नई दिल्ली: मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव मैदान में उतरते ही भोपाल लोकसभा सीट अचानक हॉट हो गई है। साध्वी प्रज्ञा सुबह बीजेपी में शामिल हुईं और शाम को पार्टी ने उन्हें कांग्रेस के दिग्गज दिग्विजय सिंह के सामने चुनाव लड़ाने का ऐलान कर दिया। दूसरे चरण के मतदान से ठीक पहले बीजेपी के इस कदम से ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ गई है और इसका असर न सिर्फ भोपाल तक सीमित रहेगा बल्कि पूरे देश पर पड़ेगा और अब यह लड़ाई हिन्दू आतंकवाद-भगवा आतंकवाद बनाम राष्ट्रवाद होती हुई दिख रही है।

सबसे पहले बात दिग्विजय सिंह की, मध्य प्रदेश में दस साल तक मुख्यमंत्री रहने के बाद जब वह चुनाव हारे तो 10 साल तक चुनाव न लड़ने का संकल्प लिया। अपने वादे को निभाया भी, थोड़ा इंतजार किया किन्तु जैसे ही लोकसभा चुनाव का ऐलान हुआ वह अपने दोस्त और मध्य प्रदेश के सीएम कमलनाथ के सामने चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर कर दी। कमलनाथ ने बिना वक्त गंवाये उन्हें दूसरा प्रस्ताव दे दिया कि चुनाव लड़ना ही है तो किसी चुनौतीपूर्ण सीट से लड़िए। दिग्गी राजा का गढ़ राघौगढ़ है लेकिन वह ना भी नहीं कह सकते थे लिहाजा फैसला कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर छोड़ दिया जहां से तय हुआ कि दिग्विजय सिंह बीजेपी के गढ़ भोपाल से चुनाव लड़ें।

जैसे ही उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की, बीजेपी की चुनौती बढ़ गई और मंथन होने लगा कि कांग्रेस के इस दांव का कौन काट बन सकता है। तीन नामों उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के नाम पर मंथन हुआ। उमा भारती ने 2003 में दिग्विजय सिंह को मध्य प्रदेश की सत्ता से बेदखल किया था जबकि शिवराज सिंह चौहान उनके सामने हार चुके हैं लिहाजा वो चुनाव लड़ने को तैयार नहीं हुए। आखिर में मुहर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर पर लगी। सवाल उठता है कि यह जानते हुए कि प्रज्ञा ठाकुर 27 सितंबर 2008 को हुए मालेगांव ब्लास्ट की आरोपी हैं, बीजेपी ने उन पर दांव क्यों लगाया ?

इसका जवाब है कि जब केंद्र में पी चिदंबरम गृह मंत्री थे, तब दिग्विजय सिंह अक्सर उनसे मिलने जाया करते थे, अखबारों मे आर्टिकल लिखा करते थे, उसी दौरान मालेगांव ब्लास्ट हुआ तो हिन्दू आतंकवाद को खूब उछाला गया। उसमें साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित तथा असीमानंद समेत कई आरोपी बने, उससे पहले समझौता ब्लास्ट हुआ था। माना गया कि कांग्रेस के इन दोनों नेताओं ने हिन्दू आतंकवाद शब्द को हवा दी और इन तीनों आरोपियों को पूछताछ में काफी प्रताड़ित किया गया, मकोका लगाया गया।

अब जबकि समझौता एक्सप्रेस विस्फोट मामले में असीमानंद समेत तमाम आरोपी बरी हो चुके हैं, पुरोहित, प्रज्ञा, मालेगांव मामले में जमानत पर हैं, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से इन पर लगा मकोका हट चुका है बीजेपी को लग रहा है कि हिन्दूत्व और राष्ट्रवाद को भुनाने का यही सही मौका है। यह ऐसा भावनात्मक मुद्दा है जिस पर बहुसंख्यक हिन्दू जात पात भूलकर एक हो सकते हैं।

1 अप्रैल को महाराष्ट्र के वर्धा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ इशारा किया था कि चुनाव किस दिशा में जाने वाला है और कैसे लड़ा जाएगा उन्होंने कहा कि कांग्रेस देश के करोड़ों लोगों को हिंदू आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल कर कलंकित कर देना चाहती है, आप मुझे बताइए कि क्या आप हिंदू आतंकवाद शब्द से दुखी नहीं हुए थे क्या इतिहास में कोई भी घटना ऐसी है जिसमें कोई हिंदू आतंक की गतिविधियों में संलिप्त हुआ हो ?

साफ है कि इसके अलावा बीजेपी को ऐसा कोई मुद्दा नहीं दिख रहा है जो कि उसकी नैया पार लगा दे इसीलिए पड़ोसी के घर में घुसकर मारने, मोदी की सेना और अली के जवाब में बजरंग बली जैसी चीजें उछाली जा रही है।  जहां तक बीजेपी के इस कदम का चुनाव पर प्रभाव की बात है तो तय मानिए इससे जबरदस्त ध्रुवीकरण होगा और उसका असर न सिर्फ आसपास की सीटों पर बल्कि पूरे चुनाव पर पड़ेगा और लड़ाई को राष्ट्रवाद बनाम हिन्दू आतंकवाद बनाने की कोशिश की जाएगी। दिग्विजय के उन बयानों और भाषणों को बीजेपी भुनाने की कोशिश होगी जो उन्होंने हिन्दुओं के खिलाफ दिया है।

ऐसे समय में जबकि कांग्रेस साफ्ट हिन्दुत्व की तरफ कदम बढ़ा चुकी है, वह लड़ाई को ज्वलंत मुद्दों की तरफ खींचेगी और साध्वी पर सीधे अटैक करने की बजाय बीजेपी को घेरेगी। इसीलिए साध्वी के नाम के ऐलान के बाद उसने सधी हुई प्रतिक्रिया दी कि इससे बीजेपी की मानसिकता का पता चलता है। अब देखना यह है कि अपने मकसद में कौन कितना कामयाब होता है?

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