नई दिल्लीः अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के इतने पैतरे आजमाए थे कि तमाम भारतीय तो इसलिए विद्रोह नहीं करते थे क्योंकि वो उन्हें अच्छा मानते थे. इसके लिए कई अंग्रेज अधिकारी खास मेहनत करते थे. ऐसा ही एक अधिकारी था आर्थर मैसन ट्रिपेट्स जैक्सन. वो उस वक्त नासिक का मजिस्ट्रेट था, लेकिन मराठी और संस्कृत का विद्वान, लोग उसे पंडित जैक्सन के नाम से पुकारते थे. मराठियों को उन्हीं की भाषा में बात करने वाले इस अधिकारी से कितने ही भारतीय खुश थे, लेकिन वो कितना शातिर था इसको बड़ी मुश्किल से पता किया अनंत लक्ष्मण कन्हेरे की अगुवाई में उसके साथियों ने.

पहले वो भी आम भारतीयों के बारे में जैक्सन के भाषा ज्ञान और भारतीय इतिहास-संस्कृति की जानकारी की तारीफ करते थे. लेकिन बतौर नासिक मजिस्ट्रेट जब उन्होंने कई फैसलों का अध्ययन किया तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई, जिसको सब अच्छा समझ रहे थे, वो तो मीठा जहर था. वो वही कर रहा था जो अंग्रेजों के हित में था, लेकिन ये वो डंडे के जोर पर नहीं बल्कि अपनी मीठी जुबान और पद के दुरुपयोग से कर रहा था. अनंत लक्ष्मण कन्हेंरे, यूं तो पैदा रत्नागिरि जिले में पैदा हुए थे, लेकिन क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े अभिनव भारत सोसायटी में शामिल होने के बाद नासिक में रहने लगे. अभिनव भारत को वीर सावरकर ने शुरू किया था और उन दिनों उनके बड़े भाई बाबाराव सावरकर चला रहे थे. सावरकर लंदन में थे और उसी साल उन्हें काला पानी की सजा हुई थी.

यहीं अनंत की मुलाकात दो अन्य क्रांतिकारी युवा साथियों से हुई जिनके नाम थे कृष्णाजी गोपाल कर्वे और विनायक नारायण देशपांडे. अन्ना कर्वे यानी कृष्णाजी गोपाल कर्वे वकालत कर रहे थे और विनायक इंगलिश स्कूल मे टीचर थे. इनका मित्रता में अनंत ने एक उपन्यास भी लिखा था मित्र प्रेम. मजिस्ट्रेट जैक्सन उन दिनों काफी चर्चा में रहता था क्योंकि वो सबको बोलता था कि मैं पिछले जन्म में वैदिक ब्राह्मण था, इसलिए इस जन्म में भी उनका झुकाव संस्कृत और वेदों के प्रति था. लेकिन ये तीनों उसके कोर्ट के फैसलों से भी परेशान थे, खासकर अन्ना कर्वे, चूंकि वो तो दिन भर अदालत में रहता था सो हर फैसले को भारत या ब्रिटिश हितों के आधार पर परखता था, और जजों की मंशा के आधार पर भी.

मजिस्ट्रेट जैक्सने के कुछ फैसलों में उन्हें अंग्रेजी मानसिकता की बू आ रही थी, जिसमें पहला केस एक अंग्रेज अधिकारी पर था। उसकी गोल्फ की गेंद को एक भारतीय ने क्या छू लिया, उसने लात, घूंसों और लाठी से पीट पीट कर उसकी हत्या कर दी। सबको उम्मीद थी कि जैक्सन पिछले जन्म में भारतीय होने का दावा करता है, जज की कुर्सी पर बैठकर भारतीय के साथ न्याय करेगा। जैक्सन ने केवल उस अंग्रेज अधिकारी के ट्रांसफर का आदेश दिया और फैसले में लिखा कि ज्यादा दस्त होने की वजह से इस भारतीय की मौत हो गई। ये बात किसी के गले नहीं उतरी कि हत्या की सजा केवल ट्रांसफर और मौत की वजह में भी साजिश की गई।

