मुंबई: उर्दू का एक बड़ा ही मशहूर शेर है कि न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए, रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम न इधर के हुए न उधर के हुए. महाराष्ट्र की राजनीति को देखते हुए शिवसेना पर ये शेर खूब बैठता है. शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस के भरोसे बीजेपी से गठबंधन भी तोड़ा और अब दोनों के हाथ खींचने के बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया है. इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर बाकी नजर डालें तो एक बात जो साफ तौर पर समझ में आती है वो ये कि इस खेल में किसी ने चाणक्य की भूमिका निभाई है तो वो हैं शरद पवार. शरद पवार ने एक तीर से दो निशाने लगाए. पहला बीजेपी-शिवसेना का गठबंधन खत्म करा दिया और दूसरा एनसीपी के लिए महाराष्ट्र में मजबूत जगह बना ली.

शरद पवार कहते रहे कि जनता ने एनसीपी को विपक्ष में बैठने का आदेश दिया है. कांग्रेस भी इस मामले पर चुप रही लेकिन पर्दे के पीछे सरकार बनाने की संभावनाओं पर मंथन होता रहा. शरद पवार को बहुत अच्छे से पता था कि बीजेपी महाराष्ट्र में तेजी से बढ़ रही है और शिवसेना हमेशा बीजेपी की सहयोगी रही है. ऐसे में अगर ये दोनों पार्टियां साथ रहती है तो एनसीपी का सत्ता में आना काफी मुश्किल होगा.

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव का रिजल्ट आने के बाद से शिवसेना खुद को किंगमेकर समझ रही थी और बीजेपी को ब्लैकमेल कर रही थी कि कम से कम 2.5 साल के लिए सीएम पद उनकी पार्टी को दिया जाए. बीजेपी भी सीएम पद पर किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं थी. इस बीच शरद पवार ने मौके की नजाकत का फायदा उठाते हुए शिवसेना को पिन मारा कि वो एनडीए से बाहर आ जाए. पुत्रमोह में उद्धव ठाकरे एनडीए से बाहर आ गए और बीजेपी ने भी कह दिया कि वो सरकार बनाने नहीं जा रहे हैं.

इस तरह शरद पवार की एनसीपी सेंटर स्टेज पर आ गई. शरद पवार ने बीजेपी और शिवसेना के बीच सत्ता को लेकर चल रही खींचतान का पूरा फायदा उठाया. ये कोई संयोग नहीं था बल्कि सोची-समझी राजनीति का हिस्सा था. शरद पवार जानते हैं कि अगर शिवसेना-एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाती है तो महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना की साख गिरेगी और एनसीपी की साख बढ़ेगी. एक तीर से दो निशाने लगाकर शरद पवार ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वो राजनीति के चाणक्य हैं और सही समय में सही चाल चलकर सामने वाले को चारो खाने चित करने की कला उन्हें बखूबी आती है.

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