नई दिल्लीः देश की पहली महिला महिला डॉक्टर रखमाबाई की 153वीं जयंती पर गूगल ने डूडल बानकर उन्हें श्रद्वांजलि अर्पित की है. रुक्माबाई उन प्रथम महिलाओं में से थी जिन्होंने ब्रिटिश शासित भारत में दवा के क्षेत्र में अभ्यास किया साथ ही जो ‘हिंदू मैरिज’ के खिलाफ खड़ी रही. आज के दिन ही रुक्माबाई का जन्म बढ़ई समुदाय में मुंबई में हुआ था. इनके पिता का नाम जनार्दन पांडुरंग व माता का नाम जयंतीबाई था. गूगल ने रुक्माबाई को सम्मान देने के लिए डूडल में एक महिला को उनके गले में पड़े स्टेथोस्कोप के साथ दर्शाया गया है और उनके चारो ओर महिला मरीज व नर्स हैं.

रुक्माबाई का विवाह दादाजी भीकाजी के ग्यारह वर्ष की उम्र में ही उनकी इच्छा के विरुद्ध हो गया था. उस समय बाल विवाह आम बात होती थी. हालांकि उन्हें अपनी शिक्षा पूरी करने की इजाजत थी लेकिन उनके पति दादाजी दादाजी भिकाजी राउत ने धीरे-धीरे उन्हें अपने साथ रहने के लिए मजबूर किया. मार्च 1884 में दादाजी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में पत्नी पर वैवाहिक हकों को बहाल करने के लिए याचिका फाइल की, जिसका फैसला दादाजी के हक में आया कोर्ट ने कहा कि या तो वे कोर्ट का फैसला माने या उन्हें जेल जाना होगा. रुक्माबाई ने ब्रिटिश सरकार से कहा कि अपने पति के साथ वैवाहिक रिश्तों में उलझकर रहने के के बजाय वे जेल में रहना पसंद करेंगी.

68 साल की लंबी लड़ाई के बाद हिंदू मैरिज एक्ट पास हुआ जिसके मुताबिक वैवाहिक संबंधों के लिए पति और पत्नी की दोनों की मर्जी जरूरी है. हिंदू लेडी के नाम से मशहूर हुईं रुक्माबाई ने अखबारों में कई पत्र लिखे जिस पर उन्हें काफी समर्थन भी मिला. जब उन्होंने पढ़ने की इच्छा जताई तो उनके समर्थन में फंड इकट्ठा हो गया जिससे वे इंग्लैण्ड में लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन में पढ़ने का मौका मिला. पढ़ाई पूरी करने के उन्होंने भारत लौट कर राजकोट के एक महिला अस्पताल में काफी सालों तक काम किया. 25 सितंबर 1991 में उनका देहांत हो गया.

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