नई दिल्ली. Hyderabad Rape Encounter Questions: हैदराबाद पुलिस ने 6 दिसंबर को तड़के हैदराबाद के पास एनएच44 पर लेडी डॉक्टर के साथ बर्बर रेप और जलाकर मारने की दरिंदगी को अंजाम देने वाले चारों आरोपियों को पुलिस ने एनकाउंटर में उड़ा दिया. पुलिस का तर्क हमेशा की तरह आत्मरक्षा का है. पुलिस की इस कार्रवाई पर नेता, बॉलीवुड, टॉलीवुड के अभिनेता-अभिनेत्री, आम लोग सभी एकसुर में हैदराबाद पुलिस की तारीफ के कसीदे पढ़ रहे हैं. पीड़िता की बहन और परिवार ने भी इसे न्याय बताया है. लेकिन क्या यह वाकई न्याय है?

निश्चित तौर पर ऐसी जघन्य वारदात को अंजाम देने वालों को मौत की सजा मिलनी चाहिए लेकिन वह सजा देने का हक भारत में किसका है? संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के महारपरिनिर्वाण दिवस के दिन हम अपनी न्यायपालिका, विधायिका और कानून-व्यवस्था का जूलूस निकलते देख रहे हैं. क्या रेप के प्रत्येक ऐसे जघन्य मामले में यहीं कार्रवाई होगी? उन्नाव में रेप पीड़िता के परिवार को मरवाने के आरोपी बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के साथ भी यहीं होगा या आसाराम या नित्यानंद जैसे रेप आरोपियों के साथ भी इसी तरह न्याय हो सकेगा?

16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के निर्भया गैंगरेप के बाद जो विरोध की चिंगारी पूरे देश में भड़की थी उससे उम्मीद जगी थी कि भारत अब बेटियों के लिए एक ज्यादा सुरक्षित देश बन पाएगा. सात साल बाद भी निर्भया के आरोपियों को फांसी पर नहीं चढ़ाया जा सका है. न्यायपालिका में लंबित मामलों की संख्या करोड़ों में है. लेकिन किसी भी तर्क से पुलिस द्वारा चार आरोपियों का एनकाउंटर इतना जायज नहीं हो जाता कि इसका जश्न मनाया जाए. जिस तरह आनन-फानन में इनकी गिरफ्तारी हुई और आज जिस तरह इनका एनकाउंटर किया गया है, इससे कई सवाल उठ खड़े हुए हैं. इन सवालों का जवाब हैदराबाद पुलिस को देना ही होगा. 

1. अगर पुलिस एनकाउंटर ही न्याय है तो न्यायपालिका का क्या काम?

हैदराबाद पुलिस द्वारा किया गया एनकाउंटर फेक तो नहीं है इसकी न्यायिक जांच की मांग होगी. आखिर पुलिस अपनी कैद से इन चार आरोपियों को घटनास्थल पर ले जाती है घटना को रिक्रियेट करने के लिए. ऐसे में पुलिस ने पूरी तैयारी की होगी. चारों आरोपी भी कोई जेबकतरे नहीं थे कि पुलिस ने उनके भागने की संभावना पर विचार न किया हो. ऐसे में पुलिस से इतनी बड़ी चूक हुई कैसे कि आरोपी पुलिस का हथियार छीनने में कामयाब हो गए. एक बार को मान लें ऐसा हुआ भी तो क्या चारों को गोली मारने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. इस मामले में अभी अदालती कार्रवाई शुरू तक नहीं हुई ऐसे में आरोपियों का दोषी सिद्ध होना बाकी था. कहीं पुलिस ने अपने ऊपर देश भर से पड़ रहे अभूतपूर्व प्रेशर में तो इस कार्रवाई को अंजाम नहीं दिया?

