नई दिल्ली. जवाहरलाल यूनिवर्सिटी  (JNU) के छात्र फिर से सड़कोें पर हैं. बढ़ी हुई हॉस्टल फीस और सर्विस चार्ज के खिलाफ जेएनयू के छात्रों ने सोमवार को संसद तक मार्च निकाला. लेकिन इसी दौरान पुलिस की लाठियों से कई छात्र घायल हुए, सैकड़ों छात्रों को हिरासत में लिया गया. इस बीच IMD वर्ल्ड टैलेंट रैंकिंग जारी हुई है. इसमें दुनिया के 63 देशों की सूचि में भारत पिछले साल के मुकाबले छह पायदान नीचे गिरकर 59वें नंबर पर है. कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी इस रैंकिंग के बाद केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर तंज कसा है. JNU के स्टूडेंट्स को मुफ्तखोर कहने से पहले जरा भारत में उच्च शिक्षा की वर्तमान हालत का जायजा ले लीजिए तब आपको समझ आएगा कि हमारे लिए जेएनयू जैसे संस्थानों को बचाना क्यों जरूरी है.

क्या है IMD टैलेंट रैंकिग

आईएमडी टैलेंट रैंकिंग में दुनिया की 63 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की लिस्ट बनाई जाती है. इन देशों में प्रतिभाओं के लिए मौके, नौजवान लोगों की शिक्षा और नौकरी की गुणवत्ता, टैलेंटेड लोगों को अपने साथ जो़ड़ने, आकर्षित करने और प्रति छात्र शिक्षा और शैक्षणिक गुणवत्ता पर किसी देश द्वारा किये जा रहे खर्च के आधार पर यह रैंकिंग तैयार की जाती है. भारत 2018 में 63 देशों की इस रैंकिंग में 53वें नंबर पर था लेकिन इस साल भारत का प्रदर्शन और खराब हुआ है. इस बार भारत छह पायदान गिरकर 59वें नंबर पर है. 

क्या है भारत की खराब रैंकिंग का कारण?
भारत की रैंकिंग में गिरावट की मुख्य वजह है कि यह प्रतिभाओं को आकर्षित नहीं कर पा रहा है न हीं उन्हें बेहतर मौके मुहैया करवा पा रहा है. प्रदूषण के मामले में भारत की रैंकिंग 61वीं है. जीवन की गुणवत्ता के मामले में भी भारत वैश्विक तौर पर काफी पीछे 51वें नंबर पर है. ब्रेनड्रेन (भारतीय प्रतिभाओं के विदेश पलायन) की वजह से अर्थव्यवस्थता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों की सूचि वाले देश में भारत 31वें नंबर पर है.

इसके साथ ही प्रतिभाओं को आकर्षित करने और अपने साथ बनाए रखने के मामले में भी भारत काफी पीछे 35वें नंबर पर है. विदेशी प्रतिभाओं को आकर्षित करने के मामले में भारत की रैंकिंग बेहद खराब 40वें नंबर पर है. अगर भारत की प्रत्येक छात्र पर खर्च किये जा रहे पैसे और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, छात्र-शिक्षक अनुपात के मामले में भारत सेकेंड लास्ट नंबर यानी 61वें नंबर पर है. भारत की उच्च शिक्षा की स्थिति इस रिपोर्ट के मुताबिक बेहद चिंताजनक है.

शिक्षा को लेकर फर्जी नहीं सार्थक बहस की जरूरत!

शिक्षा को लेकर देश में बहस तो कई बार चली लेकिन कभी उसकी दिशा ठीक नहीं रही तो कभी दशा. राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर बात हो रही है लेकिन इसमें भी हमारा बनाम उनका की विचारधारा वाली कृत्रिम लड़ाई को प्रश्रय दिया जा रहा है. जबकि हकीकत यह है कि सरकारी स्तर पर मुफ्त में दी जाने वाली स्कूली शिक्षा की हालत चौपट है. गरीबों के बच्चों को पढ़ाने वाले इन स्कूलों की हालत इतनी खराब है कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से तो अपने बच्चों को ऐसे स्कूलों में नहीं ही भेजना चाहेगा. 

अंधेर नगरी चौपट शासन!

ASAR की रिपोर्ट बताती है कि सरकारी स्कूलों में सातवीं कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा तीसरी कक्षा के स्तर का भी ज्ञान नहीं रखता. यूनिसेफ की रिपोर्ट कहती है कि भारत के 50 फीसदी युवा 21वीं सदी में नौकरी पाने योग्य ही नहीं हैं. इस बीच CAG की रिपोर्ट कहती है कि 2017-18 में उच्च शिक्षा के लिए जुटाए गए 94,036 करोड़ रुपये खर्च ही नहीं हो पाए. इसके अलावा रिसर्च एवं विकास के लिए जुटाए गए 7,298 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हो पाए. यह शिक्षा को लेकर सरकार की गंभीरता को दर्शाता है. 

नरेेंद्र  मोदी सरकार को क्या करना चाहिए?

शिक्षा में गुणवत्ता में ऐसी गिरावट के बीच जेएनयू जैसे संस्थानों को बचाना जरुरी है. चाहे IIT हो या IIM, चाहे एम्स हो या इसरो भारत में जो कुछ सर्वश्रेष्ठ है वो भी बड़ी मेहनत से तैयार किए गए सरकारी या सार्वजनिक संस्थाएं ही हैं. ऐसे में सभी कुछ प्राइवेट करने की जिद में रही सही इज्जत भी हम गंवा बैठेंगे. भारतीय लोग दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कंपनियों के CEO तो बनेंगे लेकिन उसमें भारतीय शिक्षा व्यवस्था का कोई योगदान नहीं होगा. भारत को अपनी जी़डीपी का कम से कम 6 फीसदी शिक्षा पर खर्च करना चाहिए ऐसा बड़े शिक्षाशास्त्रियों का कहना है. फिलहाल भारत महज 3.5 फीसदी पैसा शिक्षा पर खर्च करता है. इसके अलावा शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जरूरत है.

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