नई दिल्ली. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने हाई प्रोफाइल गैर-निष्पादित संपत्तियों (NPA) के फ्रॉड केसेज की एक सूची जांच के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपी थी जिसमें बताया गया कि  कैपिटल एक्विपमेंट की लागत को बढ़ाने के लिए “बेईमान प्रमोटरों” द्वारा आयात की ओवर-इनवॉइसिंग का उपयोग कैसे किया जा रहा था. लेकिन रघुराम राजन की अलर्ट सूची के बावजूद पिछली सरकार ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया और  न ही अब की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार ने इसपर कोई कदम उठाया.

मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसद की एस्टीमेट कमेटी द्वारा एनपीए क्राइसिस के बारे में पूछे जाने पर रघुराम राजन ने 17 पन्नों की रिपोर्ट में विस्तार से इसके बारे में खुलासा किया था. हालांकि समिति का मानना है कि राजन उस समय का जिक्र कर रहे हैं जब उन्होंने कहा पीएमओ को लिखा था. ऐसे में अब वे उनसे पीएमओ को रिपोर्ट भेजे जाने की तारीख पूछ रहे हैं.

पूर्व आरबीआई गवर्नर ने कहा कि 2006-2008 की अवधि में बड़ी संख्या में बैड लोन की शुरुआत हुई थी, जब आर्थिक विकास मजबूत था, और बिजली संयंत्रों जैसी पिछली बुनियादी ढांचा परियोजनाएं समय पर और बजट के भीतर पूरी की गई थीं. ऐसा समय है कि बैंक गलतियां करते हैं। वे भविष्य में पिछले विकास और प्रदर्शन को बढ़ाते हैं। इसलिए वे परियोजनाओं में उच्च लाभ उठाने और कम प्रमोटर इक्विटी स्वीकार करने के इच्छुक हैं. ये तर्कहीन उत्साह की ऐतिहासिक घटना है, जो देशभर में आम है.

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