नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद केस की 40वें और आखिरी दिन की सुनवाई के बीच सर्वोच्च न्यायालय में जस्टिस एफएमआई कलीफुल्ला, श्रीश्री रविशंकर और श्रीराम पंचू की तीन सदस्यीय मध्यस्थता कमिटी ने भी अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. सूत्रों के मुताबिक मध्यस्थता कमिटी ने सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की इजाजत देने की सिफारिश की है.

सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ में केस के आखिरी दिन की सुनवाई चल रही है और अब तक इस रिपोर्ट पर कोई चर्चा नहीं हुई है. कानूनन जब तक कोर्ट का फैसला ना आ जाए तब तक मध्यस्थता की गुंजाइश बनी रहती है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं इसलिए ये तय माना जा रहा है कि अयोध्या केस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला उससे पहले आ जाएगा.

मध्यस्थता कमेटी की रिपोर्ट से सुनवाई के आखिरी दिन अयोध्या मामले में नया मोड़ आ गया है. सूत्रों के मुताबिक मध्यस्था कमिटी के द्वारा सुप्रीम कोर्ट को ये बताया गया है कि यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड कुछ शर्तों पर अयोध्या राम जन्मभूमि पर दावा छोड़ने को राजी है. कुछ शर्तों के साथ यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मध्यस्थता कमिटी को पत्र लिखा है.

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सूत्रों के मुताबिक समझौते के ख्वाहिशमंद मुस्लिम पक्षकारों का कहना है कि राम जन्मभूमि हिंदुओ को सौंप देने से भाईचारा बना रहेगा. लेकिन उनकी शर्त है कि देश भर में जिन 2000 से ज़्यादा ऐतिहासिक मस्जिदों को ASI ने अधिग्रहित किया है उनमें मुसलमानों को नमाज़ अता करने की बिना शर्त इजाज़त मिले. इसके अलावा हिन्दू पक्षकार अन्य मस्जिदों जैसे मथुरा, काशी, भोजशाला जैसी 200 से ज़्यादा मस्जिदों पर दावा छोड़ दें.

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मध्यस्थता कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जो पक्ष मध्यस्थता में शामिल हुए हैं उनका मानना है कि विवादित जमीन पर राम मंदिर बनाने की इजाजत दी जाए वहीं मुस्लिमों को सरकारी खर्च पर मस्जिद बनाने के लिए दूसरी जगह दी जाए. सूत्रों ने बताया कि समझौते में मुस्लिम पक्ष ने धार्मिक पक्ष अधिनियम, 1991 को लागू करने की मांग की है जो 1947 में मौजूद अन्य धार्मिक स्थलों की यथास्थिति को अनिवार्य करता है.

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