नई दिल्ली: देश भर की तमाम मीडिया जिसे आज मंदी पर बात करनी चाहिए वो मंदिर पर बात कर रही है. हर जगह बस यही चर्चा है कि राम मंदिर कब बनेगा. राम मंदिर आस्था का विषय है इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है लेकिन मंदिर-मस्जिद की इस लड़ाई से इतर एक और लड़ाई है जो देश के लाखों करोड़ों लोगों के पेट में लगी हुई है और वो है दो जून रोटी लड़ाई. ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत को 117 देशों में से 102वें स्थान पर रखा गया है. एक बात और जो आपको आसानी से हजम नहीं होगी वो ये कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की हालत पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी बद्तर है. GHI रिपोर्ट में पाकिस्तान 94वें स्थान पर है जबकि बांग्लादेश 88वें और नेपाल क 73वें स्थान पर रखा गया है.

इसके अलावा भारत की अर्थव्यवस्था पिछली तिमाही में पांच फीसदी तक लुढक गई है. इंफ्रास्ट्क्चर, रिटेल, मैनुफैक्चरिंग, ऑटो समेत सारे सेक्टर महामंदी की मार से जूझ रहे हैं. लोगों की नौकरियां जा रही हैं. ऐसे में जब बात आर्थिक मंदी, महंगाई, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर होनी चाहिए वहां हर जगह चर्चा है तो सिर्फ मंदिर और मस्जिद की. आखिर क्यों? जिस देश में भुखमरी और कुपोषण इतनी बड़ी मात्रा में है, बच्चे खाना मांगते हुए भूख से दम तोड़ रहे हैं वहां भगवान राम का भव्य मंदिर बन भी गया तो क्या भगवान खुश हो जाएंगे?

आखिर वो मंदिर या मस्जिद किसके लिए है? हिंदू पुराणों में भी मानव सेवा को सबसे बड़ी सेवा कहा गया है, ऐसे में क्यों आज चर्चा सिर्फ मंदिर तक सिमटकर रह गई है? कोई क्यों नहीं पूछ रहा कि लोग बेरोजगार क्यों होते जा रहे हैं? बैंक कर्ज में क्यों डूब रहे हैं? अपने ही जमा पैसा निकलाने जा रहे लोगों को पैसा क्यों नहीं मिल रहा? इतनी ब्रांडिंग करने के बाद भी भारत में निवेश क्यों नहीं आ रहा? किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया गया था तो किसान कर्ज के चलते आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? ऐसे बहुत सारे क्यों हैं जिनका जवाब खोजे जाने की जरूरत है, लेकिन ये सब सवाल तब पूछें जाएंगे जब मंदिर-मस्जिद के नाम पर बोई गई चरस का नशा टूटे.

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