नई दिल्ली. अयोध्या रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में 16 वें दिन की सुनवाई के दौरान राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति की ओर से वरिष्ठ वकील पीएन मिश्रा, हिन्दू महासभा की तरफ से हरि शंकर जैन और शिया वक्फ बोर्ड ने अपना पक्ष रखा. अयोध्या मामले में श्रीरामजन्मभूमि पुनरोत्थान समिति की ओर से पीएन मिश्रा ने हदीस के हवाले से इस्लामी कानून के जरिए जमीन खरीद और इस्तेमाल के नियम बताए. उन्होंने हजरत मोहम्मद साहब, उनके अनुयायियों हजरत उमर, सईद बुखारी और यहूदियों के बीच हुए वाकयों का जिक्र किया.

जिसके मुताबिक मस्जिद के लिए कई कायदे नियम और बुनियादी चीजें जरूरी होती हैं. मस्जिद की जमीन और इमारत की शर्तें, वक्फ करने वाला जमीन का वाजिब मालिक होना चाहिए, अजान की जगह, वजूखाना जरूरी है. कम से कम रोजाना दो बार अजान और नमाज हो. वजू के लिए पानी का स्रोत हो. मस्जिद में घण्टी, प्राणी या मूर्तियों का चित्र ना हों. जिस भूखंड पर मस्जिद हो वहां किसी दूसरे धर्म का उपासना स्थल ना हो. मस्जिद में कोई रिहायश, खाना बनाने की जगह यानी चूल्हा वगैरह ना हो. कब्रें ना हों. जिसके पीछे नमाज अदा करनी पड़े. मस्जिद का रखरखाव का जिम्मा किसी और धर्म के लोग नहीं कर सकते.

वकील पीएन मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि विवादित स्थल पर सीता रसोई का होना भी प्रमाण है. रामलला देवता हैं वहां हैं. भक्त आते रहे हैं. इस्लाम के मुताबिक ना तो वो मस्जिद है और ना ही वहां नमाज नहीं हो सकती. बाबर के वंशज किसी इमारत के मालिक हो सकते हैं लेकिन वो इमारत मस्जिद नहीं हो सकती. हिन्दू सदियों से वहां पूजा करते रहे लेकिन वह जमीन मुसलमानों के एक्सक्लूसिव कब्जे में कभी नहीं रही. वो इमारत हमारे कब्जे में थी. मुसलमान शासक होने की वजह से जबरन वहां नमाज अदा करते थे.

राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति ने कोर्ट में कहा कि 1856 से पहले वहां कोई नमाज नहीं होती थी. 1934 तक वहां सिर्फ जुमे की नमाज होती रही. जस्टिस चन्द्रचूड़ ने पूछा कि क्या कोई शासक सरकारी या अपनी निजी मिल्कियत वाली जमीन पर मस्जिद बना सकता है? इस पर मिश्रा ने कहा- मुगल काल मे भी ऐसे वाकयात हुए थे. लेकिन बादशाह को काजी ने जवाब दिया था कि अपनी कमाई से खरीदी जमीन पर मस्जिद बनाने के बाद उसके मेंटेनेंस का भी इंतजाम करना बनाने वाले कि जिम्मेदारी है.

बाबरी मस्जिद का रूख काबा की ओर नहीं-
पीएन मिश्रा ने बताया कि मसजिद अल हरम, अल अक्सा और मस्जिद नबवी का रुख काबा की ओर नहीं है. इसके अलावा दुनिया भर की सभी मस्जिदों की दीवार काबा की ओर है यानी नमाजी का सजदा का रुख काबा की ओर रहता है.

भगवान राम अयोध्या में ही प्रकट हुए, जन्म तो बाद में हुआ-
वकील मिश्रा ने शीर्ष अदालत में बताया कि जहां तक जन्म की बात है तो भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम तो उसी स्थान पर पहले प्रकट हुए थे. जन्म की तो लीला बाद में की थी. प्रकट होने का मतलब ये है कि भगवान राम सूक्ष्म रूप से तो वहां सनातन समय से रहे हैं. बस रामनवमी की दोपहर वो प्रकट हुए.

