नई दिल्ली: नोटबंदी कर देश में काला धन खत्म करने की साहसिक पहल करने वाली केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर राजनीतिक चंदे के लिए रिजर्व बैंक की अनदेखी कर इलेक्ट्रोरल बॉन्ड लाने का आरोप लगा है. हफपोस्ट की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आरबीआई की आपत्तियों को नजरअंदाज कर केंद्र सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर आई जिससे बैंकिंग कानून के मूलभूत सिद्धांतों पर खतरा होगा.

खबर के मुताबिक मामला 1 फरवरी 2017 का है जब तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली अपने बजट भाषण में इलेक्टोरल बॉन्ड की घोषणा करने वाले थे. 28 जनवरी 2017 को वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपने सीनियर अधिकारियों को आधिकारिक नोट लिखकर बताया कि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए गुमनाम चंदे को वैध करने के लिए रिजर्व बैंक अधिनियम में बदलाव करना होगा. इस बाबत उन्होंने एक ड्राफ्ट बनाकर अपने सीनियर अधिकारियों के पास भेज दिया.

वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने तत्कालीन डिप्टी गवर्नर रामा सुब्रमण्यम गांधी को संशोधन वाला ड्राफ्ट भेज दिया और उनसे आरबीआई अधिनियम संशोधन को लेकर राय मांगी. इसके जवाब में आरबीआई ने 30 जनवरी 2017 को विरोध दर्ज करते हुए वित्त मंत्रालय को लिखा कि चुनावी बॉन्ड और आरबीआई अधिनियम में संशोधन एक गलत परंपरा शुरू होगी और इससे मनी लॉन्ड्रिंग को बढ़ावा मिलेगा साथ ही साथ भारतीय करेंसी पर भी भरोसा कमजोर होगा.

रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई वित्त मंत्रालय को चिट्ठी लिखकर साफ शब्दों में इलेक्ट्रोरल बॉन्ड का विरोध किया. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आरबीआई की सभी आपत्तियों को खारिज करते हुए तत्कालीन राजस्व सचिव हंसमुख अधिया ने एक संशिप्त नोट लिखा जिसमें अधिया ने कहा कि ‘आरबीआई की सलाह काफी देर से आई है और वित्त विधेयक पहले ही छप चुका है. इसलिए हम अपने प्रस्ताव के साथ आगे बढ़ सकते हैं.’ रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आरबीआई के अलावा बैंकों ने भी रूपये की अस्थिरता संबंधी खतरों को लेकर सरकार को आगाह किया था कि वो आरबीआई नियमों से छेड़छाड़ ना करे लेकिन सरकार ने बैंकों के सुझावों को भी नजरअंदाज किया.

1 फरवरी 2017 को तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में चुनावी बॉन्ड बनाने के लिए आरबीआई के अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव रखा और फिर वित्त विधेयक 2017 के पारित होने के साथ ही ये संशोधन प्रस्ताव पारित हो गया. चुनावी बॉन्ड लागू होने से पहले भारतीय कारपोरेशन को राजनीतिक चंदे का ब्यौरा अपने सालाना ऑडिट में दिखाना होता था. इसके अलावा विदेशी कंपनियां राजनीतिक दलों को चंदा नहीं दे सकती थी लेकिन अब चुनावी बॉन्ड के जरिए भारतीय कंपनियों के साथ-साथ शेल कंपनियां भी गुप्त रूप से असीमित मात्रा में इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद सकती है और जिस पार्टी को चाहे उसे बॉन्ड के जरिए चंदा दे सकती है. इस तरह विदेशी कंपनी भी चाहे तो वो किसी संस्था या ट्रस्ट के जरिए किसी पार्टी को चंदा दे सकती है.

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