नई दिल्ली: लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट के नोटिफिकेशन के पांच साल बाद केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष को पहले लोकपाल का चेयरपर्सन घोषित किया है. राष्ट्रपति ने जस्टिस दिलीप बी भोसले, जस्टिस पी के मोहंती, जस्टिस अभिलाषा कुमारी और जस्टिस एके त्रिपाठी को ज्यूडिशियल मेंबर के तौर पर नियुक्त किया है. इनके अलावा दिनेश कुमार जैन, अर्चना रामासुंदरम, महेंद्र सिंह और डॉ पी आई गौतम नियुक्त सदस्य होंगे.

लोकपाल की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के बाद हुई है जिसमें शीर्ष कोर्ट ने कहा था कि निर्धारित समय सीमा के भीतर लोकपाल की नियुक्ति की जानी चाहिए. 7 मार्च को चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने सरकार से कहा था कि दस दिन के अंदर सिलेक्शन कमेटी की मीटिंग की तारीख बताएं.

सिलेक्शन कमेटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी थे आठ अन्य लोगों को लोकपाल के सदस्य के तौर पर चुना था. विपक्ष में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता मलिकार्जुन खड़गे इस बैठक में शामिल नहीं हुए थे. उन्होंन ये कहते हुए मीटिंग में हिस्सा लेने से मना कर दिया था कि उन्हें विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता के तौर पर नहीं बल्कि विशेष आमंत्रण पर इस मीटिंग में बुलाया गया था.

कौन हैं देश के पहले लोकपाल जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष?

27 मई 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जज पद से रिटायर होने वाले जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष ने 1976 में कोलकाता में लॉ की प्रेक्टिस शुरू की थी. 1997 में वो कोलकाता हाई कोर्ट में जज नियुक्त हुए. फिलहाल वो नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन के सदस्य हैं. जस्टिस घोष उस बेंच का नेतृत्व कर रहे थे जिसने तमिलनाडू की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता और उनकी सहयोगी शशिकला के खिलाफ बेनामी संपत्ति मामले की सुनवाई कर रही थी. इस बेंच ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए शशिकला को जेल भेजने का फैसला सुनाया था.

इसके अलावा जस्टिस घोष उस खंडपीठ का भी नेतृत्व कर रहे थे जिसने अयोध्या बाबरी मस्जिद मामले में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाडी, उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ आपराधिक साजिश का मामला फिर से शुरू करने का फैसला सुनाया था. इसके अलावा जलिकट्टू पर प्रतिबंध लगाने का फैसला देने वाली बेंच का भी जस्टिस घोष हिस्सा रहे हैं.

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