नई दिल्ली. देश की आर्थिक स्थिति को लेकर आ रही लगातार बुरी खबरों के बीच पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अंग्रेजी अखबार द हिंदू में एक लंबा आलेख लिखा है. इस आर्टिकल में पूर्व पीएम और दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी सरकार पर निवेशकों, उद्यमियों और लोगों के बीच डर और अविश्वास का माहौल बनाने के लिए निशाना साधा है. मनमोहन सिंह ने अपने लेख में भारत की आर्थिक गति के मंद पड़ जाने की वजहें गिनाई हैं साथ ही चीन को पीछे छोड़ वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत को लीडर बनाने के लिए सलाह भी दी है. पढ़ें डॉ. मनहमोहन सिंह का पूरा लेख हिंदी में. 

भारत की आर्थिक स्थिति इस वक्त बेहद चिंताजनक स्थिति में है. ऐसा मैं विपक्षी पार्टी का होने के नाते नहीं बल्कि इस देश का नागरिक और अर्थशास्त्र का छात्र होने के नाते कह रहा हूं. अब आंकड़े सबके सामने हैं. जी़डीपी की दर पिछले 15 सालों में सबसे कम है, बेरोजगारी पिछले 45 सालों में सबसे अधिक है, घरों में खपत चार दशक में सबसे कम है, बिजली उत्पादन पिछले 15 सालों में सबसे कम इस वक्त हुआ है. यह सबसे कम और सबसे अधिक वाली लिस्ट काफी लंबी है. लेकिन यह सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है बल्कि इसे देश की अर्थव्यवस्था का वर्तमान हाल परिलक्षित होता है.

लोगों और संस्थाओं के अंदर सरकार ने भरा डर और अविश्वास

किसी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति उस देश के कार्यप्रणाली और समाज की तस्वीर भी दिखाती है. किसी अर्थव्यवस्था में लोगों और संस्थाओं का साझा संवाद ही सबसे अहम होता है.आपसी भरोसा और आत्मविश्वास के सहारे ही लोग देश की आर्थिक गति के इंजन बनते हैं. हमारे सामाजिक ढांचे में जो विश्वास और आपसी भरोसा शामिल था उसे अब छिन्न-भिन्न कर दिया गया है.

नरेंद्र मोदी सरकार ने लोगों और संस्थाओं के अंदर डर भर दिया है. उद्योगपति, सरकार और सरकारी एजेंसियों द्वारा परेशान किये जाने डर के साये में जी रहे हैं. बैकर्स नया लोन देने से डर रहे हैं. स्टार्ट अप, टैक्नोलॉजी स्टार्ट अप जो आर्थिक विकास के नये इंजन हैं वो भी लगातार नजर रखे जाने और संदेह में नया स्टार्ट अप नहीं कर पा रहे हैं.

सच बोलने से डर रहे हैं सरकार के नीति निर्माता

सरकार के अंदर जो नीति निर्माता हैं और जो संस्थाएं काम करती हैं वो भी सच बोलने या बौद्धिक तौर पर इमानदार विश्लेषण करने से बचने लगी हैं आर्थिक विकास के एजेंट के तौर पर काम करने वाले लोगों के मन में संदेह और डर बना हुआ है. जब इस कदर अविश्वास होगा यह देश के आर्थिक हालात को निश्चित तौर पर प्रभावित करेगा. जब लोगों और संस्थाओं के बीच आदान-प्रदान पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है तो आर्थिक मंदी की तरफ अर्थव्यवस्था बढ़ने लगती है. आम लोगों और संस्थाओं के मन में डर और अविश्वास का यह माहौल आर्थिक स्लोडाउन के पीछे सबसे बड़ा कारण है.

 मीडिया और न्यायपालिका की आजादी पर हुए हमले

इन सबके अलावा लोगों में एक बेबसी का आलम भी है. लोगों के दर्द को आवाज देने वाली संस्थाएं चाहे वो जांच एजेंसियां हो, मीडिया हो या न्यायपालिका, सभी की स्वतंत्रता को बाधित करने की कोशिश हुई है. इससे निवेशक नया निवेश करने से बचने लगते हैं. हमारी आर्थिक सामाजिक ढांचे को तितर-बितर करने के पीछे मोदी सरकार की नीति ऐसी लगती है मानो हर व्यक्ति अपराधी है जब तक वह निर्दोष साबित न हो जाए. इस संदेह ने उद्योगपतियों, बैंकर्स, नीति निर्माता, रेगुलेटर, स्टार्ट अप और नागरिकों सबको डरा रखा है और कोई भी विश्वास के साथ कोई आर्थिक गतिविधि नहीं शुरू कर पा रहा.

