नई दिल्ली: कांची पीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती के ब्रह्मलीन होने की खबरों के बीच आपके लिए ये कहानी दिलचस्प हो सकती है. ये कहानी कांची पीठ के शंकराचार्य और एक समय में देश की सबसे ताकतवर नेता इंदिरा गांधी के एक बड़े फैसले से जुड़ी है. आजादी के बाद से अब तक कांग्रेस के तीन इलेक्शन सिम्बल रह चुके हैं. 1952 से लेकर 1971 तक कांग्रेस के आप जितने पोस्टर्स देखेंगे एक ही सिम्बल पाएंगे और वो है बैलों का जोड़ा. पंडित नेहरू के बाद शास्त्रीजी और इंदिरा गांधी ने भी इसी सिम्बल को बरकरार रखा और इंदिरा गांधी ने 1967 का चुनाव भी इसी सिम्बल पर जीता. लेकिन 1969 में कांग्रेस के दो धड़े हो गए, कामराज का कांग्रेस (ओ) और इंदिरा का कांग्रेस (आर). कामराज गुट को चरखा इलेक्शन सिम्बल के तौर पर मिला और इंदिरा ने कांग्रेस (आर) के लिए चुना अपने पहले सिम्बल से मिलता जुलता सिम्बल. यानी बैलों के जोड़े की जगह गाय और बछड़ा. लेकिन बैल और जोड़े का ये सिम्बल बदलकर हाथ का पंजा कैसे हो गया, इसके पीछे की दास्तान तब के लोग कांची के शंकराचार्य से जोड़ते हैं.

दरअसल 1977 के चुनावों में जब इंदिरा की बुरी हार हुई तो फिर कांग्रेस में दो फाड़ हो गए, तमाम नेताओं ने एक नई पार्टी बना ली और इलेक्शन कमीशन ने इंदिरा को कहा कि वो अपनी नई पार्टी के लिए एक नया सिम्बल चुने. इंदिरा की नई पार्टी का नाम रखा गया कांग्रेस (इंदिरा) यानी कांग्रेस (आई). उन दिनों इंदिरा आंध्र क दौरे पर थीं, वो पी वी नरसिंहराव के साथ थीं, उसी दौरे में वो कांची पीठ के शंकराचार्य से मिलने गई थीं. शंकराचार्य उस दिन मौन व्रत पर थे, इंदिरा ने सारी बातें, सारा घटनाक्रम बताकर पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए, संन्यास ले लूं या फाइट करूं तब भी शंकराचार्य मौन रहे. लेकिन एक घंटे इंतजार के बाद जब वो हाथ जोड़कर उठने लगीं तो शंकराचार्य ने बस इतना कहा कि अपने धर्म का पालन करो और इंदिरा की तरफ आर्शीवाद मुद्रा में अपने दायां हाथ उठा दिया. उन दिनों जयेन्द्र सरस्वती के गुरु चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती कांची पीठ के शंकराचार्य थे.

बूटा सिंह के साथ कुछ नेता जब दिल्ली में इलेक्शन कमीशन के दफ्तर गए तो कमीशन ने उन्हें तीन सिम्बल दिए साइकिल, हाथी और पंजा. इलेक्शन कमीशन में उन्हें कहा गया कि कल सुबह 10 बजे तक आप एक सिम्बल फायनल करके दे दो. ऐसे में बूटा सिंह ने बाहर निकलकर इंदिरा गांधी को फोन किया और उन्हें साऱी बात बताई. घंटों तक इंदिरा ने अपने सहयोगियों के साथ चर्चा की और इंदिरा फोन करके बूटा सिंह को ‘हाथ का पंजा’ सिम्बल चुनने को कहा. लोग बताते हैं कि इंदिरा ने शंकराचार्य का आशीर्वाद वाला हाथ देखकर ही पंजा चुनाव चिह्न चुना था. सच कुछ भी हो लेकिन ये तय है कि अगर इंदिरा साइकिल या हाथी में से कोई एक चुन लेतीं तो यूपी की राजनीति में कहानी कुछ और ही होती.

14 नवम्बर 1983 को पंडित नेहरू के जन्मदिन पर इंदिरा गांधी का वेस्ट जर्मनी के एक अखबार में एक इंटरव्यू छपा था, जिसके बारे में फ्रेंच लेखक मारसेल प्रॉस्ट ने लिखा है. उनके मुताबिक जब इंदिरा से पूछा गया था कि वो ऐतिहासिक व्यक्तियों में किस किस को पसंद करती हैं, तो उन्होंने जवाब दिया था कि आदि शंकराचार्य और लियोनार्डो दा विंची. इंदिरा का ये जवाब कला और आध्यात्म के प्रति उनके झुकाव को दिखाता है. ऐसे में उन्होंने हाथ का पंजा सिम्बल अगर शंकराचार्य के आशीर्वाद के रूप में चुन भी लिया होगा तो कोई हैरत की बात नहीं.

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