नई दिल्ली. ये अपने आप में वाकई में एक दिलचस्प घटना है, जो जुड़ी है अमर शहीद क्रांतिकारी अशफाकउल्लाह खान के जीवन से. जब भी राम प्रसाद बिस्मिल का नाम लिया जाता है, स्वभाविक तौर पर उनके साथ अशफाक का नाम जुड़ जाता है. राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक दोनों शाहजहांपुर के ही रहने वाले थे. एक ही स्कूल में पढ़ते थे, अशफाक उनसे जूनियर थे. लेकिन उर्दू मिडिल में अशफाक के बड़े भाई बिस्मिल की क्लास में ही थे. एक दिन दोनों को एक साथ, एक ही केस में और एक दिन फांसी की सजा हुई, दोनों काकोरी ट्रेन डकैती केस में शामिल थे. इस तरह दोनों ही वीर भारत की आजादी के लिए जान देने वालें अमर शहीद मतवालों में अपना नाम लिखा गए.

बड़ी दिलचस्प बात है कि राम प्रसाद बिस्मिल शुरू से ही आर्यसमाजी थे और अक्सर आर्यसमाजियों की उस टोली से जुड़े रहते थे, जो हिंदू ध्रर्म से कनवर्ट हुए मुसलमानों को शुद्धि यज्ञ के जरिए वापस हिंदू बनाने का काम करती थी. ऐसे में शुरूआत में वो मुस्लिम युवाओं पर कम भरोसा करते थे. लेकिन अशफाकुल्लाह खान ने उनकी जिंदगी में आकर उनको व्यक्तित्व को एकदम बदल दिया. एक मुस्लिम युवा की जो छवि राम प्रसाद बिस्मिल ने बना रखी थी, उसको तोड़ने में अशफाकुल्लाह खान ने बड़ी भूमिका निभाई.

अशफाक बिस्मिल के एक तरह से फैन थे, मुरीद थे. वो उनसे कई बार मिले और उनके साथ मिलकर देश सेवा के काम में जुड़ने की इच्छा प्रकट की. लेकिन बिस्मिल को नहीं लगता था कि एक मुस्लिम युवक देश के लिए अपनी जान दे सकता है. लेकिन अशफाक की लगातार जिद ने उनको सोचने पर मजबूर कर दिया. जब कई मुस्लिम युवा आर्यसमाज से जुड़े होने के चलते बिस्मिल से घृणा करते थे, तब भी अशफाक उनसे मिलने आर्य समाज मंदिर तक में चले आते थे. एक तरफ अशफाक को उनके मुस्लिम साथी धिक्कारते थे, दूसरी तरफ बिस्मिल के साथी उनसे कहते रहते थे कि मुस्लिम है, धोखा मत खा जाना. अशफाक अपने मोहल्ले में काफी गालियां खाते, लेकिन हिंदू मुस्लिम एकता के हमेशा पक्षधर रहे.

जब भी बिस्मिल कोई किताब हिंदी में लिखते तो अशफाक उनसे कहते कि आप उर्दू में क्यों नहीं लिखते हो ताकि आपकी देशभक्ति की किताबों का आनंद मुस्लिम भी ले सकें. इतना ही नहीं अशफाक खुद हिंदी सीखने में जुटे रहते थे. कभी कभी तो अपने घर में अशफाक कुछ हिंदी के शब्द गलती से बोल जाते थे, तो अशफाक की मां या भाई आश्चर्य करते थे. उस वक्त बहुतों को तो ये लगता था कि कहीं अशफाक भी शुद्दि यज्ञ में शामिल होकर हिंदू तो नहीं बन जाएगा. बिस्मिल और अशफाक अक्सर एक ही थाली में खाना खाते थे, बिस्मिल अपनी बायोग्राफी में लिखते हैं, अशफाक के चलते मेरे मन से हिंदू मुस्लिम का भेद भी जाता रहा. अशफाक हमेशा बिस्मिल को केवल राम नाम से पुकारते थे.

एक बारगी तो एक बड़ी ही दिलचस्प घटना हुई. एक बार जब अशफाकुल्लाह खान की तबियत खराब हुई, उन्हें कंपकपी छूट रही थी, यहां तक कि अशफाक अर्धबेहोशी जैसी हालत में आ गए थे, तो उनके मुंह से बार बार राम राम राम निकल रहा था. अक्सर बेहोशी में आदमी कुछ ना कुछ ब़ड़बड़ाता है, लेकिन अशफाक का राम राम राम बड़बड़ाना उनके घर पर मौजूद कुछ मित्रों, रिश्तेदारों को रास नहीं आ रहा था. उनको ताज्जुब था, वो कहने लगे बोलना है तो अल्लाह अल्लाह अल्लाह बोलो, ये क्या राम राम राम जप रहे हो? आलम ये हो गया कि उनको अशफाक की तबियत से ज्यादा इस बात की चिंता हो गई कि कहीं आर्यसमाजियों ने अशफाक की शुद्धि तो नहीं कर दी है.

इतने में अशफाक का उसी मोहल्ले का एक और मित्र अशफाक के घर आ पहुंचा, तब जाकर पता उसने राज बताया कि राम अशफाक के सबसे गहरे मित्र का नाम है और ये बेहोशी की हालत में राम प्रसाद बिस्मिल का नाम ही रट रहा है, भगवान राम का नहीं. तब जाकर उनके परिवार और पड़ोसियों की जान में जान आई. उसके बाद अशफाक के घरवालों ने फौरन राम प्रसाद बिस्मिल को बुलावा भेजा, वो भागकर पहुंचे भी. राम प्रसाद बिस्मिल के आते ही अशफाक को मानो चैन पड़ गया. बहुत जल्दी ही वो ठीक हो गए. इतना जबरदस्त स्नेह हो गया था उन्हें राम प्रसाद बिस्मिल से और वजह केवल एक, राम प्रसाद बिस्मिल ने देश को आजाद करवाने के लिए अपनी जान और जवानी दोनों को कुर्बान करने की शपथ ले ली थी. 22 अक्टूबर को अशफाकउल्लाह खान की जयंती होती है.

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