नई दिल्ली:  संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा नाम का वो शख्स जब बोल रहा था तो हर कोई हतप्रभ था, वो कह रहा था, ‘’हम आदिवासियों में जाति, रंग, अमीरी गरीबी या धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं किया जाता, आपको हमसे लोकतंत्र सीखना चाहिए, हमको किसी से सीखने की जरूरत नहीं।‘’ ये वो वक्त था जब संविधान सभा में देश को संविधान बनाने की प्रकिया चल रही थी। दलित जातियों का मुद्दा खासकर गांधीजी और डा. अम्बेडकर के पूना पैक्ट के बाद तो इतना ज्यादा बड़ा हो चुका था कि संविधान सभा में उनके आरक्षण पर कब की मोहर लग चुकी थी। लेकिन आदिवासियों को लेकर किसी ने जिक्र तक नहीं छेड़ा था। ऐसे में एक आदिवासी नेता जो लंदन की मशहूर ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी में पढ़ा था, उनके हक की इकलौती आवाज के तौर संविधान सभा को गुंजाए दे रहा था।

जयपाल सिंह मुंडा की इस लड़ाई को हॉकी से हक की लड़ाई की यात्रा कहा जाता है। कोई नहीं जानता था कि एक दिन ओलम्पिक में जाने वाली पहली भारतीय टीम का कप्तान चुना जाने वाला, ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी की हॉकी टीम का सदस्य, भारत को ओलम्पिक का पहला हॉकी गोल्ड दिलाने वाला नायक कभी देश की सबसे बड़ी सभा में आदिवासियों की हक की आवाज बन जाएगा। जी हां, आज जो देश में आदिवासियों को तमाम तरह के अधिकार, नौकरियों और प्रतिनधित्व में आरक्षण, जंगल की जमीन से जुड़े अधिकार आदि मिले हुए हैं, तो उनकी वजह ये गुमनाम नायक है। ऐसे में जबकि उत्तर पूर्व के आदिवासी नागा उन दिनों भारत में शामिल होना ही नहीं चाहते थे, बिहार के छोटा नागपुर में पैदा हुआ ये आदिवासी युवा भारत में ही आदिवासियों का भविष्य बेहतर करना चाहता था।

वो कहता था कि हमें आदिवासी कहा ही इसलिए जाता है क्योंकि तमाम तरह के लोग बाहर से आए, लेकिन हम इस भूमि के आदि वासी हैं, सिंधु सभ्यता से लेकर आज तक। आदिवासी परिवार में पैदा हुए प्रमोद पाहन का नाम बाद में जयपाल सिंह मुंडा कर दिया गया, क्रिश्चियन मिशनरीज के सम्पर्क में आया तो उसे ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी के सेंट जोंस कॉलेज भेज दिया गया। वहां से उसने इकोनोमिक्स हॉनर्स से ग्रेजुएशन किया। इसी दौरान वो डिबेट्स और हॉकी में एक्टिव हुआ और ऑक्सफोर्ड की हॉकी टीम में जयपाल को चुन लिया गया। इसी दौरान जयपाल ने उस वक्त की सिविल सर्विस परीक्षा के लिए टेस्ट दिया और पास करके आईसीएस प्रोबेशनरी अधिकारी बन गया। जिसको दो साल ऑक्सफोर्ड में ट्रेनिंग लेनी थी। क्रिश्चियन मिशनरियों ने उसे अपने अभियान में लगाना चाहा लेकिन वो तो उसने खुद को आदिवासियों के लिए समर्पित कर दिया।

ये 1928 की बात है, अंग्रेजी वायसराय ने एम्सटर्डम ओलम्पिक के लिए भारतीय हॉकी टीम भेजने का मन बनाया। तो कप्तान के तौर पर ऑक्सफोर्ड में पढ़ रहे जयपाल सिंह मुंडा को कप्तान चुन लिया गया। जयपाल सिंह की कप्तानी में भारतीय टीम ने 1928 के ओलम्पिक में 17 लीग मैच खेले और आप जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि इनमें से 16 मैच भारत की टीम ने जीते और 1 ड्रॉ हुआ और भारत सेमीफायनल में पहुंच गया। जयपाल मुंडा शुरू से ही स्वाभिमानी और विद्रोही भाव का लड़का था, किसी बात पर टीम के अंग्रेज मैनेजर से बिगड़ गई। बीच ओलम्पिक में जयपाल ने टीम छोड़ दी और वापस चले आए। हालांकि भारत ने फायनल जीत लिया और गोल्ड भारत के हिस्से ही आया। लेकिन फिर जयपाल को टीम में अगले ओलम्पिक मे नहीं लिया गया। बावजूद इसके खुद उस वक्त के वायसराय ने जयपाल को तारीफ भरा लैटर लिखा। इस दौरान जयपाल ऑक्सफोर्ड इंडियन मजलिस के प्रेसीडेंट भी रहे और लाला लाजपत राय, सीएफ एंड्रयूज, एनी बेसेंट आदि नेताओं से मिलते रहे।

