नई दिल्ली: हर पीढ़ी ये कहानी सुनती पढ़ती आई है कि अफजल खान ने जब छत्रपति शिवाजी को मिलने के लिए बुलाया तो शिवाजी उससे मिलने पूरी तैयारी के साथ गए और जब अफजल ने धोखे से उनको मारने की कोशिश की तो शिवाजी ने छुपे हुए बघनख (Tiger Claws) को निकाला और अफजल की हत्या कर दी. इस तरह के हथियार के इस्तेमाल का ये मामला अनोखा था, इसलिए डिफेंस स्टडीज और हिस्ट्री के स्टूडेंट्स ही नहीं आम लोग भी इसे याद रखते हैं. अब सोचिए वो बघनख कहां है, जिससे शिवाजी ने अफजल की हत्या की? आज के भारत के लिए वो बघनख एक धरोहर है, जो भारत के किसी म्यूजियम या महल में नहीं भारत की बाकी बड़ी धरोहरों की तरह लंदन के एक बड़े म्यूजियम में रखी है. कम से कम वो म्यूजियम तो ऐसा ही दावा करता है.

बघनख यानी बाघ का नाखून, इसको बनाया ही इस तरह से गया था कि इसे हाथ में पहना जा सके, हाथ की आस्तीन में छुपाया जा सके और एक ही वार के दुश्मन का अचानक से पेट चीरा जा सके. शिवाजी ने उस दिन इसे इसी खास मकसद से पहना था. दरअसल अफजल खान मोहम्मद आदिल शाह का बड़ा ही विश्वस्त और खूंखार सिपाहसालार माना जाता था. जब एक एक करके शिवाजी ने कई किले अपने कब्जे में ले लिए तो आदिल शाह ने बाजी घोरपड़े के जरिए शिवाजी के पिता शाहजी को कैद करवा लिया, बाद में शिवाजी से कई किले लेकर उनको छोड़ा. कुछ वक्त तक शिवाजी अपने पिता के चलते शांत रहे, लेकिन वक्त का इंतजार करते रहे.

लेकिन शिवाजी ज्यादा दिनों तक कहां थमने वाले थे, उन्होंने फिर से अपनी गौरिल्ला जंग शुरू कर दी. आदिल शाह शिवाजी की हत्या करने पर आमादा था, शिवाजी को अपनी कैद में लेने की वो सोच भी नहीं सकता था. शिवाजी की हत्या की जिम्मेदारी उसने अफजल खान को सौंपी. अफजल खान ने शिवाजी को प्रतापगढ़ की पहाडियों पर बातचीत के लिए बुलाया, उनके साथ केवल एक साथी और एक तलवार थी. यूं तो बड़े बड़े योद्धा घर आए मेहमान का स्वागत करते थे, लेकिन अफजल खान की धोखा देने की आदत का शिवाजी को पता था. वो अपने बाएं हाथ की आस्तीन में बघनख नाम का नया हथियार और दाएं हाथ की आस्तीन में एक खास किस्म का चाकू भी छुपा कर ले गए. जबकि सर पर भी पगड़ी के नीचे उन्होंने एक खास किस्म का कवच पहन रखा था.

10 नवंबर 1659 का दिन था, शिवाजी और अफजल खान एक तम्बू में अकेले मिले. शिवाजी की लम्बाई अफजल खान के मुकाबले काफी कम थी, वो बलिष्ठ भी था, लेकिन उसको अंदाज नहीं था कि शिवाजी पूरी तैयारी के साथ आए हैं. गले लगाकर जैसे अफजल खान ने शिवाजी की हत्या करने की सोची, पासा पलट गया, थोड़ी देर बाद वहां अफजल खान की लाश पड़ी थी. शिवाजी के साथी की आवाज पर उनके छुपे हुए सैनिक भी मदद के लिए पहुंच गए, बीजापुर की सेना कुछ नहीं कर पाई और वो सब निकल भागे.