लोगों के मन में आत्मविश्वास और आपसी भरोसा बहाल करना ही होगा

नरेंद्र मोदी सरकार को समझना होगा कि इस कदर लोगों के मन में अविश्वास और डर भर देना कभी भी अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर नहीं हो सकता. आर्थिक विकास के लिए सामाजिक विश्वास कितना जरूरी है इसके बारे में अर्थशास्त्र में काफी कुछ लिखा जा चुका है. एडम स्मिथ जैसे विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री ने भी इसकी पर्याप्त चर्चा की है. आर्थिक हालात को सुधारने के लिए बहद जरूरी है कि बिजनेसमैन, निवेशक और कर्मचारियों में आत्मविश्वास हो भरोसा हो न कि संदेह हो या ये डर हो कि सरकार उन्हें संभावित आर्थिक अपराधी की तरह देख रही है.

मुद्रास्फीतिजनित मंदी (stagflation) में न चली जाए भारतीय अर्थव्यवस्था!

सबसे चिंताजनक बात तो हाल ही सामने आए मंहगाई के आंकड़ों में सामने आई है. इसमें यह बात सामने आई है कि खाद्य सामग्री में महंगाई में इजाफा हुआ है. रिटेल मंहगाई के आगामी महीनों में और बढ़ने की आशंका है. बेरोजगारी के उच्चतम दर के बीच महंगाई बढ़ने और मांग घटने से अर्थव्यवस्था के मुद्रास्फीतिजनित मंदी (stagflation) में जाने के खतरे बढ़ जाते है. बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को ऐसे आर्थिक हालत से उबरने में काफी वक्त लग सकता है. हालांकि भारत अभी इस स्थिति में नहीं पहुंचा है लेकिन अगर तुरंत खपत और मांग को ठीक करने के लिए कदम नहीं उठाए गए तो इसका खतरा हम पर भी मंडरा रहा है.

आर्थिक हालात सुधारने के लिए दोहरी नीति की जरूरत

मेरा यह विश्वास है कि भारत की खराब आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए दोहरी नीति की जरूरत है जो एक तरफ तो मांग को फिसिकल पॉलिसी के तहत बढ़ाए वहीं साथ-साथ प्राइवेट निवेश को भी बढ़ाए. जिसके लिए निवेशकों और उधमियों में विश्वास और भरोसे का माहौल बनाना जरूरी है.भारत इस वक्त 3 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यस्था है. इसमें निजी संस्थाओं का बहुत बड़ा योगदान है. यह कोई छोटी अर्थव्यवस्था नहीं है जिसे आप जैसे चाहे हैंडल कर लेंगे.

चीन के पिछड़ने का लाभ उठा सकता था भारत मगर अफसोस!

भारत की अर्थव्यवस्था मीडिया में चौंकाने वाले हेडलाइन से मैनेज नहीं हो सकती है. दुर्भाग्य से आत्मघाती कारणों से आई भारत की आर्थिक मंदी ऐसे वक्त में आई है जब ग्लोबल तौर पर भारत के एक बड़ी आर्थिक ताकत के तौर पर उभरने का मौका था. चीन की अर्थव्यवस्था धीमी हो रही है और इससे भारत के पास अपना एक्सपोर्ट बढ़ाने का बड़ा मौका था. भारत को इस बड़े मौके को खोना नहीं चाहिए. वैश्विक एक्सपोर्ट में एक बड़ा गैप है जिसे भारत पर्यावरण संरक्षण और क्लाइमेट चेंज के सिद्धांतों को नजर में रखते हुए भर सकता है.

बड़े मौके को हाथ से न जाने दे मोदी सरकार

सरकार के पास लोकसभा में पूर्ण बहुमत है, वैश्विक तौर पर कच्चे तेल की कीमत कम है, यह एक ऐसा मौका है जो दशकों में एक ही बार नसीब होता है. इस मौके को भुनाकर भारत लाखों युवाओं को नौकरी दे सकता है. मैं प्रधानमंत्री से आग्रह करता हूं कि उद्योगपतियों के खिलाफ उनके मन में गहराई से जड़ जमा चुके शक को वो दूर करें और समाज और आर्थिक ढ़ांचे में विश्वास बहाल करें. आत्मविश्वास से भरी और आपसी भरोसे पर खड़ी नीतियां और समाज ही हमारे अर्थव्यवस्था को नई उर्जा दे सकता है.

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