दिक्कत ये हो गई कि वो आईसीएस सर्विस में वापस लौटे तो आईसीएस अधिकारियों ने फिर से उन्हें हॉकी खेलने में जाया की एक साल की ट्रेनिंग करने को कहा। इंटरव्यू में सबसे ज्यादा नंबर आने के बावजूद जयपाल को ये अपमान लगा, उन्होंने नाराज होकर उस समय भारत सरकार की सबसे प्रतिष्ठित नौकरी छोड़ दी और वर्मा शैल में एक्जीक्यूटिव हो गए। कोलकाता में नौकरी करने के दौरान उन्होंने कांग्रेस के पहले और तीसरे अध्यक्ष व्योमेश चंद्र बनर्जी की नातिन तारा मजमूदार से शादी कर ली। उसके बाद वो गोल्ड कोस्ट, घाना में कॉमर्स टीचिंग करने चले गए, वहां से रायपुर के राजकुमार कॉलेज के प्रिसिंपल होकर आ गए। लेकिन वहां उनकी आदिवासी पहचान के चलते ब़ड़े घर के बेटों ने विरोध किया तो उसके बाद वो बीकानेर रियासत में रेवेन्यू कमिशनर के पद पर चले गए, रियासत ने उनका विदेशी तजुर्बा देखकर विदेश सचिव की नौकरी दे दी।

तब तक जयपाल को ये लगने लगा था कि ना तो वो देश के लिए कुछ कर पा रहे हैं और ना अपने आदिवासी भाइयों के लिए। उन्होंने डा. राजेन्द्र प्रसाद से बिहार में एजुकेशन के लिए कुछ करने को कहा, लेकिन बात नहीं बनी तो उनका मन राजनीति की तरफ मुड़ने लगा। हालांकि बिहार के गर्वनर मॉरिस हैलेट ने उन्हें बिहार काउंसिल का सदस्य मनोनीत करने का ऑफर दिया, लेकिन उन्होंने कुबूल नहीं किया। लेकिन रॉबर्ट रसेल जो बिहार के चीफ सेक्रेट्री थे के सुझाव पर उन्होंने रांची पहुंचकर आदिवासियों के लिए लड़ने का फैसला कर लिया।

जयपाल सिंह ने बनाई अदिवासी महासभा, जिसका नाम बदलकर बाद में ‘झारखंड पार्टी’ कर दिया। 1952 में बिहार विधानसभा में इस पार्टी ने 32 सीटें जीती थीं। इतिहास में अगर किसी ने सबसे पहले अलग झारखंड की मांग की, उसके नाम पर पार्टी बनाई तो वो जयपाल सिंह मुंडा थे। जब नागा समस्या बढ़ने लगी, तो नेहरू ने नागा नेताओं को साफ कह दिया था कि स्वायत्ता तो मिल सकती है, लेकिन आजादी नहीं। ऐसे में वो जयपाल सिंह मुंडा से भी मिले तो उन्होंने भी समझा दिया कि ‘’नागा पहाडियां हमेशा से भारत का हिस्सा रही हैं, इसलिए उनके देश के अलग होने का सवाल ही नहीं उठता’’। उनका ये देश पर बड़ा उपकार था क्योंकि नागा समस्या से देश दशकों तक जूझता रहा, सैकड़ों की जानें गई लेकिन झारखंड के आदिवासियों ने ये रुख नहीं अपनाया।