बाद में वो बघनख शिवाजी के खानदान के पास रह गया, उनमें से भी वो सतारा राजवंश के पास चला गया, जो उनकी पहली वीबी से पैदा बेटे से जुड़ा था. लेकिन ऐसे में वो लंदन कैसे पहुंचा? आज वो लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में कैसे पहुंचा? जहां कि वो आज रखा हुआ है. हर म्यूजियम में इस बात का जिक्र होता है कि कोई भी आइटम अगर वहां है तो कहां से या किसके जरिए यहां आया है. म्यूजियम में इस बघनख के बारे में भी लिखा हुआ है कि इसे जेम्स ग्रांड डफ लेकर आए थे, उन्हें ये बघनख भारत में सतारा राज्य के प्रधानमंत्री या पेशवा ने दिया था. इस बघनख को इस म्यूजियम की वेबसाइट के इस लिंक पर क्लिक करके आप इसे देख सकते हैं– http://collections.vam.ac.uk/item/O134202/tiger-claws-unknown/ .

दुनियां भर के म्यूजियम किसी भी आइटम के बारे में हमेशा यही लिखते हैं कि इसे उसने गिफ्ट किया या उसने गिफ्ट किया. यहां तक कि कोहिनूर को भी गिफ्ट दिया गया या जबरन लाया गया, इस पर आज तक विवाद है. दरअसल जेम्स ग्रांड डफ ईस्ट इंडिया कंपनी मे सिविल स्रर्वेंट था और उसको भारत भेजा गया. उसकी तैनाती सतारा में हुई. वो पहला ऐसा अंग्रेज था, जिसने रिटायरमेंट के बाद मराठा हिस्ट्री पर एक बड़ी किताब लिखी, और आज भी उसकी किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ द मराठाज’ को मराठों के इतिहास में काफी अहम दस्तावेज की तरह माना जाता है.

हालांकि इस बात का जिक्र कहीं नहीं है कि उसे कौन से पेशवा या किसी और अधिकारी ने इसे सौंपा था. बाद में सैकड़ों साल साल तक यहां तक कि आजादी के बाद भी किसी को इसकी सुध नहीं आई, किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि वो बघनख कहीं सुरक्षित भी हो सकता है. लेकिन फिर धीरे धीरे दुनियां भर के म्यूजियम्स ऑन लाइन होते चले गए तो लोगों ने उनको खंगालना शुरू कर दिया. महाराष्ट्र में 2008 में ये बड़ी चर्चा चली कि इस बघनख को वापस लाया जाए. महाराष्ट्र सरकार की तरफ से विक्टोरिया एंड अलबर्ट म्यूजियम को एक पत्र भी भेजा गया कि इसे कुछ दिनों एक्जीबीशन के लिए भारत भेजा जाए. म्यूजियम राजी तो हो गया लेकिन उसने भारत में उसकी सिक्योरिटी की जिम्मेदारी सरकार से लेने की शर्त लगी. ये भी लग रहा था कि अगर ये बघनख भारत में आता है, तो कुछ संगठन इसे वापस ना भेजने की मांग करते, फिर म्यूजियम और सरकार के बीच किस मामले को लेकर पेंच फंसा ये तो उजागर नहीं हुआ लेकिन ये बघनख भारत नहीं आ पाया.

कुछ मराठी इतिहासकारों ने इस बघनख के असली होने पर भी सवाल उठा दिए, तो कुछ ने अफजल को बघनख से अफजल के मारने की घटना सही है कि नहीं, इस पर भी संदेह जता दिया. जैसा कि भारत में होता है, जैसा कि कोहिनूर के साथ हो रहा है. ऐसे हजारों धरोहरों आइटम्स के तौर पर दुनियां भर के म्यूजियम्स में पड़ी हुई हैं, उन म्यूजियम्स के लिए ये महज आइटम्स हैं और हमारे लिए आन, बान, शान और यादें. महाराष्ट्र के एक नायक भीमराव अम्बेडकर का लंदन वाला घर तो सरकार ने खरीद लिया है, महाराष्ट्र के महानायक शिवाजी का ये बघनख कौन भारत लाएगा, ये सवाल अभी भी मौजूं है.

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