर था और अगले दो साल वो प्रेसीडेंट रहे. हालांकि इन दो सालों में कृपलानी ने नेहरू से थोड़े से रिश्ते सुधारे थे. 1950 में जब सरदार पटेल के खेमे से पुरुषोत्तम दास टंडन ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन किया तो उन्हीं के शहर इलाहाबाद और उन्हीं के पेशे यानी वकालत से ताल्लुक रखने वाले नेहरूजी उनको प्रेसीडेंट बनाने के सख्त खिलाफ थे.

तो उन्होंने भी वही किया जो कभी गांधीजी ने नेताजी बोस के साथ किया था, नेहरूजी ने जेपी कृपलानी पर हाथ रख दिया और उनको अपना समर्थन दे दिया. जबकि पुरुषोत्तम दास टंडन को पटेल खेमा सपोर्ट कर रहा था, चुनाव नेहरू बनाम पटेल हो गया था. बावजूद पंडित नेहरू के समर्थन के भी कृपलानी हार गए तो नेहरू ने इस्तीफा तक देने की पेशकश तक कर डाली थी. इस हार के बाद कृपलानी को कांग्रेस से समस्या हो गई और पंडित नेहरू से भी.

हालांकि उसी साल पटेल की मौत हो गई, बाद में पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी इस्तीफा दिया. लेकिन कृपलानी को दोबारा अध्यक्ष बनने का मौका नहीं मिला. उन्होंने पूरी जवानी जिस पार्टी में लगा दी, उसको भारी मन से छोड़ दिया और किसान मजदूर प्रजा पार्टी शुरू कर दी, जो बाद में सोशलिस्ट पार्टी के साथ मिलकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बन गई. लेकिन ये बात दिलचस्प है कि उनकी पत्नी सुचेता कृपलानी ने कांग्रेस नहीं छोड़ी. जो 1963 में यूपी की चौथी और पहली महिला सीएम बनीं. जब वो बाद में केन्द्र में आईं तो दोनों पति पत्नी अलग अलग पार्टियों में थे. उनकी वीबी से संसद में उनके कई मुद्दों पर मतभेद रहते थे, जाहिर है अलग अलग पार्टियों में थे, लेकिन हिंदू कोड बिल पर दोनों की राय एक थी.

लेकिन जेबी कृपलानी जिंदगी भर विपक्ष में ही रहे, कांग्रेस में शामिल नहीं हुए. 1952, 1957, 1963 और 1967 के चुनावों में जीतकर लोकसभा पहुंचे. 1961 में तो वो रक्षा मंत्री वीके कृष्णा मेनन के सामने खड़े हो गए और उस वक्त ये पहला इलेक्शन कैम्पेन था जो इतना हद तक व्यक्तिगत आरोपों को लेकर चर्चित हो गया था कि आज तक चर्चा की जाती है. हालांकि कृपलानी इस चुनाव में जीत नहीं पाए थे.

भारत की लोकतांत्रिक परम्पराओं के इतिहास में आचार्य कृपलानी का नाम इसलिए भी लिया जाता है क्योंकि वो पहले व्यक्ति थे जो पंडित नेहरू के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए थे. इससे पहले कभी किसी विपक्षी नेता ने इस बारे में सोचा तक नहीं था। इस अविश्वास प्रस्ताव को संसद में आचार्य कृपलानी ने चीन का युद्ध हारने के बाद पेश किया था. हालांकि कांग्रेस का बहुमत होने के नाते वो गिर गया था, लेकिन सांकेतिक तौर पर इसका असर काफी गहरा था.

पंडित नेहरू के बाद कृपलानी इंदिरा के भी उतने ही विरोधी थे, जितने जेपी और राम मनोहर लोहिया थे. इंदिरा के खिलाफ उन्होंने भी कई मौकों पर विरोध किया और इमरजेंसी के दौरान उनकी भी गिरफ्तारी हुई, बाद में 1982 में इलाहाबाद में उनकी मौत हो गई. आखिरी दिनों में उन्होंने जो किताब लिखी उसमें उन्होंने गांधीजी, लोहिया और खान अब्दुल गफ्फार खान को छोड़कर बाकी सभी कांग्रेस नेताओं को जमकर लताड़ा, देश के विभाजन के लिए भी जिम्मेदार ठहराया था.

 

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