जैक्सन का दूसरा फैसला वंदे मातरम् गाने को लेकर था, कुछ युवा कालिका मेले से लौट रहे थे और ऐसे ही समूह में वंदेमातरम गा रहे थे. उन सब पर राजद्रोह का केस लगाकर जैक्सन ने सबको जेल भेज दिया. युवा क्रांतिकारियों की टीम को भरोसा हो चला था कि वंदेमातरम का विरोधी भारतीयों का समर्थक नहीं हो सकता, वो झूठा नाटक रच रहा है. भारतीयों का करीबी होने का दावा करके केवल विद्रोह को सूंघना चाह रहा है. तीसरा मामला तो एकदम निर्णायक साबित हुआ, क्रांतिकारियों को लगा कि अब तो पानी सर से ऊपर चला गया है.

दरअसल क्रांतिकारियों के केस लड़ने वाले वकील बाबा साहेब खरे को ही गिरफ्तार कर लिया गया और बिना मुकदमे के उसे जेल भेज दिया गया. उसको अपनी सफाई देने या अपने ले कोई वकील खड़ा करने तक की इजाजत नहीं मिली. यहां तक कि उसकी सम्पत्ति की कुर्की तक कर दी गई. अब जैक्सन का नाम पूरी तरह से क्रांतिकारियों की हिटलिस्ट में आ चुका था. उसके ताबूत में आखिरी कील ठोकी वीर सावरकर के सबसे बड़े भाई गणेश दामोदर सावरकर यानी बाबराव सावरकर की गिरफ्तारी ने. उनकी गिरफ्तारी के पीछे मजिस्ट्रेट जैक्सन ही थी. आरोप लगाया गया कि उन्होने 16 पेजों की गीतों की किताब कवि गोविंद छापी है, इन गीतों में राजद्रोह की बू आती है. बाबाराव सावरकर भाइयों में सबसे बड़े थे और अभिनव भारत सोसायटी वही संभालते थे. अनंत, अन्ना कर्वे और विनायक बाबाराव की काफी इज्जत करते थे, इस गिरफ्तारी और उसमें जैक्सन की भूमिका से उन्हें काफी गुस्सा आया और उन्होंने मजिस्ट्रेट जैक्सन का खेल खत्म करने की योजना बना ली, वो भी अपनी जान की बाजी लगाकर।

उस उम्र में भी अनंत ने जो फुलप्रूफ प्लान बनाया था, उसमें उसके दोनों साथी कमी निकालने में नाकाम रहे. बस एक ही दिक्कत थी, अनंत किसी भी कीमत पर जिंदा वापस नहीं लौटने वाला था, हालांकि बाकी दोनों के हिस्से में जिंदा बचने के मौके थे. उन्होंने इस तरह अनंत को अपनी जान देने की योजना का विरोध भी किया, लेकिन ना चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह को असेम्बली में बम फेंकने से रोक पाए थे, ना ही अन्ना कर्वे और विनायक अनंत को रोक पाए. कम उम्र के दोनों क्रांतिकारियों के अंदर एक ही जुनून सवार था, जान देने का जुनून और जान लेने का भी. हालांकि भगत सिंह ने गलती से स्कॉट की जगह सांडर्स को गोली मार दी थी, लेकिन अनंत नहीं चूके.

इसी बीच 1909 के आखिरी महीने में ये खबर आ गई थी कि मजिस्ट्रेट जैक्सन का ट्रांसफर हो गया है. ये ट्रांसफर उसको प्रमोशन के बाद मिला था, जैक्सन को मुंबई का कमिश्नर बना दिया गया था. ये तीनों बैचेन हो उठे थे, जैक्सन के शहर छोड़ने से पहले किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में उसको मारने की योजना बनाई गई. मौका भी मिल गया, उसके जाने से पहले नासिक के लोगों ने जैक्सन के फेयरवैल का कार्यक्रम नासिक के विजयानंज थिएटर में 21 दिसम्बर 1909 को रखा गया. तब अनंत ने अपना फुलप्रूफ प्लान दोस्तों के साथ रखा, उसने कहा मैं जैक्सन को मारूंगा और अपने साथ जहर ले जाऊंगा ताकि मुझे जिंदा गिरफ्तार ना किया जा सके. जिंदा पकड़ा नहीं जाऊंगा तो किसी का भी नाम सामने नहीं आएगा. लेकिन अगर वो कामयाब किसी वजह से अगर नहीं हो पाया तो दूसरा हमला विनायक करेगा. मान लीजिए विनायक को भी कामयाबी हाथ नहीं लगती तो अन्ना कर्वे के पास भी पिस्तौल होगी. जैक्सन के तीन तीन हमले में बचने की तो कोई सम्भावना ही नहीं थी.

