नई दिल्ली. रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई कर रही पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने गुरुवार को इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ बहस करने वाले एक हिंदू पक्ष से तीन बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा था. मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने वरिष्ठ वकील पीएन मिश्रा, राम मंदिर पुनरोद्धार समिति के अधिवक्ता से सवाल पूछा – क्या मस्जिद का अस्तित्व नकारा जा सकता है, क्या मौजूदा ढांचा मस्जिद था और वह एक राजा हो सकता है राज्य की संपत्ति से वक्फ की नियुक्ति करें या उसे पहले इसे खरीदना होगा. पीठ में न्यायमूर्ति एसए बोबडे, डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नज़ीर भी शामिल हैं. अपनी ओर से, मिश्रा ने दावा किया कि कुरान विवादित भूमि पर मस्जिद के निर्माण की अनुमति नहीं देता है और न ही उस भूमि के टुकड़े पर जहां दूसरी संरचना मौजूद है. इसके अलावा, उन्होंने तर्क दिया कि यह साबित नहीं हुआ है कि विवादित ढांचा, बाबर या औरंगजेब का निर्माण किसने किया था. उनके मामले में, मुसलमानों ने दो शिलालेखों पर बहुत भरोसा किया है, एक जो प्रवेश द्वार पर और दूसरा मस्जिद में पल्पिट पर रखा गया था. लेकिन यह भी माना जाता है कि 1934 में दंगों के दौरान ये शिलालेख या तो बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे या नष्ट हो गए थे.

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अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद: संविधान लागू होने के बाद भी नहीं मिला पूजा-उपासना का पूरा अधिकार

वरिष्ठ वकील हरिशंकर जैन ने कहा कि आजादी मिलने और संविधान लागू होने के बाद भी जब अनुच्छेद 25 लागू हुआ फिर भी हमें पूजा उपासना का पूरा अधिकार नहीं मिला. अनुच्छेद 13 का हवाला देते हुए जैन ने कहा कि आजादी से पहले चूंकि हमारा कब्जा था तो वो बरकरार रहना चाहिए. अक्रांताओं ने हमारे धर्मस्थल नष्ट किए लूटपाट की. इस्लाम के मुताबिक ये लूट उनके लिए माल के गनीमत था. जैन कुरान के सूर: 8 का हवाला देते हुए कहा कि धर्म की आड़ में युद्ध से मिला माल सेनापति को मिलता था और सबको बांटते थे.

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद: तब के मुस्लिम इतिहासकारों ने भी नहीं किया मस्जिद का जिक्र

वरिष्ठ वकील हरिशंकर जैन ने कहा कि मार्टिन ने बुकानन के रिसर्च को आगे बढ़ाते हुए उसी हवाले से 1838 में इस जगह का जिक्र किया है. उस किताब में हिन्दू पूजा परिक्रमा की जाती थी. तब किसी मस्जिद का जिक्र नहीं था. ट्रैफन थैलर ने किसी भी मस्जिद का जिक्र नहीं किया है. तब के मुस्लिम इतिहासकारों ने भी मस्जिद का जिक्र नहीं किया. हिन्दू 1855 से 1950 तक पूजा पाठ करते रहे लेकिन अंग्रेजों ने पूजा के अधिकार को सीमित कर दिया था.

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद: शुरू से हिन्दुओं के अधिकार में रही जगह

निर्मोही अखाड़ा की तरफ से पीठ के सामने दलील पेश कर रहे वरिष्ठ वकील हरिशंकर जैन ने कहा कि ये जगह शुरू से हिन्दुओं के अधिकार में रही. आजादी के बाद भी हमारे अधिकार सीमित क्यों रहें? 1528 से 1585 तक कहीं भी और कभी भी मुसलमानों का यहां कोई दावा नहीं था.

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद: 16 दिसंबर 1949 को वहां अंतिम बार अदा की गई नमाज

वकील पी एन मिश्रा ने कहा कि अंतिम बार 16 दिसंबर को वहां नमाज अदा की गई. इसके बाद ही दंगे हुए प्रशासन ने नमाज बंद करा दी. 1934 से 1949 के दौरान मस्जिद वाली इमारत की चाबी मुसलमानों के पास रहती थी लेकिन पुलिस अपने पहरे में जुमा की नमाज के लिए खुलवाती थी. पहले सफाई होती फिर नमाज होती. लेकिन इस पर बैरागी साधु शोर मचाते और नमाज में खलल पड़ता. तनाव बढ़ता था. 22-23 दिसंबर की रात को जुमा की नमाज के लिए तैयारी तो हुई लेकिन नमाज नहीं हो पाई.

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद: 1934 में दंगे के बाद वहां नहीं हुई कोई नमाज

रामलला पुनरुद्वार समिति की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील पी एन मिश्रा ने कहा कि 1934 में दंगे होने के बाद वहां कोई नमाज नहीं हुई.1949 में वहां फिर से रामलला की पूजा शुरू हो गई. लेकिन तब से 1961 तक किसी ने पूजा पाठ का कोई विरोध नहीं किया.

