नई दिल्ली. महाराष्ट्र में राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की अनुशंसा के बाद राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है. बीजेपी के बाद गवर्नर ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. शिवसेना तय समय तक बहुमत के लिए जरूरी 145 विधायक नहीं जुटा पाई. राज्यपाल ने बीजेपी को सरकार बनाने के लिए 48 घंटे का वक्त दिया था, शिवसेना को 24 घंटे का और एनसीपी को भी 24 घंटे का वक्त मिला था. शिवसेना ने और वक्त मांगा था जो उसे नहीं मिला जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है राज्यपाल के फैसले के खिलाफ. इस बीच राज्यपाल की भूमिका पर भी सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं. कांग्रेस-NCP ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर राष्ट्रपति शासन लगाने को बीजेपी की मनमानी बताया है. 

महाराष्ट्र की सियासी संकट तो गहरा गया है लेकिन आपको लिए चलते हैं कर्नाटक. आपको याद होगा कुछ महीने पहले ही कर्नाटक का सियासी नाटक सारा देश देख रहा था. विधायकों की खरीद फरोख्त से लेकर राज्यपाल बनाम विधानसभा अध्यक्ष की बहस शुरू हुई.राज्यपाल ने अल्पमत की बीजेपी सरकार बना दी, बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई और उन्हें बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का वक्त दिया गया.

विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कोर्ट ने चंद घंटों के अंदर येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने को कहा. बहुमत साबित न कर पाने की स्थिति में येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया. यहां सवाल उठता है कि अगर कर्नाटक में 15 दिनों का वक्त सत्ताधारी बीजेपी को दिया जा सकता था तो महाराष्ट्र में शिवसेना को महज 48 घंटे का वक्त क्यों नहीं दिया गया.

गोवा में क्या हुआ था

गोवा में 40 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस 17 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. बीजेपी ने 13 सीटें जीती थीं. बहुमत के लिए 21 सीटों की जरूरत थी और इसका इंतजाम बीजेपी ने कर लिया था. गोवा में बीजेपी ने गोवा फारवर्ड और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के तीन-तीन और दो निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई. सबसे बड़े दल होेने के बावजूद कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा. 

मेघालय और मणिपुर में क्या हुआ था

मेघालय में कुल विधानसभा सीटें 60 हैं. बहुमत के लिए चाहिए थे 31. कांग्रेस यहां भी 21 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. बीजेपी को यहां केवल 2 सीटें मिली थीं. इसके बावजूद नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) के 19 विधायक, यूडीपी के छह विधायक, एचएसपीडीपी के 2 विधायक, पीडीएफ के चार विधायक और एक निर्दलीय को जोड़कर यह संख्या 34 तक पहुंच गई. बीजेपी सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा बनीं और सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा. मणिपुर में 60 सीटों में कांग्रेस को मिली थी 28, बीजेपी को 21, बहुमत के लिए चाहिए था 31 लेकिन सरकार बनी बीजेपी की.

राज्यपाल का असीमित विवेकाधिकार, चुनाव बाद के तिकड़म और मजबूर जनता

महाराष्ट्र में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कांग्रेस-एनसीपी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर राज्य में राष्ट्रपति शासन के नाम पर मनमानी करने का आरोप लगाया है. प्रेस कॉन्फ्रेंस में एनसीपी प्रमुख शरद पवार, कांग्रेस के अहमद पटेल जैसे दिग्गज नेता मौजूद थे. एनसीपी-कांग्रेस ने कहा कि हम शिवसेना को सहमति देने का विचार कर ही रहे थे कि इसी बीच राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा कर दी. इस पूरे मामले में राज्यपाल के पास मौजूद असीमित विवेकाधिकार पर भी सवाल उठ रहे हैं.

पिछले कुछ उदाहरणों को भी देखें तो राज्यपाल की भूमिका पर लगातार सवाल उठते रहे हैं. वहीं आप उस जनता के बारे में भी विचार कीजिए जो पूरे दिल से मतदान करती है यह सोचकर की लोकतंत्र में अंतिम ताकत उसके वोट की है. लेकिन पिछले कुछ उदाहरणों को देखें चाहे वो  मणिपुर, मेघालय, गोवा हो या बिहार जहां जनता ने जिसे सबसे ज्यादा सीटें दीं वो विपक्ष में बैठा. ऐसे में लोकतंत्र की उस परिभाषा को बदलने की जरूरत है जो कहता था कि लोकतंत्र, जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए शासन है. इस पूरे सियासी उठा-पटक में महाराष्ट्र की जनता खुद को कितना ठगा हुआ महसूस कर रही होगी, सोच कर देखिए!

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