नई दिल्ली: हल्की ठंड के साथ 27 नवंबर  की सुबह के जब आंख खुली तो एक खबर पर नजर ठहर सी गई और वो खबर थी कि हैदराबाद की रहने वाली 27 साल की महिला डॉक्टर के साथ कुछ लोगों ने पहले सामुहिक बलात्कार किया और फिर उन्हें जिंदा जलाकर मार दिया. सोशल मीडिया पर महिला डॉक्टर की मरने से पहले की और मरने के बाद वाली जली हुई फोटो चलने लगी. लोगों का खून खौला. ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा. पुलिस ने भी आनन फानन में चारों आरोपियों को गिरफ्तार किया और फिर गिरफ्तारी के बाद से मामला शांत है. घटना के चार दिन बाद महिला डॉक्टर चर्चा से गायब है. किसे पड़ी है? अगर किसी को पड़ी भी है तो कितने दिन तक? पूरी दुनिया को हिला देने वाली निर्भया को जब लोग भूल गए तो ये महिला डॉक्टर कौन सा अपवाद बनने जा रही हैं? आज ना कल हम उन्हें भी भूल जाएंगे. ना हम बदले हैं और ना हम बदलना चाहते हैं.

हम कोस रहे हैं उन चार लोगों को जिन्होंने महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार कर उसे जिंदा जला दिया. हम उनकी परवरिश को कोस रहे हैं, पुलिस को कोस रहे हैं, सरकार को कोस रहे हैं, समाज को कोस रहे हैं लेकिन जरा रुकिए और सोचिए कि क्या आप उस महिला डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार के जिम्मेदार नहीं हैं? आप कहेंगे कैसे? हम कभी रेप को सपोर्ट नहीं करते या हम तो महिलाओं की बड़ी इज्जत करते हैं. लेकिन क्या ये सच में सच है?

क्या आपने सोचा है कि फोन पर आपका बच्चा क्या देख रहा है?

गौर करिए कि आज बच्चा टीवी या इंटरनेट पर क्या देखता है? अखबार या मैगजीन उठाता है तो क्या देखता है? रेप के लिए जिस बच्चे की मानसिकता पर सवाल उठाए जाते हैं लेकिन वो मानसिकता आई कहां से? आज समाज में संयुक्त परिवार की परंपरा खत्म होती जा रही है और उसमें भी माता-पिता दोनों काम पर जाते हैं. बच्चा घर में अकेला है और उसके सामने है टीवी और इंटरनेट जहां परोसा जा रहा है सेमी पॉर्न. 

बाजारवाद की परिभाषा में महिला एक प्रोडक्ट से ज्यादा कुछ नहीं

उसे भी छोड़िए आज आप सुबह से लेकर रात तक  टीवी पर सनी लियोनी के कंडोम वाले विज्ञापन देखते हैं. दूसरे विज्ञापन में रणवीर सिंह बताते हैं कि फलाना शैंपू या जेल लगाकर कैसे लड़कियां पटती है. यही हाल क्लोज अप, लिमका, थंप्स अप जैसे ढेरो उत्पादनों का है जहां महिलाओं को सिर्फ एक भोग विलास की वस्तु या ट्रॉफी की तरह पेश किया जाता है.

कुंडी मत खड़काओ राजा सीधा अंदर आओ राजा…

गानों पर आते हैं क्योंकि गाने तो बच्चों से लेकर बड़ों तक सबको पसंद हैं. आप म्यूजिक चैनल देखते या सुनते हैं तो आना आता है. दारु बदनाम करदी… कुंडी मत खड़काओ राजा, सीधा अंदर आओ राजा.. मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए.. चिकनी चमेली पव्वा चढा के आईएबीसीडी पढ़ ली बहुत, अच्छी बातें कर ली बहुत अब करूंगा तेरे साथ गंदी बात… ये वो गाने हैं जो आपका बच्चा गुनगुनाता है. ना जाने ऐसे कितने ही गाने रोज हमारी आंखों के सामने चलते हैं जिन्हें हम अनदेखा कर देते हैं. 

क्योंकि भाभी जी घर पर हैं और जीजा जी छत पर हैं…

बात करते हैं सीरियल्स की तो यहां भी आपको यही अश्लीलता देखने को मिलेगी. सीरियल्स में आपको एक्टर-एक्ट्रेस सुहागरात मनाते हुए दिखाए जाते हैं. सीरियल के नाम देखिए भाभी जी घर पर हैं, जीजा जी छत पर हैं.

उससे भी एक कदम आगे वेब सीरीज जिसमें नंगापन खुलेआम परोसा जाता है. जिन्हें आप चटकारे लेकर देखते हैं. कभी सोचा है कि आपका बच्चा अगर ऐसी फिल्में देखेगा तो उसके मन में भी वही सारी भावनाएं पैदा होंगी जो आपके मन में होती है. फिर वो हर लड़की को हवस भरी नजर से नहीं देखेगा तो क्या करेगा? आपको लगता है रेप रोकना पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी है. न्यायपालिका की जिम्मेदारी है लेकिन क्या हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है.

हम अखबार पढ़कर अपना गुस्सा निकाल लेते हैं. सरकार को कोसकर, सिस्टम को कोसकर और लग जाते हैं अपने काम में जो हम रोज कर रहे हैं. ज्यादा करेंगे तो डीपी बदल देंगे, धरना देंगे और ज्यादा हुआ तो कैंडल मार्च करेंगे लेकिन टीवी चैनलों को कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि वो हमारे मनोरंजन के लिए हैं. जब हर विज्ञापन हर फिल्म में स्त्री को भोग की वस्तु ही समझा जाएगा तो बलात्कार के मामलों में बढ़ावा मिलना निश्चित है. आज संस्कृति और सभ्याता पर बाजारवाद हावी है और हम उसके आदी हो चुके हैं. 

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