1867 के भूमि राजस्व रिकॉर्ड में हुए कई बदलाव

1867 में लिखी एक किताब के पन्ने को पढ़ते हुए रामलला पुनरुद्वार समिति के वकील पी एन मिश्रा ने कहा सिंधिया के राज में जमींदारों की जमीन लगान ना चुकाने पर जबरन कब्जा की गई. बंगाली अधिकारियों को अवध में बुलाकर अंग्रेजों ने भूमि राजस्व रिकॉर्ड में मनमाने बदलाव किए.अंग्रेजी राज के दौरान भी पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक विवादित स्थल की चाबियां पुलिस सुरक्षा में रहती थीं. सिर्फ जुमा के रोज ही इसे सामूहिक नमाज के लिए खोला जाता था. वरिष्ठ वकील पी एन मिश्रा ने कहा कि बेंच का कहना है कि पांच सौ साल पुरानी घटना को कैसे तय किया जा सकता है? लेकिन रिकॉर्ड बताते हैं कि 1855 से पहले तो उनका क्लेम भी नहीं था न नमाज होती थी. 1855 के बाद कई बार पुलिस पहरे में होने वाली जुमे की नमाज के दौरान तनाव रहता था.जन्मस्थान के चारों ओर हिन्दू आबादी ही थी. इस वजह से छिटपुट घटनाओं की वजह से तनाव रहता था.

भूमि राजस्व के रिकॉर्ड कोर्ट में पेश

कोर्ट के कहने पर वकील पीएन मिश्रा ने भूमि राजस्व के रिकॉर्ड पेश किए. जिला भूमि राजस्व में भी आबादी जन्मस्थान का जिक्र है. बाद में उनमें जुमा मस्जिद का नाम जोड़ा गया. सेकेंड सेटलमेंट 1861 में भी फसली साल का रिकॉर्ड में भी सारे भूखंडों के रिकॉर्ड में बदलाव किए गए हैं. रिकॉर्ड में मूल लिखाई को रगड़कर मिटाया गया है और उस पर लिखा गया है. स्याही और लिखावट भी बदली हुई है. मूल स्याही गाढ़ी और गहरे रंग की है लेकिन बदलाव की लिखाई हल्के रंग और बड़े अक्षर में है. सरकारी भूमि रिकॉर्ड दस्तावेज में अज़हर हुसैन के नाम जोड़कर जमीन माफी का जिक्र है.

भगवान राम हुए थे वहां प्रकट

वकील पीएन मिश्रा ने कहा कि जहां तक जन्म की बात है तो भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम तो उसी स्थान पर पहले प्रकट हुए थे. जन्म की तो लीला बाद में की थी. भए प्रकट कृपाला. प्रकट होने का मतलब ये है कि भगवान राम सूक्ष्म रूप से तो वहां सनातन समय से रहे हैं. बस रामनवमी की दोपहर वो प्रकट हुए.

जमीन के स्वामित्व पर सवाल

जज चन्द्रचूड़ ने पूछा- क्या कोई शासक सरकारी या अपनी निजी मिल्कियत वाली जमीन पर मस्जिद बना सकता है? मिश्रा ने कहा, मुगल काल मे भी ऐसे वाकयात हुए थे. लेकिन बादशाह को काज़ी ने जवाब दिया था कि अपनी कमाई से खरीदी ज़मीन पर मस्जिद बनाने के बाद उसके मेंटेनेंस का भी इंतजाम करना बनाने वाले कि ज़िम्मेदारी है. मसजिद अल हरम, अल अक्सा और मस्जिद नबवी का रुख काबा की ओर नहीं है. इसके अलावा दुनिया भर की सभी मस्जिदों की दीवार काबा की ओर है यानी नमाज़ी का सजदा का रुख काबा की ओर रहता है.

जबरन नमाज पढ़ते थे मुस्लमान: पीएन मिश्रा

हिन्दू सदियों से वहां पूजा करते रहे लेकिन मुसलमानों के एक्सक्लूसिव कब्जे में कभी नहीं रहा. वो इमारत हमारे कब्जे में थी. मुसलमान शासक होने की वजह से जबरन वहां नमाज़ अदा करते थे. 1856 से पहले वहां कोई नमाज नहीं होती थी. 1934 तक वहां सिर्फ जुमे की नमाज होती रही.

जमीन के खरीद और इस्तेमाल के नियम

विवादित स्थल पर सीता रसोई का होना भी प्रमाण है. कब्रें ना हों. जिसके पीछे नमाज अदा करनी पड़े. मस्जिद का रखरखाव का ज़िम्मा किसी और धर्म के लोग नहीं कर सकते. रामलला देवता हैं वहां हैं. भक्त आते रहे हैं. इस्लाम के मुताबिक ना तो वो मस्जिद है और वहां नमाज़ नहीं हो सकती. बाबर के वंशज किसी इमारत के मालिक हो सकते हैं लेकिन वो इमारत मस्जिद नहीं हो सकती.

मस्जिद की जमीन और इमारत की शर्तें

मस्जिद की जमीन और इमारत की शर्तें, वक्फ करने वाला जमीन का वाजिब मालिक होना चाहिए, अजान की जगह, वजूखाना जरूरी है. कम से कम रोजाना दो बार अजान और नमाज हो. वजू के लिए पानी का स्रोत हो. मस्जिद में घण्टी, प्राणी, या मूर्तियों का चित्र ना हों. जिस भूखंड पर मस्जिद हो वहां किसी दूसरे धर्म का उपासना स्थल ना हो. मस्जिद में कोई रिहायश, खाना बनाने की जगह यानी चूल्हा वगैरह ना हो.

मस्जिद की जमीन खरीद और इस्तेमाल पर बहस

श्रीरामजन्मभूमि पुनरोत्थान समिति की ओर से पीएन मिश्रा ने हदीस के हवाले से इस्लामी कानून के जरिए जमीन के खरीद और इस्तेमाल के नियम बताए. मिश्रा ने कहा, हजरत मोहम्मद साहब, उनके अनुयायियो हजरत उमर, सईद बुखारी और यहूदियों के बीच हुए वाकयों का बयान किया. मस्जिद के लिए कई कायदे नियम और बुनियादी चीजे होती हैं.

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