नई दिल्ली. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की लोकसभा चुनाव में लगातार दूसरी शर्मनाक हार से सवाल उठने लगे हैं कि आखिर राहुल गांधी इतनी जमकर फाइटिंग कर रहे हैं, उनके हमले पहले से काफी धारदार हुए हैं, तेवर और रणनीति में पैनापन देखने को मिला है, फिर भी वो गांधी परिवार का सबसे नाकामयाब चेहरा क्यों साबित हो रहे हैं? नरेंद्र मोदी फैक्टर जिम्मेदार है, लेकिन एक और बड़ा फैक्टर खुद राहुल गांधी हैं. राहुल गांधी भारत की संसदीय राजनीति में वो काम करने की कोशिश कर रहे हैं, जो उनके खानदान में किसी भी पीएम ने नहीं किया, ना पंडित जवाहरलाल नेहरू ने, ना इंदिरा गांधी ने और ना ही राजीव गांधी ने. अब ये राहुल गांधी खुद कर रहे हैं या उनके रणनीतिकार करवा रहे हैं, ये वही बेहतर जानते होंगे, लेकिन खानदान के ही प्रधानमंत्रियों को फॉलो किया होता तो राहुल गांधी आज कम से कम पूर्व प्रधानमंत्री होते और शायद बीजेपी या मोदी के सामने इतनी बुरी हालत में नहीं होते.

आखिर क्या है वो जिद या फैक्टर जिसके चलते राहुल गांधी पीएम नहीं बन पाए अभी तक. वो जिद है, बिना पीएम बने लोकसभा चुनाव जीतने की हसरत. आपमें से शायद तमाम लोग चौंक जाएं कि आखिर बिना एमपी बने कोई पीएम कैसे बन सकता है? या फिर उनके लिए पीएम बनकर लोकसभा चुनाव क्यों जीतना जरुरी है? तो आपको ये जानकर हैरत होगी कि उनके खानदान से पंडित जवाहरलाल नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित, फिरोज गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी, मेनका गांधी, राहुल गांधी, वरुण गांधी जैसे कई सांसद रहे लेकिन अभी तक तीन ही प्रधानमंत्री बने. पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी और इन तीनों ही प्रधानमंत्रियों में से किसी ने बिना पीएम की कुर्सी पर बैठे कभी कोई लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा. जी हां, ये वाकई में दिलचस्प है कि पंडित नेहरु भी अपना पहला लोकसभा चुनाव पीएम की कुर्सी पर बैठने के बाद ही लड़े. इंदिरा गांधी भी पहले पीएम बनीं, बाद में लोकसभा चुनावों में खड़ी हुईं और ऐसा ही फायदा राजीव गांधी को भी भी मिला.

लेकिन राहुल गांधी की किस्मत में ये सुख नहीं है. वो जब भी चुनाव लड़ते हैं, पैदल ही होते हैं. ज्यादा से ज्यादा सांसद होते हैं. इस बार कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी थे. लेकिन पीएम पद पर रहते हुए चुनाव लड़ने का जो जलवा पब्लिक के दिलोदिमाग पर होता है, वो फायदा राहुल को नहीं मिला. यहां तक कि मोदी भी चुनाव लड़ते वक्त गुजरात के सीएम थे और बीजेपी के पीएम पद के कैंडिडेट भी. राहुल को तो पार्टी ने पीएम पद का भी कैंडिडेट कभी घोषित नहीं किया. 

पंडित नेहरू को देश की आजादी से पहले देश का प्रधानमंत्री चुन लिया गया था, बिना चुनाव के. जनता के बिना वोट के बने तो बाबा साहेब भीमराव  आंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे विरोधियों को भी सरकार में शामिल करना पड़ा, जिसे आज कांग्रेसी उनकी सदाशयता बताते हैं. चार साल वो बिना चुनाव के ही पीएम की कुर्सी पर रहे. संविधान लागू होने के बाद देश में 1951-52 में चुनाव करवाया गया और पीएम रहते पीएम का चुनाव लड़ने से पंडित नेहरू का जलवा सातवें आसमान पर पहुंच गया था. पीएम पद के लिए अंग्रेजों का न्यौता कांग्रेस अध्यक्ष को आना था और उस पद पर थे मौलाना आजाद. तो महात्मा गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करवा दिया. नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष के नॉमिनेशन में एक भी प्रदेश से नॉमिनेशन नहीं ले पाए. 15 में से 12 राज्यों ने सरदार पटेल को और तीन ने आचार्य कृपलानी को ऩॉमिनेट किया था. खैर गांधीजी के वीटो के चलते नेहरू पीएम बने और दूसरी बार चुनाव से.

