नई दिल्ली: अमेरिका यात्रा के अंतिम चरण में 26 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से मिले तो अमेरिका की इसपर खास नजर रही होगी क्योंकि यह बैठक तेहरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव की पृष्ठभूमि में हुई. असल में ईरान पर सऊदी अरब के दो प्रमुख तेल संयंत्रों पर हमला करने का आरोप है जिसके बाद से क्षेत्र में नए सिरे से तनाव बढ़ गया है. हालांकि मोदी-रूहानी वार्ता का ज्यादा खुलासा तो नहीं किया गया, लेकिन पीएमओ ने ट्वीट कर इतना जरूर बताया कि दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की और साझा हितों के क्षेत्रीय और वैश्विक विकास पर अपने-अपने विचार साझा किए. विदेश मंत्रालय के एक बयान के अनुसार, दोनों नेताओं ने विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह के परिचालन का उल्लेख किया और अफगानिस्तान तथा मध्य एशियाई क्षेत्र तक आने-जाने के लिए एक गेटवे के तौर पर इसकी भूमिका की महत्ता पर जोर दिया.

दरअसल, कश्मीर के मुद्दे पर जिस तरह से पाकिस्तान तमाम मुस्लिम देशों के समक्ष अपना रोना रो रहा है उस परिस्थिति में भारत के लिए जितना जरूरी अमेरिका है उससे कहीं अधिक जरूरी ईरान का साथ होना है। भारत-ईरान के बीच कूटनीतिक संबंधों के पन्नों को पलटें तो आप पाएंगे कि अगले साल यानी 2020 में दोनों देश दोस्ती के 70 वर्ष का जश्न मनाएंगे। इसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है और प्रधानमंत्री मोदी तथा राष्ट्रपति रूहानी ने ताजा बैठक में कूटनीतिक संबंधों की 70वीं वर्षगांठ मनाने पर सहमति भी जताई है.

पिछले कुछ वर्षों में भारत और ईरान के संबंध और बेहतर हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान और पश्चिम एशिया के साथ भारत के संबंधों को विस्तार देने के लिए मई 2016 में तेहरान का दौरा किया था। फरवरी 2018 में रूहानी ने भी भारत का दौरा किया था। कहने का मतलब यह कि भारत और ईरान की दोस्ती में अगर अमेरिका किसी तरह का विध्न पैदा करता है तो यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का जो सिद्धांत है उसकी अवहेलना होगी। हालांकि अमेरिका निश्चित रूप से इस तरह की कोशिश से बाज नहीं आएगा कि भारत दुनिया के मंच पर ईरान का साथ ना दे, लेकिन इस परिस्थिति में भारत को यह बताने और जताने की कोशिश करनी होगी कि भारत जैसे विकासशील राष्ट्र के लिए सबका साथ जरूरी है।

भारत के बारे में यह तथ्य सार्वजनिक है कि यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी तेल जरूरतों का करीब 80 प्रतिशत आयात से पूरा करता है। हाल तक इराक और सऊदी अरब के बाद ईरान भारत का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता देश था। ईरान से तेल खरीदने के लिए अमेरिका की ओर से भारत और अन्य सात देशों को मिली छह महीने की छूट की मियाद 2 मई 2019 को खत्म हो गई थी क्योंकि व्हाइट हाउस ने इसे आगे बढ़ाया नहीं। दरअसल अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है। वह नहीं चाहता कि कोई देश ईरान से तेल आयात करे। लेकिन तेल आयातक देशों की मजबूरी यह है कि अमेरिकी तेल की कीमतें ईरान के तेल की कीमतों से काफी महंगी है। अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से तेल के खेल में अमेरिका की पूरी दुनिया में तूती बोलती है और वह जब चाहे, ईरान या अन्य तेल निर्यातक देशों से तेल खरीदने को लेकर अन्य देशों पर प्रतिबंध लगा दे.

बहरहाल, भारत के लिए यह जरूरी है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखने की हर तरकीब को अपनाए। न तो हम अमेरिका के साथ उस हद तक आगे बढ़े जो ईरान को नागवार गुजरे और न ही ईरान के साथ ऐसी कोई बात करें जो अमेरिकी संबंधों पर असर पड़े। अमेरिका के लिए भारत इसलिए जरूरी है क्योंकि यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, लेकिन भारत के लिए ईरान इसलिए जरूरी है कि वह हमें सस्ता तेल तो देता ही है। साथ ही वैश्विक मंच पर उसका साथ मिलने से पाकिस्तान की नापाक कोशिशों को विफल करने में मदद मिलती है। ऐसे भी सात दशक की दोस्ती को अमेरिका की कीमत पर किनारे नहीं कर सकते हैं.

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