कोर्ट के कहने पर मिश्रा ने भूमि राजस्व के रिकॉर्ड पेश किए. जिला भूमि राजस्व में भी आबादी जन्मस्थान का जिक्र है. बाद में उनमें जुमा मस्जिद का नाम जोड़ा गया. सेकेंड सेटलमेंट 1861 में भी फसली साल का रिकॉर्ड में भी सारे भूखंडों के रिकॉर्ड में बदलाव किए गए हैं.

रिकॉर्ड में मूल लिखाई को रगड़कर मिटाया गया है और उस पर लिखा गया है. स्याही और लिखावट भी बदली हुई है. मूल स्याही गाढ़ी और गहरे रंग की है लेकिन बदलाव की लिखाई हल्के रंग और बड़े अक्षर में है. सरकारी भूमि रिकॉर्ड दस्तावेज में अजहर हुसैन के नाम जोड़कर जमीन माफी का जिक्र है. 1867 के भूमि राजस्व रिकॉर्ड में भी ऐसे कई बदलाव दिखते हैं.

1867 में लिखी एक किताब के पन्ने पढ़ते हुए मिश्रा बोले कि सिंधिया के राज में जमींदारों की जमीन लगान ना चुकाने पर जबरन कब्जा की गई. बंगाली अधिकारियों को अवध में बुलाकर अंग्रेजों ने भूमि राजस्व रिकॉर्ड में मनमाने बदलाव किए गए. अंग्रेजी राज के दौरान भी पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक विवादित स्थल की चाबियां पुलिस सुरक्षा में रहती थीं. सिर्फ जुमा के रोज ही इसे सामूहिक नमाज के लिए खोला जाता था.

मिश्रा ने बताया, बेंच का कहना है कि पांच सौ साल पुरानी घटना को कैसे तय किया जा सकता है? लेकिन रिकॉर्ड बताते हैं कि 1855 से पहले तो उनका क्लेम भी नहीं था. ना नमाज होती थी. 1855 के बाद कई बार पुलिस पहरे में होने वाली जुमे की नमाज के दौरान तनाव रहता था. जन्मस्थान के चारों ओर हिन्दू आबादी ही थी. और इस वजह से छिटपुट घटनाओं की वजह से तनाव रहता था. फिर 1934 में दंगे होने के बाद वहां कोई नमाज नहीं हुई. 1949 में वहां फिर से रामलला की पूजा शुरू हो गई. लेकिन तब से 1961 तक किसी ने पूजा पाठ का कोई विरोध नहीं किया.

पीएन मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि अंतिम बार 16 दिसंबर 1949 को वहां नमाज अदा की गई. इसके बाद ही दंगे हुए और प्रशासन ने नमाज बंद करा दी. 1934 से 1949 के दौरान मस्जिद वाली इमारत की चाभी मुसलमानों के पास रहती थी लेकिन पुलिस अपने पहरे में जुमा की नमाज के लिए खुलवाती थी. सफाई होती और नमाज होती. लेकिन इस पर बैरागी साधु शोर मचाते और नमाज में खलल पड़ता. तनाव बढ़ता था. 22-23 दिसंबर की रात जुमा के लिए नमाज की तैयारी तो हुई लेकिन नमाज नहीं हो पाई.

हिंदू महासभा की ओर से हरि शंकर जैन ने कहा कि ये जगह शुरू से हिंदुओं के अधिकार में रही. आजादी के बाद भी हमारे अधिकार भी सीमित क्यों रहें? क्योंकि ये तो 1528 से 1885 तक कहीं भी और कभी भी मुसलमानों का यहां कोई दावा नहीं था. मार्टिन ने बुकानन के रिसर्च को आगे बढ़ाते हुए उसी हवाले से 1838 में इस जगह का जिक्र किया है. उस किताब में भी हिन्दू पूजा परिक्रमा की जाती थी. तब किसी मस्जिद का जिक्र नहीं था.

