नई दिल्ली. तारीख थी 24 मई 1971, गर्मी का मौसम था और दिल्ली वैसे ही काफी गरम रहती है. अखबार के दफ्तरों में बड़ी खबर की कमी की वजह से बोर हो रहे क्राइम रिपोर्टर्स को दिल्ली पुलिस के उनके सूत्रों से फोन आता है कि पार्लियामेंट स्ट्रीट की स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की ब्रांच में 60 लाख का डाका पड़ गया है. तब तो 60 लाख बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. थोड़ी ही देर में बैंक पर मीडिया वालों का जमावड़ा लग चुका था. पुलिस की टीमें दवाब में थीं. रात होते होते पुलिस ने खुलासा कर दिया कि किसी ने इंदिरा गांधी की आवाज में बैंक के कैशियर को फोन करके 60 लाख रुपयों की ठगी की थी, बहुत जल्द ही वो व्यक्ति गिरफ्तार भी कर लिया गया. उस वक्त तो मीडिया ने पुलिस की ही कहानी छाप दी थी, लेकिन हकीकत ये है कि ये केस आज तक सोल्व नहीं हुआ है और उसका राज उस केस में तीन-चार किरदारों की मौत के साथ ही उनके सीने में दफन हो गया, जिनमें से एक थीं भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी. पीएनबी स्कैम के हंगामे में ये कहानी जानना आपके लिए वाकई में दिलचस्प होगा.

पुलिस की पूरी कहानी ये थी, उस वक्त सीनियर कैशियर वेदप्रकाश मल्होत्रा ही बैंक में मौजूद सबसे बड़े अधिकारी थे. उनके पास पीएम सचिवालय से एक फोन आता है, जो अपना नाम पीएन हक्सर बताता है, हक्सर पीएम के सचिव हुआ करते थे, काफी ताकतवर अधिकारी थे. वो वेदप्रकाश को कहते हैं कि पीएम साहिबा बात करेंगी और दो सेकंड होल्ड के बाद इंदिरा गांधी लाइन पर थीं. इंदिरा वेदप्रकाश से कहती हैं, कि देखो एक सीक्रेट मिशन का केस है, जो ईस्ट पाकिस्तान (बांग्लादेश) से जुड़ा है. दरअसल उन दिनों पाकिस्तान से ईस्ट पाकिस्तान के मुद्दे को लेकर तनातनी चल रही थी, और बाद में दिसम्बर में युद्ध भी छिड़ गया था. सो वेदप्रकाश ने पूछा कि मुझे क्या करना है? इंदिरा गांधी ने कहा कि फलां जगह पर तुम्हें रुस्तम सोहराब नागरवाला मिलेंगे, उन्हें 60 लाख रुपया पहुंचा दो फौरन. इंदिरा ने उन्हें कोड भी बताया, कि वो व्यक्ति आपसे कहेगा ‘बांग्लादेश का बाबू’, आप कहोगे ‘बार-एट-लॉ’. उसके बाद उसे पैसे दे देना. उसके बाद फोन काट दिया गया.

चूंकि इंदिरा गांधी का फोन था, वेदप्रकाश मल्होत्रा ने फौरन बैंक में मौजूद डिप्टी चीफ कैशियर राम प्रकाश बत्रा से कैश बॉक्स में 60 लाख रखने को कहा, एक बैंककर्मी एचआर खन्ना ने बत्रा की मदद की. डिप्टी हैड कैशियर रावल सिंह ने बत्रा से कैश वाउचर मांगा तो उन्होंने कह दिया वेदप्रकाश साइन करके देंगे. पैसा बैंक की ऑफीशियल कार में लाद दिया गया, जिसे खुद वेदप्रकाश मल्होत्रा ड्राइव करके ले गए. कार को बैंक से थोड़ा आगे ले जाकर मल्होत्रा ने पार्क कर दिया. वहां उसके पास एक लम्बा गोरा आदमी आया और उनसे वही कोडवर्ड बोला, मल्होत्रा ने वो रकम उसके हवाले कर दी, वो एक टैक्सी में लादकर चला गया, जाते जाते ये कह गया कि कैश वाउचर के लिए आपको पीएम हाउस जाना पड़ेगा. मल्होत्रा पीएम हाउस पहुंचे तो पता चला कि पीएम तो संसद में हैं, वो संसद पहुंचे तो पीएम से तो मुलाकात नहीं हुई लेकिन स्टाफ ने पीएन हक्सर से बात करवाई. हक्सर चौंके और बताया कि उन्होंने ऐसा कोई फोन नहीं किया, जाकर पुलिस में एफआईआर करवाओ. मल्होत्रा घबरा गए और जाकर एफआईआर दर्ज करवाई.

पुलिस फौरन एक्शन में आई, उस टैक्सी वाले को पकड़ा गया, वहां से पता चला कि दूसरी टैक्सी में गया था. दूसरे टैक्सी वाले, एक सूटकेस खरीदने वाले से लेकर पुलिस उस व्यक्ति यानी रुस्तम सोहराब नागरवाला के घर तक पहुंच गई. लेकिन वो वहां नहीं मिला, आखिरकार पुलिस ने उसे एक पारसी धर्मशाला से सारी रकम के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. ये थी पुलिस की कहानी, बाद में पुलिस ने उसका एक कनफैशन ऑन कैमरा रिकॉर्ड किया और 10 मिनट की सुनवाई के बाद सैशन कोर्ट ने उसको चार साल की सजा और एक हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुना दी.

