हम लुटियंस जोन के एक बंगले में थे, वहां किसी ने कहा सचिन पायलट के साथ गलत हो रहा है। दूसरे ने कहा गलत क्या है, उसने दगा किया है। गद्दार को सजा तो मिलनी ही चाहिए। तीसरे ने कहा अशोक गहलोत कौन दूध के धुले हैं। चौथे ने कहा कि सिर्फ सीएम की कुर्सी की लड़ाई है, सचिन उन्हें निपटाना चाहते हैं और वह सचिन को। एक ने कहा कि सत्ता का यही धर्म है कि अपनी कुर्सी सुरक्षित करो और प्रतिद्वंदी को खत्म। सचिन भाजपा के कुछ नेताओं के साथ मिलकर अगर गला घोटेंगे तो गहलोत भी बचाव में ढाल तो उठाएंगे ही। सच यही है कि दोनों सिर्फ सत्ता के लिए लड़ रहे हैं, बाकी तो अनुयायी हैं। यही तो राजनीति है, कि किसी का भी दामन थाम लो, अपनों से धोखा करो, किसी भी कीमत पर सत्ता हथियाओ। राजधर्म अब सिर्फ कहने को रह गया है मकसद सिर्फ सत्ता और फिर सत्ता है। एक वाकया का जिक्र करना चाहूंगा। वर्ष 2004 में हम नैनीताल में थे। वहां हमारी मुलाकात कांग्रेस के 72 वर्षीय नेता प्रताप भैया से हुई। वह 1957 में सबसे कम उम्र के विधायक और फिर 1967 में सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री बने थे। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में सवा सौ विद्यालय खोले। नैनीताल में महंगे निजी स्कूलों के मुकाबले शहीद सैनिक विद्यालय बनाया। वह रोज अपनी साधारण जीप से कचेहरी जाते और वकालत से जीविका कमाते थे। उन्होंने कभी सत्ता या पद के लिए काम नहीं किया। जनता के लिए जीते थे। यही वजह थी कि तमाम मंत्रियों की उपस्थिति में भी उनका सम्मान सबसे ज्यादा था मगर अब यह नहीं दिखता।

एक शासक के लिए राजधर्म सभी को समान निगाह से देखते हुए जनता का हित होता है। इस वक्त राज होता है मगर धर्म गायब है। इसकी परिणिति, राज पाने के लिए कुछ भी करने की प्रवृत्ति हो गई है। सत्ता पाने का यह खेल अब दिल्ली तक सीमित नहीं है। सूबेदारी से पंचायतों तक यही हो रहा है। राजनीति अब रईसों का खेल बन गई है। राजस्थान की गहलोत सरकार को गिराने के लिए प्रति विधायक 30 करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं। कमोबेश यही तथ्य मध्य प्रदेश में कमलनाथ और कर्नाटक की सदानंद गौड़ा सरकार गिराने में सामने आया था। राजस्थान, मध्यप्रदेश और कर्नाटक सभी जगह एक बात सामान्य थी कि आयकर और ईडी का छापा ऐन वक्त उन लोगों के यहां पड़ा जो तत्कालीन सरकार के मददगार थे। साफ है कि राज पाने के लिए धन के साथ साथ सरकारी तंत्र का भी इस्तेमाल खूब हुआ। इससे साफ है कि अब राजधर्म सिर्फ सत्ता पर काबिज होना है, न कि आमजन को समान निगाह से देखकर उसके हित में काम करना। इस काम में सत्ता व्यापारी गठजोड़ काम करता है, जिसमें नौकरशाही और सरकार की जांच एजेंसियां मददगार होती हैं। यही कारण है कि सत्ता में मनचाही पार्टी अथवा नेता आने पर उन उद्यमियों को खर्च का बड़ा लाभ मिलता है। नरेंद्र मोदी सरकार के लिए खर्च करने वाले गौतम अडानी की संपत्ति छह साल में 1.6 से 15 बिलियन डॉलर बढ़ जाती है और अंबानी दुनिया के सबसे अधिक संपत्ति वाले उद्यमी बन जाते हैं। 

