नई दिल्ली: अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद केस में सुप्रीम कोर्ट ने एतिहासिक फैसला देते हुए विवादित जमीन का मालिकाना हक रामलला विराजमान को दे दिया है और सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिया है ताकि वो वहां पर मस्जिद बना सके. पांच जजों की बेंच ने ये फैसला सर्वसम्मति से लिया है. अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद करीब 169 साल पुराना है और 1992 में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद से ये मामला कोर्ट में लंबित था.  आखिर अयोध्या राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद क्या है और सालों से ये झगड़ा लगातार क्यों बढ़ता चला गया इसको हम सिलसिलेवार तरीके से समझाने की कोशिश करते हैं.

बाबरी मस्जिद को लेकर पहली बार विवाद 1850 में हुआ. इस दौरान मस्जिद के पास हनुमान गढ़ी में सांप्रदायिक हिंसा हुई जो धीरे-धीरे मस्जिद तक आ गई. 1885 में महंत रघुवर दास ने विवादित जगह पर राम मंदिर बनाने की मांग रखी थी लेकिन दंगे की आशंका के बीच कोर्ट ने उनकी मांग को खारिज कर दिया. तभी से कई हिंदू संगठन विवादित जगह पर राम मंदिर बनाने की मांग कर रहे हैं. उनका मानना है कि भगवान राम का जन्म इसी जगह पर हुआ था जिसे रामदुर्ग या रामकोर के नाम से जाना जाता है.

1946 में अखिल भारतीय रामायण महासभा ने राम मंदिर बनाने को लेकर दवाब बनाना शुरू किया जिसे 1949 में गोरखनाथ मठ के संत दिग्विजय नाथ ने समर्थन दिया. इसके बाद मस्जिद में भगवान राम और माता सीता की मूर्तियों को स्थापित किया गया और लोगों ने वहां पूजा करनी शुरू कर दी. जिस दिन मूर्ति बिठाकर पूजा शुरू की गई वो दिन था 22 दिसंबर 1949.

उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू विवादित जगह से मूर्तियों को हटवाना चाहते थे लेकिन स्थानीय प्रशासन इसके पक्ष में नहीं था और उन्होंने मस्जिद में मूर्तियों को रहने दिया और पुजारियों को ये अधिकार दिया कि वो रोज पूजा पाठ कर सकें. इसके बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड और एबीआरएम ने कोर्ट में विवादित जगह के मालिकाना हक की मांग की. इसके बाद कोर्ट ने इस जमीन को विवादित मानते हुए इसके दरवाजे बंद कर दिए.

1951 में हिंदू महासभा के जी एस विषारद और परमहंस रामचंद्र दास ने मंदिर में पूजा करने की मांग रखी साथ ही प्रशासन से ये भी अनुरोध किया कि वो मूर्ति को वहां से ना हटाएं. दोनों अपील को ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. जो 1955 में इलाहाबाद हाई कोर्ट तक गया. 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित जगह पर मालिकाना हक के लिए कोर्ट में अर्जी डाली. 1961 में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने चौथी याचिका डाली जिसमें मांग की गई कि विवादित जगह से भगवान की मूर्तियां हटाई जाए.

1980 में विश्व हिंदू परिषद ने जमीन को वापस लेने के लिए मुहीम शुरू की जिसे नवनिर्मित भारतीय जनता पार्टी का समर्थन मिला. 1986 में फैजाबाद जिला कोर्ट के आदेश के बाद विवादित जगह के दरवाजे खोल दिए गए. 1990 में बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर के लिए समर्थन जुटाने के लिए देशभर में रथ यात्रा की जिसके बाद देशभर में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए.

6 दिसंबर 1992 को वीएचपी और बीजेपी ने संयुक्त तौर पर एक मुहीम शुरू की जिसमें 150000 कार सेवकों ने हिस्सा लिया. बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती ने स्पीच दी और भीड़ ने मस्जिद की गुबंद पर चढ़कर मस्जिद तोड़ दी. इस दौरान हुई हिंसा में 200 लोगों की मौत हुई. इस घटना के दस दिन बाद पी वी नरसिम्हा रॉव सरकार ने जस्टिस लिब्रहन की अध्यक्षता में जांच कमेटी बिठाई. करीब 17 साल के बाद 30 जून 2009 को लिब्रहम कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसकी रिपोर्ट पब्लिक में नहीं डाली गई. लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और बाकी नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए गए. 2001 में 13 आरोपियों पर लगे आपराधिक मामले हटा लिए जिनमें लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी का नाम भी शामिल था.

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