आमतौर पर ऐसी क्रांतिकारी घटनाओं में एक ही जत्था कवरिंग के लिए होता था, यहां तीन स्तर के हमले और कवरिंग की व्यवस्था थी. भगत सिंह जब स्कॉट को मारने गए थे तो चंद्रशेखर आजाद को ये जिम्मेदारी दी गई थी कि कोई पकड़ने की कोशिश करे तो उसको गोली मारनी है. लेकिन इन युवाओं ने तो पकड़ने वाले पर फोकस किया ही नहीं था, तीनों टीमों का एक ही ध्येय था मजिस्ट्रेट जैक्सन को किसी भी सूरत में जिंदा नहीं छोड़ना, हम दिन चार रहे ना रहें.

जैक्सन के सम्मान में विजयानंद थिएटर में संगीत शारदा नाम का एक कार्यक्रम रखा गया था, कार्यक्रम जैसे ही शुरू हुआ, मंच के ठीक सामने बैठे अनंत लक्ष्मण कन्हेरे ने छलांग लगाई और ठीक जैक्सन के सामने आकर एक एक करके चार गोलियां उसके सीने में उतार दीं, वो उसको किसी भी सूरत में जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था. लेकिन चार गोलियां चलाना उसे भारी पड़ गया, उसको देर लगी और एक भारतीय और एक अंग्रेज पुलिस अधिकारी उसकी तरफ झपटे और हमला बोल दिया. अनंत को लाठियों से मारना शुरू कर दिया और वो उसे जहर खाने का मौका मिल ही नहीं पाया। जिसका खामियाजा उसके दोस्तों ने भी भुगता, उनको भी गिरफ्तार कर लिया गया. कुल 38 लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था, यहां तक कि लंदन में रह रहे विनायक दामोदर सावरकर को इस पूरे केस के मास्टर ब्रेन के तौर पर आरोपी बनाया गया.

मुंबई कोर्ट में उन पर केस चलाया गया, दिल्ली में भगत सिंह के केस की तरह उनको कोई सुर्खियां नहीं मिलीं. कोई बड़ा वकील या नेता उनके समर्थन में सामने नहीं आया, और केवल चार महीनों के अंदर ही तीनों को ठाणे जेल में फांसी की सजा दे दी गई, तारीख थी 19 अप्रैल 1910। अढ़तीस में से केवल आठ को छोड़ा गया, बाकी सबको सजा हुई. वीर सावरकर की सारी सम्पत्ति जब्त कर काला पानी की सजा दी गई. जैसा भगत, राजगुरू और सुखदेव के साथ किया गया था, वही इनके शवों के साथ किया गया. इनके शव परिवारों को देने के बजाय जेल अधिकारियों ने खुद जला दिए. इतनी ही नहीं उनकी अस्थियां तक परिवार को नहीं सौंपीं, बल्कि ठाणे के पास समंदर में बहा दी गईं. अंग्रेज अधिकारियों को डर था कि कहीं उनके शव या अस्थियां जनता के बीच विद्रोह या प्रेरणा के प्रतीक ना बन जाएं. आप देश के किसी भी हिस्से में जाएंगे तो शायद महाराष्ट्र के कुछ इलाकों को छोड़कर पूरे देश में अनंत लक्ष्मण कन्हेरे को जानने वाले ढूंढे नहीं मिलेंगे, जबकि उसने देश के एक दुश्मन की जान लेने के लिए अपनी जान देश पर कुर्बान कर दी. एक फिल्मकार ने अनंत को अनोखी श्रद्धांजलि दी, एक फिल्म ‘1900’ के टाइटिल से बनाई और उसका प्रीमियर नासिक के उसी विजयानंद थिएटर में रखा, जिसमें अनंत ने मजिस्ट्रेट जैक्सन को मौत के घाट उतार दिया था.

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