नई दिल्ली. 30 जनवरी 1948 को शाम सवा पांच बजे मोहन दास करमचंद गांधी जिन्हें पूरा देश प्यार से बापू बुलाता था दिल्ली के बिड़ला भवन में अपने प्राथना स्थल की तरफ बढ़ रहे थे. इसी दौरान नाथू राम गोड़से नाम का एक युवक उनके पांव छूने के लिए झुकता है. महात्मा गांधी के साथ चल रही उनकी पोती मनु बेन उस युवक से कहती हैं कि बापू को प्राथना के लिए देर हो रही है भाई. नाथू राम, मनु बेन को धक्का देता है और इटालियन रिवॉल्वर बेरेटा एम 1934 से प्वाइंट ब्लैंक रेंज से गांधी के सीने में तीन गोलियां दाग देता है. गांधी के एक हाथ में माला थी दूसरे में भगवत गीता. वो धड़ाम से जमीन पर गिरे और उनके मुंह से जो आखिरी शब्द थे वो थे- हे राम! इतनी कहानी तो शायद आपको पता हो लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि ठीक अगले साल जब गणेश चतुर्थी हुई तो मुंबई के मशहूर लाल बाग चा राजा सहित सैकड़ों पंडालों में भगवान गणेश को गांधी के रूप में दर्शाया गया था. यह थी गांधी के प्रति इस देश में श्रद्धा. लाल बाग का राजा के पंडाल में इस देश का इतिहास झांकता है. 

अब इस फ्लैशबैक से तुरंत बाहर आएंगे तो झटका लग सकता है. अब तो देश में गोड़से के नाम पर मंदिर बनाने वाले लोग भी हैं. उत्तर प्रदेश की उस महिला नेता का वह वीडियो तो आपने देखा ही होगा जिसमें महात्मा गांधी की तस्वीर पर गोली चला रही है. बस इतना ही नहीं उसने अंदर नकली खून भरे गुब्बारे भी रखे थे ताकि तस्वीर से खून गिरता हुआ भी दिखे. यह विशुद्ध मानसिक दिवालियापन है. लेकिन यह भारत में ही हो सकता है कि एक जमाने में जिस गांधी को लोग महात्मा मानते थे, उन्हीं के खिलाफ दुष्प्रचार अभियानों के कई दौर के बाद अब खुलकर गांधी के हत्यारे को समर्थन देने वाले लोग सामने आ रहे हैं. 

लाल बाग का राजा की गणेश चतुर्थी: बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू से लेकर ISRO तक
बाल गंगाधर तिलक ने आजादी के संघर्ष को गति देने के लिए और आम लोगों को संगठित करने के लिए गणेश महोत्सव को महाराष्ट्र में एक बड़े कार्यक्रम में तब्दील किया. इस महोत्सव में आम लोग गणपति की आराधना भी करते और आजादी की लड़ाई के लिए योजनाएं भी बनाते. इस तरह गणेश महोत्सव सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम न होकर आजादी की लड़ाई का बड़ा जलसा बन गया. लाल बाग के राजा ने भी समाज में आए हर परिवर्तन को अंगिकार किया. लाल बाग के राजा के पंडाल की यह पांच तस्वीरें मुमकिन है वह कह जाएं जो इन दिनों कहने का दौर नहीं रहा. हम आपको लाल बाग के राजा के पांच ऐसे रूप के दर्शन कराने जा रहे हैं जो देश की तात्कालिक हालात की जीती-जागती दास्तान हैं. 

  1. लाल बाग का राजा पंडाल साल 1943 ( Lal Bagh Ka Raja 1943)- भारत छोड़ो आंदोलन के नायक गांधी के साथ लाल बाग के राजा

लाल बाग चा राजा का यह पंडाल साल 1943 का है, भारत छोड़ो आंदोलन के नायक गांधी के साथ. यह निर्णायक लड़ाई थी. गांधी ने करो या मरो का नारा दिया था. सभी नेता जेल में ठूंस दिए गए थे. लेकिन गांधी ने जनता की ट्रेनिंग कर दी थी. यह अंग्रेजी शासन पर निर्णायक चोट थी. इसके बाद अंग्रेजी राज की उल्टी गिनती शुरू हो गई.

 2. लाल बाग का राजा पंडाल 1949 (Lal Bagh Ka Raja 1949)- गांधी की शहादत का सर्वोच्च सम्मान

महात्मा गांधी की हत्या के बाद पूरा भारत शोक की लहर में डूबा था. गांधी के प्रति श्रद्धा का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि इस साल लाल बाग के राजा ने महात्मा गांधी का रूप धारण किया था. मुंबई के ऑर्थर रोड में स्थित लाल बाग के राजा से कुछ ही घंटों की दूरी पर पूणे में गांधी का हत्यारा नाथूराम गोड़से रहा करता था.

3. लाल बाग का राजा पंडाल 1964 (Lal Bagh Ka Raja 1964) पंडित जवाहर लाल नेहरू को अंतिम विदाई

27 मई 1964 को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का निधन हो गया था. इन दिनों भले नेहरू को भी गाली देने का दौर चल निकला है लेकिन सोचिए अगर उस नाजुक दौर में नेहरू ने देश को बांधकर न रखा होता तो शायद भारत ऐसा नहीं होता. उनके निधन के बाद लाल बाग के राजा भी पंडित नेहरू को आशीर्वाद दे रहे हैं.

4. लाल बाग का राजा पंडाल 1969 (Lal Bagh Ka Raja 1969)- ISRO का जन्म, चांद छूने के सपने की पहली तस्वीर

चंद्रयान 2 की कामयाबी का जश्न मनाना हम शुरू कर चुके हैं. गगनयान के जरिए भारत 2022 में अंतरिक्ष में आदमी को भेजने को प्रतिबद्ध है. इस सबके पीछे जो संस्था जिम्मेदार है भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद (ISRO). इसकी स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी. लाल बाग के राजा के इसी साल के जश्न में भारत की चांद छूने की तमन्नाओं को दर्शाया गया था. आज हमने चांद छू लिया है लेकिन इसका सपना जब रोपा गया था उसकी सूरत कुछ ऐसी थी.

5. लाल बाग का राजा पंडाल 1975 (Lal Bagh Ka Raja 1975) अपातकाल का साल, देश की सामाजिक विषमता और गैरबराबरी पर चोट

यह दौर था जब देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (इमेरजेंसी) की घोषणा कर दी. इस साल लाल बाग के राजा के पंडाल में देश में फैली समाजिक विषमता को दर्शाया गया है. इस दौर तक भारत के आदर्शवाद का सपना चटक चुका था. देश की तल्ख हकीकत सिनेमा में एंग्री यंग मैन को जन्म दे रही थी तो बंगाल में नक्सलवाद से लेकर पंजाब में अलगाववाद की कोशिशें तेज हो गईं. ऐसे में आपातकाल ने देश के लोकतांत्रिक मूल्यों पर ऐसी चोट की जिसके निशान कभी नहीं मिटेंगे.

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