नई दिल्लीः जस्टिस केएम जोसेफ के को लेकर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने आज एक कॉलेजियम बैठक बुलाई है जिसमें इस बात पर चर्चा की जाएगी की जस्टिस जोसेफ का नाम दोबारा सरकार के पास भेजा जाए या नहीं. इस बैठक में जोसेफ के अलावा हाईकोर्ट के कई अन्य जजों के नाम पर भी चर्चा की जाएगी. इससे पहले केंद्र सरकार ने जस्टिस जोसेफ को सु्प्रीम कोर्ट में नियुक्त किए जाने की सिफारिश लौटा दी थी. जिसके बाद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जज जस्टिस जे चेलमेश्वर ने सीजेआई दीपक मिश्रा को एक पत्र लिखा था जिसके बाद ये बैठक बुलाई गई है. सीजेआई को लिखे पत्र में जस्टिस चेलमेश्वर ने जस्टिस जोसेफ का नाम दोबारा केंद्र सरकार के पास भेजने का आग्रह किया था.

जस्टिस चेलमेश्वर की चिट्ठी के बाद इस बैठक को बुलाने का फैसला किया गया था. अपने पत्र में चेलमेश्वर ने कहा था कि 10 जनवरी को जिन परिस्थितियों में कॉलेजियम ने चीफ जस्टिस जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के लिए सिफारिश की गई थी उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ है. इसलिए उनके नाम को केंद्र सरकार के पास पुनर्विचार के लिए दोबारा भेजा जाए.

सूत्रों के मुताबिक सीजेआई दीपक मिश्रा को लिखे पत्र में जस्टिस चेलमेश्वर ने जस्टिस जोसेफ के नाम पर कानून मंत्री रविशंकर के द्वारा उठाए गए सवालों के भी जबाव दिए हैं. कॉलेजियम द्वारा की गई जस्टिस जोसेफ के नाम की सिफारिश को खारिज करते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जस्टिस जोसेफ के खिलाफ 26 अप्रैल को दो तर्क दिए थे जिनमें उन्होंने कहा था कि जस्टिस जोसेफ हाई कोर्ट के जजों की वरिष्ठता सूची में वह काफी नीचे आते हैं. और दूसरा अन्य राज्यों के सुप्रीम कोर्ट में कम प्रतिनिधि हैं.

इससे पहले पिछले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस कुरियन जोसेफ ने जस्टिस जोसेफ के नाम को दोबारा केंद्र सरकार के पास भेजने का समर्थन कर चुके हैं. उन्होंने जस्टिस जोसेफ के नाम को वापस किए जाने के मामले पर चिंता जताते हुए कहा था कि अब वह सब हो रहा है जो पहले कभी नहीं हुआ. आज होने वाली बैठक में अगर जस्टिस जोसेफ के नाम को दोबारा केंद्र सरकार के पास भेजे जाने पर सहमति बनती है तो केंद्र सरकार द्वारा उसे स्वीकार करना ही होगा.

कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक अगर जस्टिस जोसेफ का नाम दोबारा केंद्र सरकार के पास भेजा जाता है तो सरकार को सुप्रीम कोर्ट के 1993 और 1998 में दिए गए दिशानिर्देशों का पान करना होगा. लेकिन इसमें एक बात ये भी है कि केंद्र सरकार के पास इस सिफारिश को मानने के लिए कोई तय वक्त या कोई समय सीमा नहीं है इसलिए केंद्र सरकार चाहे तो इस सिफारिश को लंबे समय तक टाल सकती है बिना कोई स्वीकृति दिए.

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