नई दिल्ली. 14 अक्टूबर 2006 को कांशीराम अपने 2 करोड़ समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले थे लेकिन 5 दिन पहले यानी 9 अक्टूबर 2006 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक और यूपी की चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती के राजनीतिक गुरू कांशीराम का आज 14वां परिनिर्वाण दिवस है. भारत की राजनीति में दलित, पिछड़ों को संगठित कर उन्हें ऐसी सियासी ताकत के तौर पर कांशीराम ने तैयार किया जो आज भी प्रभावी है. लेकिन क्या वह नारा वाकई साकार हुआ जो बीएसपी के समर्थक अक्सर लगाते थे, कांशीराम का मिशन अधूरा, बहन मायावती करेगी पूरा’.

कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 में पंजाब के रामदसिया दलित समुदाय में हुआ. कांशीराम पढ़ने में बेहद कुशाग्र थे. लेकिन उन्हें बचपन में छुआछूत का सामना करना पड़ा. बीएससी की शिक्षा प्राप्त करने के बाद जब पुणे में कांशीराम सरकारी नौकरी कर रहे थे, उस दौरान भी उन्हें जातीय भेदभाव का सामना करना पड़ा. डां. भीमराव अंबेडकर की जाति का उन्मूलन किताब पढ़ने के बाद कांशीराम ने नौकरी छोड़ दलितों और पिछड़ों के लिए काम करने का निर्णय लिया.

बामसेफ: दलित, पिछड़ों का बौद्धिक संगठन
1971 में कांशीराम ने ऑल इंडिया एससी, एसटी, ओबीसी एंड माइन्योरिटी कर्मचारी संगठन बनाया. जो 1978 में बामसेफ में बदल गया. इस संगठन में दलित और पिछड़ों के पढ़े लिखे और संपन्न वर्ग का प्रतिनिधित्व बहुत तेजी से बढ़ा. बामसेफ न तो राजनीतिक संगठन था न ही धार्मिक. इसका लक्ष्य अंबेडकर के विचारों का प्रसार और दलित पिछड़ों को संगठित करना था.

जब कांशीराम ने बनाई DS-4
1981 में कांशीराम ने दलित शोषित समाज समिति बनाई जो DS-4 के नाम से जानी गई. दो दशक से दलित और पिछड़ों को संगठित कर रहे कांशीराम राजनीतिक दलित नेतृत्व से खासे नाराज थे. 1982 में उन्होंने एक किताब भी लिखी चमचा युग. इसमें उन्होंने बाबू जगजीवन राम और राम विलास पासवान जैसे नेताओं पर तंज कसा. दलित और पिछड़े देश की आबादी का बड़ा हिस्सा थे.

बहुजन समाज पार्टी का निर्माण, सत्ता में सीधी दखल
कांशीराम ने इसे एक राजनीतिक ताकत में बदलने के लिए 1984 में बहुजन समाज पार्टी बनाई.कांशीराम खुद कई बार चुनाव लड़े, दो बार जीते भी लेकिन अपने गठन के 11 सालों बाद ही उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने गठबंधन में सरकार बनाई और मायावती देश की पहली महिला दलित मुख्यमंत्री बनीं.

मायावती के राजनीतिक गुरू थे कांशीराम
मायावती को कांशीराम ने राजनीति की एबीसीडी सिखाई थी. कांशीराम ने बीएसपी के गठन के बाद से ही मायावती को राजनीतिक तौर पर तैयार किया और मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाया. 1995 के लखनऊ गेस्ट हाऊस कांड के बाद बीएसपी का मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से गठबंधन टूट गया. मायावती इसके बाद बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बनीं. मुलायम सिंह यादव और मायावती, उत्तर प्रदेश की सियासत इन्हीं दो नेताओं के बीच दो दशक तक घूमती रही.

जब उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने अपने दम पर बनाई पूर्ण बहुमत की सरकार
मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. केंद्र सरकार में बीएसपी हिस्सेदार बनीं. 2001 में कांशीराम ने सार्वजनिक सभा में मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. बीएसपी को राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित कई इलाकों में लोकप्रियता मिली. 2007 में पहली बार बीएसपी को पूर्ण बहुमत मिला और मायावती चौथी बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. इस चुनाव में मायावती को बड़ी संख्या में अगड़ी जातियों के वोट भी मिले. इसे उनका सोशल इंजीनियरिंग कहा गया.

BSP के पतन की कहानी: राष्ट्रीय राजनीति के अगुवा से अस्तित्व के संकट तक
इसके बाद बीएसपी का पतन शुरू हुआ. अगला चुनाव मायावती हार गईं और अखिलेश यादव यूपी के सीएम बनें. 2014 के लोकसभा चुनावों में बीएसपी का खाता तक नहीं खुल पाया. मायावती का पार्टी पर एकाधिकार हो गया. उन पर अपने कार्यकाल के दौरान मूर्तियां बनवाने पर करोड़ों रुपये खर्च करने के कारण आलोचना भी हुई. हाल ही में राजस्थान में बीएसपी के सभी विधायक पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए. 2019 लोकसभा चुनावों में जरूर बीएसपी को 10 सीटें मिलीं लेकिन इसमें उसके सहयोगी समाजवादी पार्टी का कैडर वोट भी शामिल था.  वहीं समाजवादी पार्टी जिससे एक वक्त मायावती ने अपना सबसे बड़ा सियासी दुशमन माना.

जब राष्ट्रपति बनने से इनकार कर दिया था कांशीराम ने
 दलितों में मायावती अभी भी बड़ी नेता हैं. लेकिन कांशीराम ने जिस लक्ष्य से दलितों और पिछ़ड़ों के हाथ सत्ता सौंपने का मिशन शुरू किया था वह अभी भी अधूरा है. राजनीतिक गलियारों में किस्सा है कि कांशीराम को अटल बिहारी वाजपेयी ने राष्ट्रपति बनने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया. कांशीराम प्रधानमंत्री बनना चाहते थे राष्ट्रपति नहीं क्योंकि उनको सत्ता का केंद्र मालूम था.

कांशीराम ने परिवारवाद को बढ़ावा नहीं दिया लेकिन मायावती भारतीय राजनीति की वंशवादी परंपरा से दूर नहीं रह पा रहीं.  राष्ट्रीय राजनीति में अगर आज बीएसपी कमजोर हुई है तो ये कहीं न कहीं कांशीराम के राजनीतिक चेतना से बीएसपी की फिसलन की भी कहानी है. देश की राजनीति को वाइब्रेंट और समावेशी बनाने के लिए कांशीराम को हमेशा याद किया जाएगा.

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