नई दिल्ली. देश में चाहे आप जहां रहते हों हर तरह की मंडी से आपका सामना हुआ होगा. कपड़े, सब्जी, फल, मांस-मछली, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर तमाम तरह के बाजार हैं जहां दुनिया भर की चीजें मिलती हैं. लेकिन कोई मंडी आपने ऐसी देखी है जहां नेता, विधायक, सांसद बिकते हों. चौंकिए मत हो सकता है जल्द ही इस तरह की कोई मंडी भी देश में खुल जाए. महाराष्ट्र में हर दल अपने विधायकों को बिकने से बचाने के लिए होटल-रिजॉर्ट के चक्कर काट रहा है. बीजेपी, शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस सभी अपने विधायक बचाने दूसरे विधायक रिझाने के खेल में उलझे हुए हैं. 

अपने ही दल के नेता जी पर पार्टी के मुखियाओं को भरोसा नहीं रहा है. कौन जाने बाजार में किस कीमत पर कौन सा विधायक बिक जाए. कर्नाटक चुनाव में देश ने विधायकों के खरीद-फरोख्त की खबरें सुनी, महाराष्ट्र में इस किस्म की खबरें आ रही हैं. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने तो अपने तमाम कार्यकर्ताओं को कहा है कि होटल के चप्पे-चप्पे पर नजर रखो. विधायकों से मिलने कोई भी न आ सके. अपने ही विधायकों पर आलाकमान को भरोसा नहीं रहा है. जनता से तो खैर किसी को मतलब ही क्या.

90 के दशक में मिथुन की फिल्मी ट्रैजडी और आज के नेताजी!

1990 के दशक में मिथुन चक्रवर्ती सी ग्रेड की फिल्में करने लगे थे.  इन फिल्मों में मिथुन के साथ कुछ ट्रेजडी तो हमेशा होती थी. जैसीे उनके भाई की हत्या, बहन की इज्जत लुट जाना, प्रेमिका और परिवार का अपरहरण. भारत की राजनीति भी कुछ मिथुन की फिल्मोें की ही तरह हो गई है. हर बार चुनाव के बाद विधायकों की खरीद-फरोख्त की बातें आती हैं. दुशमन, दोस्त हो जाते हैं और दोस्त दुशमन. परिवार भी टूटता है और पार्टियां भी. महाराष्ट्र में जो हो रहा है वह इसी पैटर्न का दोहराव है.

जनता जनार्दन को भारतीय राजनीति ने परामर्श मंडल में डाल दिया है!

परामर्श मंडल तो जानते हैं ना आप. अरे वहीं परामर्श मंडल जिसमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी जैसे बीजेपी के संस्थापकों को  बिना उनसे विमर्श किए डील दिया गया है. हर कार्यक्रम और शपथ ग्रहण में प्रथम पंक्ति की दो-तीन कुर्सियां खाली छोड़ दी जाती हैं. अगर ये बुजुर्ग नेता आए तो इन्हें इन कुर्सियों पर टिका दिया जाता है. यह बात लगभग यकीन से कही जा सकती है कि कुर्सियों तक के चयन में इन नेताओं से परामर्श नहीं लिया जाता होगा. कुछ यहीं हालत देश की जनता की है. सम्मान तो बहुत है ( सिर्फ भाषणों में) लेकिन असल में उनके हाथ में कुछ है नहीं. जनता हर चुनाव में अपने हाथ पर नीली स्याही का निशान लगवा आती है, वोट डालकर. लेकिन इससे बहुत ज्यादा फर्क पड़ता नहीं है. 

क्या मैं झूठ बोलयां?

जनता आहत न हो जाए इसलिए अपनी बात कुछ उदाहरणों से साबित करता हूं. वैसे भी भारत की जनता शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस (गजनी में आमिर खान वाली बीमारी) की शिकार है. कर्नाटक में जनता ने जिस पार्टी को तीसरे नंबर पर रखा यानी खारिज किया उसी जेडीएस के एचडी कुमारास्वामी मुख्यमंत्री बन गए. हालांकि कर्नाटक में उसके बाद जो नाटक हुआ यह सारे देश ने देखा. गोवा, मणिपुर का उदाहरण देखिए जहां जनता ने जिस पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें दीं वह विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई.

जनादेश का मतलब क्या-ठेंगा!

बिहार में बीजेपी के खिलाफ जनता ने वोट दिया लेकिन नीतीश कुमार ने बाद में आरजेडी को छोड़कर बीजेपी के साथ सरकार बना ली. इन सारे मामलों में एक चीज कॉमन है और वो है जनादेश को ठेंगा दिखाते नेता. खैर अब तो जनता को भी विधायकों की खरीद-फरोख्त के खेल में मजा आने लगा है. इस नाचीज की सलाह माने तो क्रिकेटरों की तरह IPL की तर्ज पर नेता प्रीमियर लीग आयोजित हो और हर नेता की खुली बोली लगे. ज्यादा कीमत पर बिकने वाले नेता को जनता भी सम्मान की नजर से देखेगी. 

डिस्क्लेमर: यह व्यंग्य है इसे इसी तरह लें

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