नई दिल्लीः आर्थिक आधार पर सवर्णों को आरक्षण देने से जुड़े मोदी सरकार के फैसले के बाद अब इसपर चर्चा शुरू हो गई है कि जब संवैधानिक प्रावधानों में आर्थिक आधार पर और 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण देने की कोई व्यवस्था नहीं है, ऐसे में मोदी सरकार क्या करेंगे. दरअसल, इससे पहले भी साल 1990 में मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने के बाद सवर्णों में बढ़ी नाराजगी कम करने के लिए सितंबर 1991 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने की व्यवस्था की थी. इसके लिए उन्होंने सरकारी आदेश जारी किया था. लेकिन सरकार के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने इंदिरा साहनी केस का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था.

संविधान संशोधन के रास्ते पर मोदी सरकार- मोदी सरकार आर्थिक आधार पर ऊंची जाति के लोगों को आरक्षण देने और आरक्षण का दायरा 59.5 फीसदी करने के फैसले पर कितना आगे बढ़ेगी, इस मामले पर सरकारी के सूत्रों का कहना है कि चूंकि पूर्ववर्ती नरसिम्हा राव ने सवर्णों के आरक्षण के लिए सरकारी आदेश ही दिया था और संवैधानिक रास्तों से नहीं गई थी, इसलिए वह सफल नहीं हो पाई, लेकिन हम संविधान के अनुसार इस मामले में आगे बढ़ेंगे. इससे यह संकेत जाता है मोदी सरकार को इसके लिए कम से कम 3 संविधान संशोधन करने होंगे. संविधान के अनुच्छेद 15, 16 और 335 में संशोधन करना होगा. संशोधन बिल को संसद के दोनों सदनों में उसे दो तिहाई बहुमत से पास कराना होगा. संविधान में संशोधन होने पर आर्थिक रूप से कमज़ोर अगड़ी जातियों को भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिल सकेगा.

3 संशोधन, समझिए पूरा गणित- मालूम हो कि संविधान का अनुच्छेद 15 समस्त नागरिकों को समानता का अधिकार देता है. अनुच्छेद 15 (1) के अनुसार राज्य किसी नागरिक के खिलाफ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा. वहीं, अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों और सेवाओं में अवसर की समानता देता है. अनुच्छेद 16(4) के अनुसार आरक्षण किसी समूह को दिया जाता है, किसी व्यक्ति-विशेष को नहीं. अनच्छेद 335 में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी तय कर रखी है और किसी की आय और संपत्ति के आधार पर आरक्षण देने का प्रावधान नहीं है. आरक्षण का पैमाना सामाजिक असमानता है.

इन राज्यों में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण हैं- सुप्रीम कोर्ट द्वारा 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय किए जाने के बाद भी कुछ राज्यों में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें राजस्थान, तमिलनाडु और महाराष्ट्र शामिल है. राजस्थान में ने 68% आरक्षण की व्यवस्था है, जिसमें अगड़ी जातियों के लिए 14% आरक्षण भी शामिल है. इसी तरह महाराष्ट्र में भी 68 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है, जिसमें मराठा समुदाय के लोगों को 16 फीसदी आरक्षण दिया गया है. तमिलनाडु में 69% आरक्षण की व्यवस्था है. इसके लिए तमिलनाडु की तत्कालीन सीएम जयललिता ने वर्ष 1994 में 69% आरक्षण का विधेयक तमिलनाडु विधानसभा से पारित कराया और केंद्र सरकार को मजबूर कर दिया कि संविधान संशोधन कर इस विधेयक को 9वीं अनुसूची में डाले. 9वीं अनुसूची में जाने के बाद यह न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हो गया. इसके लिए संविधान में 76वां संशोधन हुआ.

फिलहाल देश में 49.5 फीसदी आरक्षण- फिलहाल देश में कुल 49.5 फीसदी आरक्षण है. अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 फीसदी, अनुसूचित जाति (एससी) को 15 फीसदी और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 7.5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है. अगर मोदी सरकार के सवर्णों को आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण देने की व्यवस्था पर कानूनी मुहर लग जाती है तो देश में 60 फीसदी आरक्षण हो जाएगा.

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