नई दिल्ली. मैं खुद भी एक मुसलमान हूं, अयोध्या में मंदिर बनेगा या मस्जिद, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुझे भी इंतजार था. मैं ही क्या देश के करोड़ों मुसलमान फैसले के इंतजार में थे. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया और मंदिर पक्ष में 2.77 एकड़ विवादित जमीन और मुस्लिम पक्ष को कहीं ओर 5 एकड़ जमीन दे दी.

दोनों धर्म के लोगों ने फैसले का स्वागत किया और 500 सालों से जबरन चला आ रहा एक विवाद निपट गया. अब विवाद निपटना भी था क्योंकि देश में मुस्लिम समाज आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है और जमाना अब वो नहीं जो गैर जरूरी मुद्दों को लेकर भी सड़कों पर उतरा जाए.

इसी वजह से मुस्लिम पक्ष और हिंदू पक्ष ने पूरी तरह सौहार्द दिखाया जैसा साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के दौरान भी दिखाया था. कुछ दिन सब शांत रहा कि अचानक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें मुस्लिम पक्ष के वकील जफरयाब गिलानी के साथ एआईएमआई चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी शामिल हुए.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान किया गया कि वे अयोध्या फैसले के खिलाफ पुर्नविचार याचिका दाखिल करेंगे. जिसके बाद ही मुस्लिम समाज में हलचल फिर शुरू हो गई. इसका मतलब मुश्किलों से जो सदियों पुरानी लड़ाई खत्म हुई उसे फिर शुरू कर दिया जाए. पर ऐसे तो कभी अंत होगा ही नहीं. कभी कोई फैसला सभी लोगों को पसंद नहीं आ सकता.

हर किसी की सोच अलग है तो जाहिर आप भी अपने अनुसार सोचेंगे. बाबरी के मुख्य पक्षकार इकबाल अंसारी भी फैसले से पूरी तरह खुश और संतुष्ट हैं. सुप्रीम कोर्ट तो संविधान पर चलता है जिसने फैसला भी संवाधानिक तरह से लिया. इससे ज्यादा अब किसी को क्या चाहिए ये समझना मुश्किल है.

मुसलमान की शिक्षा और बेरोजगारी पर थोड़ा ध्यान दीजिए नेता जी

कई सरकारी रिपोर्ट्स बताती हैं कि देश में मुसलमान शिक्षा और बेरोजगारी में दूसरे धर्मों से आगे हैं. अब ऐसा क्यों है, इसका जवाब तो हैदराबाद के सांसद ओवैसी साहब ही पूछना भी चाहिए. भई, जब उन्हें इतनी फिक्र है देश के मुसलमानों की तो ये फिक्र भी होना लाजिमी है. लेकिन नेता जी, इन मुद्दों पर थोड़ा सा कम ही ध्यान लगाते हैं.

कभी ओवैसी साहब या जफरयाब जिलानी साहब ही मुसलमानों की शिक्षा की बात ज्यादा नहीं करते. क्यों नहीं करते ये तो अल्लाह जाने लेकिन मैं चाहता हूं कि आप मुसलमानों की शिक्षा और रोजगार के मुद्दे उठाएं. क्यों पिछड़ रहे हैं, उसपर सवाल करें लेकिन आप अभी तक 500 साल पुराने विवाद पर अड़े हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट तक भी अपना फैसला सुना चुका है.

मुसलमान मंदिर-मस्जिद में फंसा रहेगा, वोट बैंक बनता रहेगा

जैसी राजनीति के हालात नजर आते हैं, अब तो लगने लगा है कि कई राजनीतिक पार्टियों के लिए देश का मुसलमान सिर्फ एक वोट बैंक बनता जा रहा है. इसलिए कभी उसे डराया जाता है तो कभी भड़काया जाता लेकिन विकास की ओर नहीं बढ़ाया जाता. क्योंकि वे सभी राजनीतिक दल जानते हैं कि अगर अधिक मुसलमान शिक्षा लेने लगेंगे तो उनका बना बनाया वोट बैंक कही चौपट न हो जाएगा.

अयोध्या फैसले से खुश हैं सभी मुसलमान जो नहीं उन्हें है फैसले का सम्मान

जब फैसला आया तो मैं न्यूजरूम में था, उस समय मेरी पिता जी से फोन पर बात हुई. उन्होंने पूछा कि क्या फैसला रहा तो मैंने मोटे-मोटे शब्दों में जो ब्रेकिंग चल रही थी बता दी. कुछ सेकेंड मुझे सुनने के बाद उन्होंने मुझसे कहा चल ठीक है आखिरकार मुद्दा खत्म तो हुआ. खास बात है कि यही बात सिर्फ मेरे पिता जी ने ही नहीं और भी काफी मुस्लिम लोगों ने कही.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आखिरकार मुस्लिम पक्ष इस बात से संतुष्ट था कि मामले का निपटारा हो गया. क्योंकि 1992 बाबरी विध्वंस के बाद ही इस मुद्दे पर देश के दो धर्मों में एक लकीर सी खिंच गई जिसपर राजनीति भी होने लगी.

इस सबमें कई बड़े मुद्दे और मुस्लिम पक्ष के असली विकास की बात नहीं की गई. लेकिन अब शायद ये मुद्दा खत्म हो तो सियासत में बैठे लोगों को मुसलमानों की गरीबी, बेरोजगारी और शिक्षा भी नजर आए. देखना अब ये भी दिलचस्प ही होगा कि मुस्लिम लॉ बोर्ड की पुर्नविचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट क्या विचार करता है.

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