नई दिल्ली: ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध जैसे बनते हालात ने भारत की चिंता बढ़ा दी है. ईरान ने अमेकिरी ड्रोन को मार गिराया है और साफ साफ एलान कर दिया है कि अगर उनके ऊपर किसी तरह का हमला हुआ तो वो जवाबी हमले के लिए पूरी तरह तैयार है. अमेरिकी ने भी मिडिल ईस्ट में अपने 1000 से ज्यादा जवान तैनात कर दिए हैं. राष्ट्रपति डोनाल्ड ने कहा है कि ईरान ने बहुत बड़ी गलती की है. दोनों देश के बीच हालात बेहद तनावपूर्ण है जिसने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है. भारत की बात करें तो पिछले साल तक भारत ईरान से कच्चा तेल खरीदने वाला सबसे बड़ा देश था. वहीं तेहरान भारत को तेल निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश था.

इस बीच अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर भारत को मजबूर कर दिया कि वो ईरान से तेल लेना बंद कर दे. हुआ भी ऐसा ही. भारत ने ईरान से तेल लेना बंद कर दिया. वित्तीय और भौगोलिक दौर पर देखें तो ईरान से तेल ना लेना भारत को काफी महंगा पड़ रहा है. यही नहीं ईरान से तेल ना लेना दोनों देशों के आपसी रिश्ते को भी प्रभावित कर रहा है. पाकिस्तान से अलग हटकर ईरान ने भारत को सेंट्रल एशिया और यूरोप तक भारत की पहुंच स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई है. विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत को ईरान और अमेरिकी दोनों से बेहतर संबंध बनाकर रखने की जरूरत है क्योंकि दोनों देशों से भारत के हित जुड़े हुए हैं.

ईरान के सिस्तान और बलुचिस्तान क्षेत्र में स्थित भारतीय जल सीमा में बन रहे चाबहार पोर्ट का काम रूक गया है जो अगर शुरू हो जाता है तो भारत, ईरान, अफ्गानिस्तान और दूसरे सेंट्रल एशियाई देशों के लिए व्यापार का सुनहरा अवसर प्रदान करेगा लेकिन अमेरिका ऐसा नहीं चाहता जिससे सेंट्रल एशियाई देशों के बीच सिमित व्यापार हो और उसका फायदा अमेरिका और यूरोप को मिले. चाबहार पोर्ट का ना खुलना भारतीय अर्थव्यवस्था और रणनीतिक मोर्चे पर भारत की बड़ी हार होगी. वहीं दूसरी तरफ भारत ने अमेरिका से तेल और गैस खरीदना शुरू कर दिया है जिस रास्ते को चीन ने बनाया है. इस मार्केट में भारत को कोई जगह नहीं दी गई है. वहीं दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में करीब 80 लाख भारतीय काम करते हैं और अगर दोनों देशों के बीच युद्ध होता है तो इसका सीधा असर उनपर पड़ेगा.

भारत के पास फिलहाल दो रास्ते हैं. पहला रास्ता ये कि भारत शंघाई कॉर्पोरेशन आर्गनाइजेशन के जरिए ईरान से संधि के बाद उनसे दोबारा तेल खरीदना शुरू कर दे और डॉलर की बजाय रूपये से तेल का लेन देन करे जिसके लिए ईरान तैयार है. इससे यूरोपीय यूनियन, रूस और चीन के इंस्टेक्स मैकेनिजम पर असर पड़ेगा.
हालांकि इससे भारत-अमेरिकी रिश्तों पर गहरा असर पड़ने की संभावना है.

दूसरा और सबसे लचीला विकल्प ये हो सकता है कि अमेरिका के साथ बातचीत कर औपरचारिक तौर पर आर्थिक छूट लेने की कोशिश करें या उन्हें इस बात पर राजी करें कि वो ईरान से तेल खरीद सकें और अमेरिका उसपर आपत्ति दर्ज ना करे. लेकिन इसमें भी समस्या है क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने अंतराष्ट्री तेल बाजार में ऐसे हालता बना रखे हैं कि किसी भी देश को तेल खरीदने के लिए ईरान के पास जाने की जरूरत नहीं है. कुल मिलाकर भारत को तबतक इंतजार करना होगा जबतक अमेरिका और ईरान के बीच हालात सामान्य नहीं हो जाते क्योंकि ईरान से तेल लेकर दुनिया की सबसे बड़ी अंतराष्ट्रीय शक्ति अमेरिका से दुश्मनी मोल लेना भारत के हित में नहीं है.

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