जनहित को अपना उद्देश्य बताने वालों के बजट में आमजन की शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार के लिए ऊंट के मुंह में जीरा जैसा प्रावधान होता है। वहीं, अपनी साज सज्जा और सुख के लिए सब कुछ होता है। मददगार उद्यमियों के हित के लिए धन सुलभ कराने वाली नीतियां ही सरकार का उद्देश्य बन जाता है। उनको लाभ पहुंचाने के चक्कर में सरकारी उपक्रम कंगाल होने लगते हैं। जब वह बीमारू उद्योग बन जाते हैं, तो उन्हीं उद्यमियों को बेच दिया जाता है। मौजूदा सरकार ने पिछले छह सालों में आमजन के धन से बने 23 सार्वजनिक उपक्रम बेच दिये। बनाया कोई भी नहीं। कोयला खदानों के बाद, पोर्ट, एयरपोर्ट, बैंकिंग और अब स्पेश में भी विनिवेश शुरू हो गया है। शायद सरकार का राजधर्म ही सार्वजनिक धन से रईसी की जिंदगी जीना हो गया है। रईसी के लिए सरकार जो खर्च करती है, उसकी भरपाई के लिए हमारी कमाई से बने उद्यमों को बेचना सरकारी नियति बन गई है। जनता से धन की उगाही करने वाली नौकरशाही की नीतियां अपनाकर सत्तानशीन चहेते उद्यमियों को लाभ देने में जुटे हैं, क्योंकि उनकी मदद से ही सरकार बनी है। मोदी सरकार ने राजसत्ता में अपने एजेंडे को लागू करने के लिए विशेषज्ञ बताकर चहेती नौकरशाही की सीधी भर्ती कर ली। जो अब वही करने में लगी है, जो उनके आका चाहते हैं। सभी जानते हैं कि चुनाव मोदी के नाम पर जीता गया, जिससे अब उनके दल में कोई भी सवाल करने की हिम्मत नहीं रखता।

इस वक्त राजधर्म का पालन न होने से देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। वैसे तो पूरे विश्व में आर्थिक संकट है मगर हमारे देश में इस संकट में सरकार मदद करने के बजाय आमजन की जेब काटने में लगी है। वहीं, पूरे विश्व में अपने नागरिकों और देश की अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए वहां की सरकारों ने बहुत खर्च किया है। ऐसे वक्त में हमारे देश में सत्ता पाने में मददगार रहे उद्योगपतियों के कर्ज माफ कर दिये, जो सालों से वह नहीं चुका रहे थे। इस साल सिर्फ एसबीआई ने करीब 1.24 करोड़ रुपये माफ कर दिये। सभी सरकारी बैंकों ने पिछले साल 1.73 लाख करोड़ रुपये का बैड लोन माफ कर दिया। सरकारी बैंकों ने पिछले चार सालों में करीब 4.33 लाख करोड़ रुपये का डिफाल्टरों का बकाया माफ कर दिया। वहीं, वह कर्ज वसूली सिर्फ 45 हजार करोड़ रुपये की कर सकीं है। आखिर यह धन गया कहां? जब यह सवाल उठता है, तब उत्तर में पता चलता है सरकार की सरपरस्ती में पलते उद्योगपतियों के जेब में। राजधर्म को दरकिनार करने से धन कुबेर महाकुबेर बन गये। राज पाने के लिए किसी को भी खरीद सकने की क्षमता राजनीतिक दलों के पास इन्हीं से आती है। जनहित के नाम पर राज सत्ता हासिल करने वाले छोटे दल और नेता इसी धन से खरीदे जाते हैं। देश की जनता कभी महामारी से तो कभी बाढ़ और सूखे से मरती है। 

हम जब भारतीय राजनीति को पढ़ते थे, तब बताया जाता था कि लोकतंत्र का अर्थ है, आमजन के हितों में काम करने वाला तंत्र। मौजूदा लोकतंत्र का चेहरा राजधर्म से दूर, सत्ता के व्यापारियों का अधिक दिख रहा है। सरकार में बैठे जिम्मेदार, देश की सीमाओं, जनता की तकलीफों, प्राकृतिक संकटों और महामारियों की चिंता के बजाय सिर्फ सत्ता हासिल करने का खेल रचते दिखते हैं। अगर यही होता रहा तो निश्चित रूप से लोकतंत्र कारपोरेट-व्यापारिक घरानों का घरेलू नौकर बनकर रह जाएगा। अभी भी वक्त है, सोचिये, आपको क्या करना है?  

जयहिंद!  

ajay.shukla@itvnetwork.com

(लेखक आईटीवी नेटवर्क के प्रधान संपादक हैं)

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