इंदिरा गांधी भी नेहरूजी की मौत के बाद लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री बनाई गई थीं, वो भी बिना लोकसभा चुनाव जीते. उन्हें राज्यसभा से सांसद बनाया गया. लेकिन जब 1966 में शास्त्री जी की भी ताशकंद में रहस्मयी मौत हो गई तो वो पीएम बनने की इच्छुक थीं. लेकिन मोरारजी देसाई रास्ते का रोड़ा थे. कामराज को भी सख्त किस्म के देसाई पसंद नहीं थे. एमपी के सीएम डीपी मिश्रा ने इंदिरा की मदद की और देसाई और इंदिरा के लिए सासंदों में वोटिंग हुई और इंदिरा चुन ली गईं. लेकिन पीएम बनते वक्त भी वो राज्यसभा से थीं. अगले लोकसभा चुनावों में जब वो मैदान में उतरीं तो पहले से देश की पीएम थीं. जाहिर है जनता के बीच वोट मांगने पीएम की हैसियत से गईं.

ऐसा ही राजीव गांधी के साथ हुआ. मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हालात कहीं बेकाबू ना हो जाएं, इंदिरा के कुछ करीबियों ने राजीव को फौरन पीएम बनवा दिया और इंदिरा के अंतिम संस्कार से पहले ही शपथ तक दिलवा दी. जब देश चुनावों में गया तो राजीव गांधी देश के पीएम थे. एक एक बच्चे तक को उनका नाम पता चल गया था. इंदिरा की मौत की सहानुभूति लहर ने उनकी झोली भर दी और 415 रिकॉर्डतोड़ सीटें उनके कब्जे में आ गईं. ये अलग बात है कि बोफोर्स तोप घोटाले की आंच ने उनको अगले चुनाव में नहीं जीतने दिया.

राहुल गांधी 2009 में पीएम बन सकते थे. मनमोहन सिंह के बदले उनको मौका दिया जा सकता था. कम से कम 2014 से भी दो साल पहले पीएम बना देते तो, कम से कम लोगों को उनका काम, उनके तेवर, उनके फैसले तो देखने को मिलते. जो उनके बारे में लोगों की राय बनाने में मदद करते. विपक्ष का नेता बस आरोप लगा सकता है, वो लगाते भी रहे, पहले टर्म में उनको वो भी सुविधा नहीं थी, वो डिफेंसिव मोड में थे. जबकि सामने मोदी थे, जिनके गुजरात मॉडल की दुनिया में चर्चा हो रही थी. इस बार मोदी के तमाम फैसले लोगों ने देखे, योजनाएं देखीं, उनकी आलोचना हुई तो ये मैसेज गया कि य़े आदमी दमदार है.

जबकि राहुल बिना सत्ता के कोई भी मैसेज ढंग से नहीं दे पा रहे हैं और सड़क पर लड़ाई का तजुर्बा जब उन्हें लेना चाहिए था, उस उम्र में उनके नाम को बदलकर कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाया जा रहा था क्योंकि उनकी जान को खतरा था. लेकिन राहुल को ये भी नहीं आता कि उस माहौल को इमोशनली बताकर वो वोटों में तब्दील कर सकें. ऐसे में इतना तय लगता है कि राहुल के रणनीतिकारों से ये बड़ी चूक हुई है कि उनको बिना पीएम बनाए, जलवा जलाल कायम किए मैदान में अकेला उतार दिया है और अब दोबारा शायद ये मौका मिलने वाला भी नहीं है. अब तो सत्ता वापस हासिल करने के लिए राहुल गांधी को ही खपना है और पार्टी को खपाना है.

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