2. भारत का कानून कहता है जब तक दोष साबित नहीं तब तक व्यक्ति निर्दोष

भारतीय पुलिस भारत के संविधान से ऊपर नहीं है. संविधान हर व्यक्ति को चाहे वो आरोपी हो या आतंकवादी उसे अपने आप को निर्दोष साबित करने का मौका दिया जाता है. जब तक आरोप सिद्ध नहीं होता है तब तक आरोपी को दोषी नहीं माना जाता. इन आरोपियों पर अभी अदालती कार्यवाही शुरू तक नहीं हो पाई थी. घटना के 10वें दिन  आरोपियों का एनकाउंटर हो गया. जनता में यह संदेश गया कि न्याय हो गया. लेकिन न्याय करने के लिए देश में न्यायपालिका की स्थापना की गई है. पुलिस की गोलियों से निकलने वाले न्याय पर जश्न मनाने से पहले सोचिए क्या न्याय का यहीं स्वरूप हमें भारत में चाहिए. 

3. स्वतंत्रता का अधिकार, फेयर ट्रायल का अधिकार स्थगित कर दें?

देश का संविधान मौलिक अधिकार के तौर पर राइट टू लिबर्टी को स्वीकार करता है. राइट टू फेयर ट्रायल भी इसी मौलिक अधिकार के अंतर्गत आता है. यानी इस कांड के आरोपियों के पास भी यह अधिकार था. उन्हें अपने आप को निर्दोष साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए था. पुलिस की थ्योरी पर आंख मूंदकर भरोसा करने से पहले फेक एनकाउंटर्स की पुरानी खबरों को याद कर लेना बेहतर होगा. सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र सरकार केस में 2014 में पुलिस कस्टडी में होने वाली मौतों और एनकाउंटर्स के बारे में जो दिशा निर्देश दिए हैं उनका भी साफ तौर पर उल्लंघन इस मामले में प्रथम दृष्टया प्रतीत होता है. सही तस्वीर न्यायिक जांच से ही सामने आ पाएगी. 

4. निर्भया के दोषी अब तक जिंदा हैं तो पुलिसिया इंसाफ को सही क्यों न ठहराएं?

2012 में 16 दिसंबर की रात दिल्ली में निर्भया गैंग रेप के बाद पूरा देश दहल गया. महिला सुरक्षा के सवाल पर सारा देश एकसाथ खड़ा था. कानून में बदलाव हुए, निर्भया फंड बनाया गया लेकिन नतीजा क्या निकला. एक मुख्य आरोपी राम सिंह ने जेल में ही आत्महत्या कर ली. एक नाबालिग दोषी रिहा हो गया. बाकी अभी तक जेल में बंद हैं जबकि उनकी फांसी की सजा पर मुहर लगे छह साल का वक्त हो गया. ऐसे में हैदराबाद पुलिस के ऑन द स्पॉट न्याय पर देश भर में जिस तरह जश्न मनाया जा रहा है उस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. निर्भया कांड के दोषियों की दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है. इस पर अभी तक सुध क्यों नहीं ली गई  यह राष्ट्रपति कार्यालय को भी बताना चाहिए.

5. क्या फिल्मी स्टाइल में हुए हैदराबाद एनकाउंटर का विरोध करने वाले महिला विरोधी हैं?

सोशल मीडिया के हिसाब से अगर आप अपनी राय कायम करते हैं या टीवी की बहसों से आपको बौद्धिक राशन उपलब्ध होता है तो आप मेनका गांधी, अरविंद केजरीवाल सहित उन तमाम लोगों को गालियां दे रहे होंगे जो पुलिस के एनकाउंटर को न्याय नहीं बता रहे. न्याय के बारे में कहा जाता है कि न्याय होना भी चाहिए और होते हुए दिखना भी चाहिए. इस मामले में न्याय होता हुआ दिख रहा है समाज के बड़े तबके को लेकिन क्या यह वास्तविक न्याय है.

अगर यहीं न्याय है तो हमें अपनी न्यायपालिका पर हजारों करोड़ फूंकने की कोई जरूरत नहीं है. हर घटना पर मीडिया ट्रायल के बाद पुलिस एनकाउंटर कर दे. मामला ही खत्म. लेकिन देश संविधान से चलता है. अगर संविधान पर आपकी आस्था है तो आपको चिंतित होना चाहिए कि न्याय अब अदालतों और शासन के इकबाल से नहीं पुलिस की गोली से निकल रहा है. आजादी की लड़ाई में हमने न्याय का ठिकाना बड़ी मेहनत और कुर्बानियों के बाद बदला था. इसे दोबारा बंदूक की नलियों में जाने से रोकना महिला विरोधी होना नहीं कानून के राज का समर्थक होना है. 

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