जैन ने बताया कि ट्रैफन थैलर ने भी किसी मस्जिद का जिक्र नहीं किया है. हैरत है कि तब के मुस्लिम इतिहासकारों ने भी मस्जिद का जिक्र नहीं किया. 1855 से 1950 तक पूजा पाठ होता रहा लेकिन अंग्रेजों ने पूजा के अधिकार को सीमित कर दिया था. आजादी मिलने और संविधान लागू होने के बाद भी जब अनुच्छेद 25 लागू हुआ फिर भी हमे पूजा उपासना का पूरा अधिकार नहीं मिला.

अनुच्छेद 13 का हवाला देते हुए जैन ने कहा कि आजादी से पहले चूंकि हमारा कब्जा था तो वो बरकरार रहना चाहिए. आक्रांताओं ने हमारे धर्मस्थल नष्ट किए लूटपाट की. इस्लाम के मुताबिक ये लूट उनके लिए माल के गनीमत था. जैन ने कुरान के सूरः 8 का हवाला देते हुए कहा कि धर्म की आड़ में युद्ध से मिला माल सेनापति को मिलता था और वो सबको बांटते थे. मंदिर एक बार बन गया तो वो सर्वदा के लिए मन्दिर ही रहता है. राम और कृष्ण हमारे देश की सांस्कृतिक धरोहर हैं.

उन्होंने कहा कि ये स्थापित दलील है कि बाबर ने मन्दिर तोड़कर मस्जिद का रूप दिया. संविधान के मूल प्रति में तीसरे चैप्टर में भी राम की तस्वीर है. राम संवैधानिक पुरुष भी हैं. जैन ने कहा कि राम अयोध्या में महल में पैदा हुए थे. विश्वास नहीं ये ही सही है. क्योंकि सभी ग्रन्थ यही कहते हैं. इसके बाद हिन्दू महासभा के दूसरे वकील वरिंदर कुमार शर्मा ने कहा कि जो मांग याचिका में नहीं थी वो फैसला कैसे किया?

शिया बोर्ड के वकील एमसी धींगरा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील देते हुए बताया कि 1936 में शिया सुन्नी वक्फ बोर्ड बनाने की बात तय हुई और दोनों की वक्फ सम्पत्तियों की सूची बनाई जाने लगी. 1944 में बोर्ड के लिए अधिसूचना जारी हुई. वो मस्जिद शिया वक्फ की संपत्ति थी लेकिन हमारा मुतवल्ली तो शिया था लेकिन गलती से इमाम सुन्नी रख दिया. हम इसी वजह से मुकदमा हारे.

उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड में दर्ज है कि 1949 में मुतवल्ली जकी शिया था. कोर्ट ने कहा कि आप हिन्दू पक्ष का विरोध नहीं कर रहे हैं ना! बस इतना ही काफी है. चीफ जस्टिस ने कहा कि हाई कोर्ट में आपकी अपील 1946 में खारिज हुई और आप 2017 में एसएलपी लेकर सुप्रीम कोर्ट आए. इतनी देरी क्यों?

इस पर धींगरा ने कहा कि मारकाट मची थी. हमारे दस्तावेज और रिकॉर्ड भी सुन्नियों के पास थे लिहाजा हमारे दस्तावेज सुन्नी पक्षकारों ने जब्त किए हुए थे. शुक्रवार को अयोध्या मामले की सुनवाई खत्म हुई अब सोमवार को फिर से इस मामले की सुनवाई जारी की जाएगी. सोमवार से सुन्नी वक्फ बोर्ड अपनी दलील शुरू करेगा.

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