तो देश के उस वक्त के नेताओं ने भी जयपाल की बातों की गंभीरता और उपेक्षित आदिवासी समाज के दुख को समझा और तय किया गया कि ऐसे 400 समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दे दिया जाए। इनकी कुल आबादी देश की आबादी का 7 फीसदी थी। उनको विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बात मान ली गई और संविधान का पांचवा पूरा भाग आदिवासियों के नाम ही समर्पित कर दिया गया। कई और प्रावधानों का ऐलान भी किया गया, मसलन महाजनी प्रथा पर रोक, दीकू यानी बाहरी आदमियों पर आदिवासी इलाकों में जमीनें खरीदने पर रोक, आदिवासी सलाहकार परिषद बनाने का ऐलान आदि शामिल हैं। संविधान का छठा भाग उत्तर पूर्व के आदिवासियों के बारे है। आदिवासियों के साथ खनिज आय भी शामिल करने का प्रावधान किया गया। जिस जयपाल की मुहिम से ये सब ऐलान हुए, उन्होंने कहा कि इनका लाभ तभी मिलेगा, जब आदिवासियों के लिए अलग से राज्य मिलेगा, झारखंड।

19 दिसम्बर 1946 को जयपाल सिंह मुंडा ने संविधान सभा में अपना ऐतिहासिक भाषण दिया, कहा- ‘’ As a jungli, as an Adibasi,” said Jaipal, “I am not expected to understand the legal intricacies of the Resolution. But my common sense tells me that every one of us should march in that road to freedom and fight together. Sir, if there is any group of Indian people that has been shabbily treated it is my people. They have been disgracefully treated, neglected for the last 6,000 years. The history of the Indus Valley civilization, a child of which I am, shows quite clearly that it is the new comers — most of you here are intruders as far as I am concerned — it is the new comers who have driven away my people from the Indus Valley to the jungle fastness…The whole history of my people is one of continuous exploitation and dispossession by the non-aboriginals of India punctuated by rebellions and disorder.’’

जयपाल काफी अच्छे वक्ता थे और किसी भी डिबेट में वो आदिवासियों की बात रखने का बहाना ढूंढ ही लेते थे, करीब 8  महीने के बाद जब नेशनल फ्लैग पर चर्चा चल रही थी तो फिर से जयपाल सिंह मुंडा को बोलने का मौका मिला तो जयपाल ने कहा, ‘’इस सभा के अधिकांश सदस्य यही समझते हैं कि आर्यों में झंडा फहराने की परम्परा रही है, लेकिन मैं आप सबको बता देना चाहता हूं कि आदिवासी झंडा फहराने का काम हजारों सालों से कर रहे हैं, वो पहले हैं। हर कबीले के अपना अलग झंडा होता है और वो उसके लिए लड़मर भी जाते हैं। अब उनके दो झंडे होंगे, एक वह जिसे वो 6000 साल से फहराते आ रहे हैं, और एक नेशनल फ्लैग जो इस बात का प्रतीक होगा कि अब उनकी 6000 साल की गुलामी खत्म हो गई है और अब वो भी उतने ही स्वतंत्र होंगे जितने कि बाकी लोग हैं।‘’ दरअसल उस वक्त आर्यों के बाहर से आने की थ्यौरी काफी चर्चा में थी।

ऐसे ही जब संविधान के ड्राफ्ट पर हो रही चर्चा के दौरान जब नीति निर्देशक तत्वों में शराब बंदी की बात आई तो जयपाल सिंह मुंडा फिर खड़े हुए, बोले- ‘’ हजारों सालों से शराब आदिवासियों के दिनचर्या का एक जरूरी अंग रही है। पश्चिम बंगाल में अगर संथालों को राइस बीयर नहीं मिलेगी तो उनका क्या होगा? वो पूरे दिन घुटने से ऊपर वो पानी और कीचड़ में रहकर काम करते हैं, ये राइस बीयर है जो उन्हें जिंदा रखती है। मैं मेडिकल अथॉरिटीज से कहना चाहूंगा कि वो रिसर्च करें कि ऐसा क्या है राइस बीयर में जो आदिवासियों की जरूरत बन गई है, और उन्हें हर बीमारी से दूर रखती है।‘’ जयपाल के आदिवासी परम्पराओं और रहन सहन के ज्ञान और वाकपटुता का किसी के पास भी कोई जवाब नहीं हुआ करता था। तभी तो आदिवासियों को उनका हक दिलाने के उद्देश्य से एक सब कमेटी सोशल वर्कर एवी ठक्कर की अगुआई में बना दी गई थी। जिसकी सिफारिशों पर आदिवासियों को संविधान में तमाम अधिकार मिले। तभी तो जयपाल को मरांग गोमके यानी महान नेता कहा जाता है। कई बार जयपाल लोकसभा के सदस्य भी रहे, लेकिन उनकी उपलब्धियां आज की पीढ़ी को शायद ही पता होंगी।

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