उसके बाद नागरवाला ने जेल से एक पिटीशन लगाई उसके केस की दोबारा सुनवाई के लिए, लेकिन शर्त के साथ कि उसी जज की कोर्ट में सुनवाई ना हो, लेकिन रिजेक्ट कर दी गई. फिर उसने दूसरी पिटीशन लगाई कि जब तक वेद प्रकाश मल्होत्रा से सुनवाई और पूछताछ पूरी ना हो जाए, उसके केस की कार्यवाही आगे ना बढ़े. उसके बाद 20 नवम्बर 1971 को इस केस की जांच करने वाले इंस्पेक्टर कश्यप की उस वक्त कार एक्सीडेंट में मौत हो जाती है, जब वो अपने हनीमून पर था.

उसके बाद नागरवाला कंरट मैगजीन के पारसी एडीटर डीएफ कारका को संदेश भिजवाता है कि मेरा इंटरव्यू कीजिए, मेरे पास काफी कुछ है बताने को. डीएफ बीमार थे, वो अपने एक सहयोगी को भेजते हैं, लेकिन रुस्तम मना कर देता है. ऐसे में 1972 के फरवरी महीने की शुरूआत में नागरवाला बीमार होता है तो उसे तिहाड़ जेल के हॉस्पिटल में एडमिट कर दिया जाता है, वहां से उसे जीबी पंत हॉस्पिटल में शिफ्ट कर दिया जाता है. 21 फरवरी की ताऱीख थी वो. कुछ दिनों के इलाज के बाद 2 मार्च को उसका जन्मदिन होता है, उसी दिन लंच करने के बाद अचानक वो बेहोश हो जाता है और 2 बजकर 15 मिनट पर डॉक्टर उसे मरा हुआ घोषित कर देते हैं.

ऐसे तो नागरवाला की मौत के साथ ही इस केस पर परदा पड़ जाता है, लेकिन बाद में उसके वकील और खोजी पत्रकारों की टीम ने उस वक्त काफी कुछ ढूंढ निकाला था. बताया जाता है कि वेदप्रकाश मल्होत्रा नाम का वो कैशियर ना तो पहली बार इस तरह किसी को पैसा पहुंचा कर आया था और ना ही पहली बार रुस्तम सोहराब नागरवाला से ही मिला था. पता चला कि नागरवाला पहले मिलिट्री इंटेलीजेंस में था और अब भी सरकार के सीक्रेट मिशन से जुड़ा हुआ था, पीएम आवास में उसका आना जाना था. आरोप लगाया गया कि उसने पीएम इंदिरा की आवाज निकालकर फोन पर बात की थी, एक मर्द के लिए औरत की आवाज निकालना इतना आसान नहीं था. फिर जो कोडवर्ड वेदप्रकाश ने अपने बयान में बताया था, उससे नागरवाला के कनफैशन बयान में थोड़ा बदलाव था. पुलिस और कोर्ट ने इस मुद्दे को ज्यादा समय भी नहीं दिया, उसके बाद इस केस से जुड़े बैंक और पुलिस कर्मचारियों की जैसे एक एक करके संदिग्ध मौत हुई और खुद नागरवाला की मौत ने इंदिरा गांधी को संदेह के घेरे में ला दिया था.

विपक्ष ने आरोप लगाया कि इंदिरा सीक्रेट मिशन के नाम पर बिना किसी कागजी कार्यवाही के निजी इस्तेमाल के लिए भी ऐसा पैसा निकालती थी. पुलिस के बयान में था कि वेदप्रकाश मल्होत्रा ने एफआईआर करवाई थी, जबकि एफआईआर डिप्टी हैड कैशियर रावल सिंह के नाम से थी. आरोप लगा कि जब वेदप्रकाश मल्होत्रा एक घंटे तक नहीं लौटा तो रावल सिंह थाने चला गया था और पुलिस अधिकारी एक्शन में आ गए थे. बात मीडिया तक पहुंच गई थी, इसलिए पीएम और हक्सर ने इस मामले से अपने हाथ पीछे खींच लिए थे. ना केवल पर्सनल इस्तेमाल और गैरकानूनी तरीके के आरोप लगते बल्कि मुक्ति वाहिनी की मदद के आरोप भी लगते. ऐसे में कुर्बानी दे दी गई सीक्रेट एजेंट रुस्तम सोहराब नागरवाला की, जिसे रॉ एजेंट तक कहा गया. उसको इस तरह के मिशंस के लिए पैसा पहुंचाने का कूरियर एजेंट कहा जाता था और स्टेट बैंक की उस ब्रांच में कैशियर वेदप्रकाश मल्होत्रा को उस तरह के मिशंस के लिए पैसा देने की जिम्मेदारी दी गई थी. तभी तो उसने बिना हील हुज्जत के 60 लाख की रकम दे दी. इस मामले को लेकर जनता पार्टी सरकार ने रेड्डी जांच आयोग भी 1977 में बनाया था, लेकिन कोई रहस्य उजागर नहीं हो पाया, क्योंकि केस से जुड़े लोग संदिग्ध मौत का शिकार हो चुके थे. ये राज हक्सर और इंदिरा गांधी के ही सीने में दफन था और उनके साथ ही चला गया.